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Saturday, December 10, 2022

मुक्तक काव्य परंपरा और बिहारी

 मुक्तक काव्य परंपरा और बिहारी


बहुत बड़ी बात को थोड़े शब्दों में चमत्कारपूर्ण ढंग से कह देना, एक बड़े प्रसंग को दोहे की सीमित काया में अंटाकर अलंकारी की लड़ी पिरो देना बिहारी का प्रमुख कौशल है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की 'दृष्टि में मुक्तक कविता में जो गुण होना चाहिए वह बिहारी के दोहों में अपने चरम उत्कर्ष को पहुँचा है. इसमें कोई संदेह नहीं। मुक्तक में प्रबंध के समान रस की धारा नहीं बहती, जिसमें कथा-प्रसंग की परिस्थिति में अपने को भूला हुआ पाठक मग्न हो जाता है और हृदय में एक स्थायी प्रभाव ग्रहण करता है। इसमें तो रस के ऐसे छींटे पड़ते हैं, जिनसे हृदय कलिका थोड़ी देर के लिए खिल उठती है। यदि प्रबंध काव्य एक विस्तृत बनस्थली है तो मुक्तक एक चुना हुआ गुलदस्ता है।


भारत में ईसा  के आसपास से ही ऐसे शृंगारिक मुक्तको का प्रचलन था जिसमें धर्म और नैतिकता के अनुशासन से दूर लोक जीवन के रसमय पक्षों की झांकी उपस्थित की जाती थी। इस संदर्भ में सातवाहन नरेश हाल की प्राकृत रचना 'गाथा सप्तशती' उल्लेखनीय है। इसमें आमीर जाति के जीवन के उन्मुक्त हास-विलास, मनोरम प्रेम-क्रीडाओं और उन्मादक काम चेष्टाओं का मार्मिक अंकन हुआ है। यह कृति इतनी लोकप्रिय हुई कि इसके अनुकरण पर संस्कृत में भी रचनाएं होने लगीं। गोवर्द्धन की “आर्या सप्तशती"., अमरूक के "अमस्य शतक", उत्प्रेक्षावल्लभ के "सुन्दरी तिलक" आदि में इसी परम्परा का विकास है। बिहारी जहाँ एक ओर रीतिशास्त्र के जानकार थे, वहीं दूसरी ओर उनका शृंगारिक मुक्तको की इस सरस परम्परा से भी निकट का परिचय था और उन्होंने अपनी सतसई में दोनों का मुँह मिला दिया है। उन्होंने अपने संस्कार परिवेश और फारसी शायरी से कलम की सफाईऔर महीनकारी लेकर पुरानी उक्तियों को और भी बेधक बना दिया है एवं उसमें एक विशेष प्रकार की चमक भर दी है। गाथा सप्तशती का एक पद है- 


अब्बो टुक्कर आरक पुणो वितन्ति करेसि गमणास। अज्ज विण होन्ति सरला वेणीय तरंगिणे चिउरा ।।


अर्थात "हे दुष्कर व्यवहार करने वाले ! अब तक तो तुम्हारे प्रवास के दिनों के गुलझट पड़े केश भी नहीं सुलझ पाए हैं और तुम फिर बाहर जाने की चिन्ता में लगे।" बिहारी ने इस भाव को किंचित बदलकर अपनी "सतसई' में यह रूप दे दिया है-

 अजी न आए सहज रंग विरह दूबरे गात।

अब ही कहा चलाइयतु, ललन चलन की बात ।।


विरह में दुबली हुई (नायिका की) देह में अब तक स्वाभाविक कांति भी नहीं आई है (फिर) हे ललन,(परदेस) चलने की बात अभी क्यों चला रहे हैं?


बिहारी का यह दोहा गाथाकार की उक्ति से कहीं ज्यादा मार्मिक और मनोज्ञ बन गया है क्योंकि वहाँ उलझे हुए केशों के ही न सुलझ पाने की चर्चा थी, यहाँ प्रिय के प्रवास का प्रभाव सम्पूर्ण शरीर की विवर्णता के रूप में प्रकट हुआ है। इससे विरह की तीव्रता की व्यजना तो होती ही है, पाठकों के अंत:करण पर भी इसका प्रभाव अधिक सीधा और गहरा पड़ता है। यह दोहा एक बाह्य व्यापार मात्र से सम्बद्ध नहीं और अपेक्षाकृत विशद जीवन-दृष्टि तथा व्यापक मानसिक संघटन का परिचायक है।


बिहारी एक सजग कलाकार हैं। उन्होंने जीवन में 713 दोहों का ही एक ग्रंथ लिखा और वह है "बिहारी सतसई" बिहारी मुक्तक कवि हैं। मुक्तकार के पास जीवन का आधार फलक अत्यंत सीमित होता है और उसमें ही उसे सजीव रूप रेखाऐं और रंग भरने पड़ते है। जिस मुक्तक काव्य में यह रूप रंग जितना उज्ज्वल होगा वह उतना ही सफल होगा। संस्कृत के अमरूक और बिहारी के दोहों में मुक्तक काव्य की यह विशिष्टता अपनी चरम सीमा पर पहुँची हुई है। मुक्तक काव्य में कल्पना की समाहार शक्ति और भाषा की समास शक्ति का होना अनिवार्य होता है, उसे अपने खंड दृश्यों में रस की एक ऐसी वेगवती अजय धारा प्रवाहित करनी होती है जो हृदय कलिका को विकसित कर दे, उसके प्रत्येक पद्म का पूर्वापर सम्बन्ध से रहित अपना एक अलग अस्तित्व हो, उसके पद्य स्तबकों में प्रभावजन्य एक अपूर्व निविड़ता और तरलता हो, जो स्थायी प्रभाव उत्पन्न करने में सक्षम हो और पाठक को चमत्कृत कर दे। मुक्तक के ये सभी गुण अपने भव्य रूप में बिहारी के दोहों में विद्यमान है ।उन्होंने गागर में सागर भर दिया है। किसी ने ठीक ही कहा है 


सतसैया के दोहरे, ज्यों नावक के तीर। 

 देखन में छोटे लगैं, बेधैं सकल सरीर II


आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने मुक्तक की सफलता के लिए शर्ते रखी हैं - "कल्पना को समाहार शक्ति " और "भाषा की समान शक्ति" बिहारी रमणीय प्रसंगों की उद्भावना और संयोजन में जितने पटु हैं, भाषा को चुस्त प्रयोग में भी उतने ही सुदक्ष। इसीलिए वे दोहे की छोटी-सी जमीन पर इतने करिश्मे दिखा सके हैं जैसे नट कूदकर छोटी-सी कुंडली से शीघ्रता से निकल जाता है। ध्यातव्य है कि एक से एक बारीक सूझ बिहारी की कविता में मिलेगी। फिर, खूबी यह कि ये कल्पनाएँ एक-दूसरे से जुड़ी प्रतीत रहती हैं। कल्पना की इसी समाहार शक्ति के कारण बिहारी ने एक-एक दोहे में अपार अर्थ- गाम्भीर्य भर दिया है - "अर्थ अमित अरू आखर थोरे "- तुलसीदास की इस उक्ति को बिहारी ने ही चरितार्थ किया।


बिहारी की काव्य-भाषा में समास शक्ति पूर्ण रूप में विद्यमान है। इसके कारण काव्य-भाषा में अद्भुत कसावट आ गई है। थोड़े में बहुत अधिक कह देना बिहारी का बहुत बड़ा कौशल है और यही उनकी सफलता का रहस्य भी है। लेकिन इसके लिए उन्हें शब्दों की ज्यादा तोड़-मरोड़ नहीं करनी पड़ी है।


संक्षिप्तता और सांकेतिकता के अतिरिक्त, बिहारी की काव्य-कला का दूसरी विशेषता है वाग्वैदग्ध या कथन-चातुरी।  बिहारी एक साधारण-सी लगने वाली बात को भी इस खूबी से इस शब्दावली में कहते हैं कि वह साधारण बात भी अपूर्व-असाधारण हो जाती है। अच्छे गहने और अच्छे वस्त्र के अभाव में भी वस्तुतः सुंदर स्त्री सुंदर लगती है। यह एक साधारण बात है। मगर इसी को बिहारी इस खूबी से कहते हैं कि एक अपूर्व चमत्कार आ जाता है.


भूषण भार सँभारिहैं, क्यों यह तन सुकुमार। 

सूघो पायँ न परत महि, सोमा ही के भार।।


बिहारी ने शब्दों का निपुण और बेजोड़ प्रयोग किया है। यदि किसी शब्द विशेष को बदलकर पर्यायवाची अन्य शब्द रख दिए जाएँ तो सारा चमत्कार तो चौपट हो ही जाएगा "लीक नहीं यह पीक की, श्रुति- मन-मूल कपाल।" यहाँ "श्रुति" आदि शब्द बदले नहीं जा सकते। बिहारी के दोहे में प्रत्येक शब्द एक विशिष्ट चित्र, ध्वनि और अर्थ रखता है। निम्नलिखित दोहे में प्रत्येक शब्द एक शब्द-चित्र दे रहा है और लगता है कि आँखों के सामने तस्वीरों की रील चल रही हैं-


भरत, ढरत, बूढ़त, तिरत रहत, घरी लौं नैन ।

ज्यों-ज्यों पट झटकति, हँसति, हठति, नचावति नैन ॥


इसी प्रकार निम्नलिखित दोहे में प्रत्येक शब्द ऐसी ध्वनि लिए हुए है कि उच्चारण से वस्तु का बोध हो जाता है- 


रनित भृंग घंटावली झरित दान मधु-नीरू।

मंद मंद आवतु चल्यौ कुंजर कुंज समीरु ।।



Sunday, December 12, 2021

प्रगतिवाद , हिंदी साहित्य

 'प्रगतिवाद' केवल काव्य प्रवृत्ति नहीं, व्यापक काव्यान्दोलन या साहित्यिक आंदोलन है। उसके पीछे मार्क्सवादी विचारधारा है जो राजनीतिक दृष्टि से आगे विश्वदृष्टि के रूप में भी महत्वपूर्ण है। प्रगतिवाद या प्रगतिशील साहित्य शब्द का प्रयोग 1936 के आसपास हुआ जब प्रगतिशील लेखक संघ स्थापित हो चुका था पर साहित्य में 1930 के बाद ही यह रूझान प्रकट होने लगा था जिसके पीछे बदली हुई राजनीतिक, सामाजिक वास्तविकता थी। प्रगतिवाद एक अर्थ में छायावाद का विकास है दूसरे अर्थ में छायावाद के विरुद्ध विकसित काव्यप्रवृत्ति। अन्तर्वस्तु की दृष्टि से प्रगतिवाद में ऐतिहासिक चेतना सामाजिक यथार्थ दृष्टि, परिवेश या प्रकृति के प्रति लगाव, जीवन के प्रति स्वीकृति का भाव, मानवीय संबंधों में समानता का आग्रह और भविष्योन्मुखी दृष्टि का महत्व है। रचनाविधान की दृष्टि से प्रगतिवाद में यथार्थबोध के अनुरूप नये रूपों की खोज, जीवन की हलचल से भरी भाषा, यथार्थ ज्ञान से प्रेरित ऐतिहासिक मूर्त्तता, लोकरूपों या छन्दों का आवश्यकतानुसार उपयोग, सहजता का शिल्प आदि महत्वपूर्ण हैं। प्रगतिवाद प्रयोगवाद या अन्य आधुनिकतावादी प्रवृत्ति के उभार के कारण कभी बीच में केन्द्र में न रह गया हो किंतु विकास उसका कभी स्थगित नहीं हुआ। यही कारण है कि आज भी जो नयी कविता लिखी जा रही है उसे प्रगतिवाद का ही विकास कहा जाएगा। प्रगतिवाद के प्रमुख कवि हैं : नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, शमशेर, मुक्तिबोध और त्रिलोचन। बाद के कवियों में केदारनाथ सिंह, धूमिल, कुमार विकल, अरुण कमल के नाम लिये जा सकते हैं। यों, ऐसे नामों की सूची बड़ी हो सकती है क्योंकि यह प्रवृत्ति आज पुनः केन्द्रीयता प्राप्त कर चुकी है।

ऐतिहासिक महत्व

प्रगतिवादी का एक काव्य प्रवृत्ति के रूप में और व्यापक साहित्यिक आंदोलन के रूप में ऐतिहासिक महत्व है। जिस समय अतिशय सूक्ष्मता और अति-कल्पनाशीलता के नाम पर हिन्दी कविता गूढ रहस्योन्मुख होती जा रही थी, प्रगतिवाद ने कविता को अपने समय के यथार्थ से, यथार्थ-बोध के अनेक रूपों से जोड़ा और कविता और राजनीति के बीच ऐसा घनिष्ठ संबंध विकसित किया जिससे आगे की कविता भी लाभान्वित हुई। प्रगतिवाद ने कविता संबंधी अवधारणा बदली और अपने समय के तीखे सवालों की गूंज कविता में पैदा की। प्रगतिवाद ने एक नये ही संदर्भ में ‘कविता किसके लिए'- जैसा सवाल उठाया। प्रगतिवाद अपनी ऐतिहासिक भूमिका के लिए साहित्य में स्थायी महत्व का विषय हो गया है।

साहित्यिक महत्व

प्रगतिवादी कविता उदाहरण है कि उसने साहित्य भूमि का विस्तार किया। कविता का संसार

अधिक यथार्थ, प्रामाणिक, व्यापक और विश्वसनीय लगने लगा। कविता की अंतर्वस्तु और रचनाविधान में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए। उपेक्षित जान पड़ने वाले विषयों, चरित्रों को काव्यात्मक प्रतिष्ठा मिली। कविता ने प्रत्यक्ष जीवन, लोकरूपों, लोक प्रचलित छन्दों का नया उपयोग किया और नयी संभावनाएँ खोजी।

प्रगतिवाद : सीमा और व्याप्ति

प्रगतिवाद का विरोध करने वाले ही उसकी सीमा यह बताते रहे हैं कि वह मार्क्सवाद का साहित्यिक रूपांतर मात्र है। पर यह सब जानते हैं कि यदि प्रगतिवाद नाम से परिचित काव्य प्रवृत्ति के महत्वपूर्ण कवियों में नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, शमशेर बहादुर सिंह, गजानन माधव मुक्तिबोध और त्रिलोचन जैसे बड़े कवि हैं तो उनका काम केवल मार्क्सवाद के सिद्धांत विवेक के जरिए नहीं चल सकता। मार्क्सवाद में उनकी आस्था जहाँ व्यापक जीवन ज्ञान में और गहरी जीवनासक्ति में सहायक हुई वहीं वे प्रगतिवाद को समर्थ काव्य प्रवृत्ति के रूप में विकसित करने के लिये, यथार्थ के नये रूपों की समझ के अनुरूप, नयी काव्य शैली का विकास करते रहे हैं। वैसे एक साहित्यिक आंदोलन के रूप में प्रगतिवाद का इतिहास मोटे तौर पर 1936 ई. से शुरू होने के बाद के लगभग बीस वर्षों का इतिहास है किन्तु यह ‘साहित्य में स्वस्थ सामाजिकता, व्यापक भावभूमि और उच्च विचार के निरंतर विकास का इतिहास है, जो न केवल राजनीतिक जागरण से आरंभ होकर क्रमशः जीवन की व्यापक समस्याओं की ओर, आदर्शवाद से आरंभ होकर क्रमशः यथार्थवाद की ओर और यथार्थवाद से आरंभ होकर क्रमशः स्वस्थ सामाजिक यथार्थवाद की ओर अग्रसर होता जा रहा है"। अतः व्यापक अर्थों में प्रगतिवाद न स्थिर मतवाद है न स्थिर काव्य रूप। उसमें निरंतर विकास हुआ है। आज प्रगतिशीलता के व्यापक अर्थ में ऐतिहासिक चेतना, जीवन विवेक, जीवनानुभवों के विस्तार, यथार्थ के मूल रूपों की समझ, जीवनधर्मी सौन्दर्यबोध, प्रकृतिबोध का उल्लेख किया जाता है, फिर भी जीवन को देखने की यथार्थवादी दृष्टि विशेष अर्थ में मार्क्सवादी दृष्टि को यहां प्रमुखता प्राप्त है। प्रगतिवाद के विकास में अपना योगदान देने वाले परवर्ती कवियों में केदारनाथ सिंह, धूमिल, कुमार विमल, अरुण कमल, राजेश जोशी के नाम उल्लेखनीय हैं।

प्रगतिवाद के प्रमुख कवि

नागार्जुन

प्रगतिवादी काव्यधारा के महत्वपूर्ण कवियों में प्रमख नागार्जुन के बारे में आज यह बात सहज ही कही जा सकती है कि समकालीन हिन्दी काव्य परिदृश्य में भी उन्हें केन्द्रीयता प्राप्त है। मैथिली काव्य रचनाओं के लिए साहित्य अकादमी द्वारा सम्मानित नागार्जुन खड़ी बोली हिन्दी कविताओं में भी मूल काव्य ऊर्जा, गहरी आंचलिकता, ठेठपन, तदभवता, व्यंग्यपूर्ण आक्रामकता और गहरी जीवनासक्ति का प्रमाण देते हैं। राजनीतिक कविताएं नागार्जुन के यहाँ बड़ी संख्या में हैं। उनमें जो सपाट तात्कालिक या इकहरी नहीं हैं, नागार्जुन की बड़ी कवि-प्रतिभा का प्रमाण देती हैं। कविता के लिए जो विषय अकल्पनीय या असंभव माने जाते हैं उनपर भी नागार्जुन ने कविताएँ लिखी हैं और असाधारण सफलता प्राप्त की है। जीवन के प्रति प्रगाढ़ राग की कविताएँ भी उनके यहाँ कम नहीं हैं। पर उनकी कविता का एक रंग वह है जहाँ नफरत, प्यार, विक्षोभ, जिज्ञासा घुलमिल जाते हैं उनमें फर्क करना मुश्किल हो जाता है। नागार्जुन का कविता की अंतर्वस्तु, रूप और भाषा पर अनोखा नियंत्रण दिखाई देता है। एक उदाहरण, उनकी समग्र काव्य क्षमता देखने के लिए प्रकृति से शुरू होकर एक दम सरल विन्यास वाली कविता कैसे राजनीतिक कविता हो जाती है, यह देखने के लिए शीर्षक है

"काले काले"

काले काले ऋतु रंग

काली काली घन घटा

काले काले गिरि श्रृंग

काली काली छवि घटा

काले काले परिवेश

काली काली करतूत

काली काली करतूत

काले काले परिवेश

काली काली महँगाई

काले काले अध्यादेश।

वाक्य क्रम के बदलाव में एक संयुक्त पद “काले काले” की आवृत्ति में कला भी अपना काम कर रही है और वर्ग संघर्ष या व्यवस्था से संघर्ष का ऐतिहासिक विवेक भी। नागार्जुन को आधुनिक कबीर कहा गया है, वह उनके फक्कड़ क्रांतिकारी व्यक्तित्व को देखते हुए उनकी कला में भी यही व्यक्तित्व समाया है।

 केदारनाथ अग्रवाल

केदारनाथ अग्रवाल प्रगतिवादी काव्यधारा के प्रतिनिधि तथा महत्वपूर्ण कवि हैं। रूमानी आदर्शवाद से यथार्थवाद तक, रूपासक्ति से जीवनासक्ति तक और कोमल रागात्मकता से खुरदुरे वस्तुचित्रण तक केदार की कविता के अनेक रंग हैं। भावुकता केदार के यहाँ आत्मीयता का पर्याय है। पत्नी प्रेम पर जैसी अकुण्ठ कविताएं केदारनाथ अग्रवाल ने लिखी हैं, किसी ने नहीं लिखीं। प्रेम, सौन्दर्य प्रकृति के गहरे लगाव के साथ केदार संघर्षशील जनता के कठोर जीवन, कठिन श्रम और दृढ़ आस्था की ओर बराबर सजग रहे हैं। 'चन्द्रगहना से लौटती बेर' तथा 'बसंती हवा' से केदार की खास पहचान बनी। यह सहजता, यह स्वाभाविकता सच्ची जीवनासक्ति से ही पैदा होती है।

एक बीते के बराबर

यह हरा ठिगना चना

बाँधे मुरैठा शीश पर

छोटे गुलाबी फूल का

सजकर खड़ा है।

और सरसों की न पूछो

हो गयी सबसे सयानी

हाथ पीले कर लिये हैं।

केदारनाथ अग्रवाल स्वीकार करते हैं कि मार्क्सवादी विचारधारा के कारण ही उन्हें नयी जीवन दृष्टि और नयी काव्यदृष्टि मिली। 'देवली के नरसंहार' जैसी तात्कालिक घटनाओं पर भी केदार ने कविताएँ लिखी हैं और अपनी वर्ग चेतना का प्रमाण दिया है।

शमशेर बहादुर सिंह

शमशेर बहादुर सिंह को प्रगतिवादी काव्यधारा से सम्बद्ध करने में उन्हें कठिनाई होती है जो

प्रगतिवाद को स्थिर मतवाद ही मानते हैं, उसकी काव्यात्मक संभावनाओं को महत्व नहीं देते।

शमशेर को रूपवादी या प्रयोगशील मानकर अलग कर दिया जाता है। शमशेर विचारधारा की दृ

ष्टि से मार्क्सवादी हैं और मार्क्सवाद को विशेष महत्व देते । जनता के प्रति उनकी सहानभूति

किसी से कम नहीं है। पर कविता को वे उसकी मुक्त संभावनाओं में देखते हैं। रूप और शिल्प

उन्हें जीवन की प्रकट सच्चाइयों की तरह ही जरूरी जान पड़ते हैं। ‘लेकर सीधा नारा' शमशेर

की वह महत्वपूर्ण कविता है जो प्रगतिवादी आंदोलन के दौर में विशेष चर्चित हुई।

लेकर सीधा नारा

कौन पुकारा

अंतिम आशाओं की सन्ध्याओं से

मैं समाज तो नहीं, न मैं कुल

जीवन

कण समूह में हूँ मैं केवल

एक कण

कौन सहारा।

शमशेर मानते रहे हैं कि उनकी असली जमीन रोमानी ही थी पर 'अमन का राग', 'यह शाम है

जैसी कविताएँ वे अपनी आस्था के अनुरूप लिखते रहे हैं। सांप्रदायिक दंगों पर उन्होंने बाद में

जो कविताएँ लिखी हैं वे प्रगतिशील विचारधारा, जीवन दृष्टि के बगैर असंभव है।

 गजानन माधव मुक्तिबोध

मुक्तिबोध की कविता का प्रगतिशील यथार्थवादी काव्यधारा से सहज संबंध बिठाने में डॉ.रामविलास शर्मा तक को कठिनाई होती है। अब शायद यह बात अधिक स्पष्टतापूर्वक कही जा रही है कि प्रगतिशील यथार्थवादी कविता की ही कम से कम दो परंपराएँ हैं -एक में नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल आते हैं, दूसरी में शमशेर, मुक्तिबोध । मुक्तिबोध ने सीधे-सीधे स्वीकार किया है कि एक कला सिद्धांत के पीछे विशेष जीवन दृष्टि होती है, उसके पीछे एक जीवन दर्शन होता है और उसके पीछे एक राजनैतिक दृष्टि भी होती है। मुक्तिबोध की महत्वपूर्ण लम्बी कविताएँ राजनैतिक दृष्टि से वंचित नहीं हैं। यह राजनीतिक दृष्टि मार्क्सवाद ही है जो व्यापक अर्थ में विश्वदृष्टि भी है। 'अन्तःकरण का आयतन' कविता में मुक्तिबोध अपना पक्ष स्पष्ट करते

पृथ्वी के प्रसारों पर

जहाँ भी स्नेह या संगर

वहाँ पर एक मेरी छटपटाहट है

वहाँ है जोर गहरा एक मेरा भी

सतत मेरी उपस्थिति

नित्य सन्निधि है।

मुक्तिबोध ने यथार्थ चित्रण के लिए फैन्टेसी का भी उपयोग किया और इस प्रकार एकरस जान पड़ने वाले काव्यरूप में विविधता, नाटकीयता, गति पैदा की। अँधेरी दुनिया के रहस्यों को भेदते हुए मुक्तिबोध के जो विचार स्फुलिंग सामने आते हैं वे एक निश्चित विचारधारा या जीवन दृष्टि का प्रमाण देते हैं। वे सत्ता को किस तरह बेनकाब करते हैं इसका सटीक उदाहरण है

'भूलगलती' नाम कविता जिसमें भूलगलती सिंहासन पर बैठी है और 'सच' नाम का पात्र गिरफ्तार करके लाया जाता है। अँधेरे में' मुक्तिबोध की सबसे महत्वपूर्ण कविता है – आधुनिक कविता की विशिष्ट उपलब्धियों में एक।


 त्रिलोचन

त्रिलोचन की एक अलग पहचान है। परम्परा में ही उन्हें रखना हो तो वे तुलसी और निराला की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले कवि हैं। उन्होंने राजनीतिक विषयों पर कविताएं नहीं लिखी हैं कि उनकी विचारधारा तक सीधे पहुंचना आसान हो। पर साधारण विषयों पर, जीवन के बहुत मामूली प्रसंगों पर लिखते हुए भी वे अपनी दृष्टि का प्रमाण देते हैं। सानेट त्रिलोचन का अपना आविष्कार है। सानेटों में जितनी सहजता से वे आत्मकथा या सामाजिक संदेश बिखेरते चलते हैं, उसी से उनकी साफ दृष्टि और असाधारण काव्यक्षमता का पता चलता है। त्रिलोचन की कविताएँ सीधे जीवन को पकड़ती हैं। त्रिलोचन के सानेटों में आत्मभर्त्सना के जो अंकुठ संकेत हैं उनसे उनकी जीवनशक्ति प्रकटहोती है। "भीख मांगते उसी त्रिलोचन को देखा कल/जिसको समझे था है तो है यह फौलादी", 'नगई महरा' जैसे इतिवृत्त में उनका ढंग दूसरा है बतकही वाला ढंग। कृत्रिमता, बनावटीपन से मुक्त यह सहज आत्मीयता त्रिलोचन का काव्यवैशिष्ट्य है- शब्दकार इन शब्दों में जीवन होता है।





Thursday, December 2, 2021

छायावाद के प्रमुख कवि

छायावाद के प्रमुख कवि
                                                   आर.पी. मिश्रा

"छायावाद" अपने आप में कविता का एक ऐसा युग है जिसका सम्बन्ध भाव-जगत से है, हृदय की भूमि से है। भावलोक की तो सत्ता ही अनुभव विषय है, हृदय से जानने, समझने और महसूस करने की वस्तु है। उसी छायावाद में समय-समय पर अनेक रचनाकारों और कवियों का समावेश होता रहा। कभी वहाँ "बृहतत्रयी' के रूप में “प्रसाद", “निराला” और “पन्त” की चर्चा की जाती रही तो कभी बृहच्चतुष्ट्य के रूप में इन तीनों कवियों के साथ “महादेवी" का नाम जोड़कर देखा जाता रहा। कुल मिलाकर छायावाद प्रमुख कवियों या आधार-स्तम्भों में इन चारों महाकवियों की चर्चा, किसी न किसी रूप में चलती ही रही। यह अलग बात है कि इन चार कवियों के साथ-साथ छायावाद के अन्य कवियों में, उत्तरछायावादी कवि या गौण छायावाद कवि कहकर माखनलाल चतुर्वेदी, डॉ. रामकुमार वर्मा, जानकीबल्लभ शास्त्री, हरिकृष्ण प्रेमी, जनार्दन झा “द्विज", लक्ष्मी नारायण मिश्र, इलाचन्द्र जोशी, डॉ. नगेन्द्र, चन्द्र प्रकाश सिंह, विद्यावती कोकिल, तारा पाण्डेय, मुकुटधर पाण्डेय, उदय शंकर भट्ट तथा नरेन्द्र शर्मा आदि कवियों को भी इसमें समाविष्ट किया जाता रहा। छायावाद के चार प्रमुख कवियों से इतर इन सभी कवियों के काव्य और उनकी प्रवृत्तियों को लेकर विवाद भी चलते रहे परन्तु इन्हें छायावाद के प्रमुख कवियों में सर्वमान्यता से शामिल नहीं किया जा सका। तो आईये चारों प्रमुख कवियों के संदर्भ में चर्चा करतें है। 
प्रवर्तक कवि जयशंकर प्रसाद
छायावाद के अग्रदूत या प्रवर्तक के रूप में हमारे सामने केवल जयशंकर प्रसाद का ही नाम उभर कर आता है। केवल भाषा या विषय-वस्तु ही नहीं, प्रसाद ने जीवन दृष्टि भी नवीन बना डाली। 20वीं शताब्दी को अपने व्यक्तित्व और कृतित्व से सर्वाधिक प्रभावित और प्रेरित करने वाले इस “बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न” कलाकार ने कविता के साथ-साथ नाटक, उपन्यास, कहानी, निबन्ध तथा समीक्षा आदि विभिन्न गद्य-पद्य विधाओं में अपनी ऐतिहासिक तथा महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। सन् 1889 ई. में वाराणसी के एक प्रतिष्ठित परिवार में जन्मे “प्रसाद" का जीवन परिस्थितियों से संघर्ष करते हुए प्रारम्भ हुआ। घर में ही शिक्षार्जन तथा पारिवारिक व्यवसाय का दायित्व निभाते हुए भी सरस्वती के इस लाडले पुत्र ने अपनी अप्रतिम प्रतिभा का परिचय दिया और कई काव्य-कृतियों की रचना कर डाली। प्रारम्भ में “कलाधर के नाम से कतिपय ब्रजभाषा-छन्द भी प्रसाद ने लिखे जो आगे चलकर "चित्राधार' में संकलित किए गए। खड़ी बोली को परिष्कृत, परिमार्जित और अपनी काव्य कृतियों से पुरस्कृत करने वाले इस महाकवि की प्रारम्भिक काव्य कृतियाँ हैं “प्रेम पथिक”, “करूणालय", "कानन-कुसुम” तथा “महाराणा का महत्व । सन् 1918 ई. में "झरना" लिखी और कवि प्रसाद छायावाद के प्रवर्तन की ओर अग्रसर होने लगे। इसके बाद सन् 1925 ई. में "आंसू”, सन् 1933 ई. में “लहर तथा सन् 1935 ई. में “कामायनी' का सृजन हुआ और प्रसाद काव्य-साधना के उच्चतम शिखर पर पहुंच गए। आधुनिक कविता के इतिहास में एक तरफ प्रेम, सौन्दर्य तथा आनन्द और दूसरी तरफ भाव, विचार तथा आनन्द का अद्भूत सामंजस्य देने वाला यह कवि मानव-मूल्यों के बहुत व्यापक फलक का कवि है। केवल 48 वर्ष की अवस्था में यक्षमा से पीड़ित इस महाकवि का 15 नवम्बर सन् 1937 को स्वर्गवास हो गया। किन्तु महाकवि जयशंकर प्रसाद सभी काव्य प्रेमियों और रसिकों को काव्य का ऐसा अद्भूत और अनुपम आस्वाद प्रदान कर गए, जो सदैव ही अतुलनीय तथा अमर बना रहेगा।
 सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला
छायावाद के प्रवर्तक कवि प्रसाद के बाद महत्वपूर्ण स्थान रखने वाले कवि हैं महाप्राण “निराला”। अपने प्रचण्ड विद्रोह, उदग्र सौन्दर्य तथा उदात्त एवं आदर्श-जीवन दर्शन के इस कवि को हिंदी काव्य का शलाका पुरुष कहा जाता है। सन् 1896 ई. में बंगाल के मेदिनीपुर महिषादल में जन्में इस महाकवि के जीने का अंदाज़ भी उपमान की तरह “निराला” ही था। जीवन की विषम परिस्थितियों से जूझते और संघर्ष करते हुए भी साहित्य की महान् सेवा करने वाले इस आधार स्तम्भ ने “परिमल", "अनामिका", "तुलसीदास", "गीतगुन्ज", "कुकुरमुत्ता", "गीतिका", "अणिमा", "बेला", "नये पत्ते", "सांध्य-काकली", "अर्चना" तथा "आराधना" जैसी महानतम कृतियाँ प्रदान की। छायावादी काव्य को अनुपम तथा नवीनतम गति देने वाले इस विद्रोही कवि ने भाव, भाषा और छंद आदि क्षेत्रों में युगान्तकारी परिवर्तन उपस्थित कर डाला । वेदान्त दर्शन के गहन अध्येता महाकवि निराला ने भी प्रसाद की तरह ही अपनी प्रतिभा के बल पर दर्शन और काव्य में अद्भुत समन्वय स्थापित किया। छायावाद ही नहीं हिंदी साहित्य के इतिहास में महाप्राण निराला को उनकी भाषा तथा मुक्त-छंद के संदर्भ में युगों-युगों तक याद किया जाता रहेगा। काव्य के अतिरिक्त कहानी, उपन्यास, निबन्ध तथा पत्रकारिता के क्षेत्र में भी निराला जी की विशिष्ट रुचि एवं देन रही। अक्तूबर, 1961 में भौतिक अस्तित्व को तज देने वाले इस चिरन्तन "कवि-व्यक्तित्व" के अमर-प्रतीक पर सभी साहित्य- प्रेमियों को गर्व है।
सुमित्रानन्दन पन्त
छायावाद के चार आधार स्तम्भों में सुमित्रानन्दन पन्त तीसरे प्रमुख स्तंभ हैं जिनका नाम सदैव अमर रहेगा। व्यक्तित्व के अनुरूप ही काव्य को कोमलता, सरसता और सुन्दरता प्रदान करने वाले इस प्रकृति-पुत्र का जन्म 20 मई, सन् 1900 ई. में “कोसानी" में हुआ था। अनन्य प्रकृति प्रेमी तथा विदग्ध-विचारक कवि पन्त ने बाल्यावस्था से ही काव्य-सृजन प्रारम्भ कर दिया था। कवि रूप में स्थापित इस महान व्यक्तित्व ने काव्य से इतर नाटक, कहानी, उपन्यास, निबन्ध संस्मरण तथा समीक्षा के क्षेत्र में भी अपनी प्रतिभा का परिचय दिया, किन्तु मूलतः वे कवि ही थे और अपनी विशिष्ट पहचान भी इसी क्षेत्र में बना सके। समय-समय पर गांधी, मार्क्स तथा अरविन्द आदि से प्रभावित और प्रेरित होने वाले इस प्रकृति-प्रेमी कवि की आरम्भिक रचनाएँ “वीणा” में संकलित हैं। इसके अतिरिक्त अन्य काव्य कृतियों में
 “ग्रन्थि", “पल्लव", "गुंजन", “युगान्त”, “ज्योत्सना", "अंतिमा","ग्राम्या”,“युगवाणी”,“युगान्तर","स्वर्ण-किरण”, “स्वर्ण-धूलि", "उत्तरा","रजत-शिखर", "शिल्पी", "लोकायतन", "कला और बूढ़ा चाँद", "किरण", "पौ घटने से पहले", "गीतहंस”, “समाधिता", "आस्था” तथा “सत्यकाम” आदि चिरस्मरणीय हैं। प्रकृति चित्रण का हृदयग्राही चित्रण और उसमें भी कोमल पक्ष विशेष रूप से कवि की रूचि का वैशिष्ट्य है। परिमार्जित, सरस एवं मधुर भाषा से समृद्ध कविता-कामिनी का यह सृजक कवि 31 दिसम्बर, सन् 1977 ई. को दिवंगत हो गया, किन्तु उनका साहित्य सदैव ही अमर रहेगा।
महादेवी वर्मा
छायावादी काव्य को संवारने-निखारने वाली गीति-लेखिका महादेवी वर्मा का नाम छायावाद के कवियों में अत्यन्त आदर से लिया जाता है। रहस्य, वेदना और गीतात्मकता की अमर-सृजक महादेवी का जन्म सन् 1907 ई. में फरूखाबाद में हुआ था। विधिवत् शिक्षा प्राप्त कर आजीवन प्रयाग-महिला विद्यापीठ की सेवा करने वाली महादेवी हृदय की अनुभूतियों और सूक्ष्मतम भावनाओं को सफलतम अभिव्यक्ति देती हैं और यह उनके कृतित्य का बेजोड़ पक्ष है। काव्य ही नहीं, रेखाचित्र, संस्मरण, निबन्ध तथा पत्रकारिता के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान देने वाले महादेवी वर्मा के बहुमुखी प्रतिभा-सम्पन्न व्यक्तित्व ने “वेदना" के मर्म से जो तादाकार किया और कराया है वह निश्चित ही उनका अपना वैशिष्ट्य है। सन् 1930 ई. में उन्होंने "नीहार' नामक काव्य संकलन प्रदान किया और उनकी प्रतिभा की धूम पूरे भारत में मच गई। इसके बाद लगातार सन् 1934 ई. में "नीरजा, सन् 1936 में “सांध्यगीत तथा सन् 1940 ई. में “दीपशिखा” जैसी कृतियों में गीतों के माध्यम से आध्यात्मिक-वेदना और रहस्या-चेतना को मुखर बना दिया। दुखानुभूति को लेकर अज्ञात सत्ता की ओर उन्मुख होने वाली वेदना की महागायिका महादेवी वर्मा ने 11 सिंतबर, सन् 1987 को निर्वाण प्राप्त किया। भाव और कला की यह सबल और समृद्ध "प्रतिभा' भारतीय साहित्य-जगत के लिए चिरस्मरणीय है।

Saturday, November 27, 2021

मैथिलीशरण गुप्त:प्रबंधकाव्य

 द्विवेदीजी की कविताओं का संग्रह 'काव्यमंजूषा' नाम की पुस्तक में हुआ है। उनकी कविताओं के दूसरे संग्रह का नाम 'सुमन' है।



द्विवेदीजी के प्रभाव और प्रोत्साहन से हिन्दी के कई अच्छे अच्छे कवि निकले जिनमें बाबू मैथिलीशरण गुप्त, पं. रामचरित उपाधयाय और पं. लोचनप्रसाद पांडेय मुख्य हैं।

बाबू मैथिलीशरण गुप्त संवत् 1966 में उनका 'रंग में भंग' नामक एक छोटा सा प्रबंधकाव्य प्रकाशित हुआ जिसकी रचना चित्तौड़ और बूँदी के राजघरानों से संबंध रखनेवाली राजपूती आन की एक कथा को लेकर हुई थी। तब से गुप्तजी का ध्यान प्रबंधकाव्यों की ओर बराबर रहा और वे बीच बीच में छोटे या बड़े प्रबंधकाव्य लिखते रहे। गुप्तजी की ओर पहले पहल हिन्दी प्रेमियों का सबसेअधिक ध्यान खींचनेवाली उनकी 'भारत भारती' निकली। इसमें 'मुसद्दस हाली' के ढंग पर भारतीयों की या हिंदुओं की भूत और वर्तमान दशाओं की विषमता दिखाई गई है; भविष्यनिरूपण का प्रयत्न नहीं है।

मार्मिक तथ्यों का समावेश बहुत साफ और सीधी सादी भाषा में होने से यह पुस्तक स्वदेश की ममता से पूर्ण नवयुवकों को बहुत प्रिय हुई।


इसी ढंग पर बहुत दिनों पीछे इन्होंने 'हिंदू' लिखा। 'केशों की कथा', 'स्वर्गसहोदर' इत्यादिबहुत सी फुटकल रचनाएँ इनकी 'सरस्वती' में निकली हैं, जो 'मंगल घट' में संगृहीतहैं।

छोटे बड़े प्रबंधकाव्य लिख  हैं जिनके नाम हैं :रंग में भंग, जयद्रथ वधा, विकट भट, प्लासी का युद्ध , गुरुकुल, किसान, पंचवटी, सिद्ध राज, साकेत, यशोधारा। अंतिम दो बड़े काव्य हैं। '

तृतीय उत्थान में 'छायावाद' के नाम से रहस्यात्मक कविताओं का कलरव सुन इन्होंने भी कुछ गीत रहस्यवादियों के स्वर में गाए जो 'झंकार' में संगृहीत हैं।

'साकेत' और 'यशोधारा' इनके दो बड़े प्रबंध हैं। दोनों में उनके काव्यत्व का तो पूरा विकास दिखाई पड़ता है, पर प्रबंधत्व की कमी है।

गुप्तजी ने 'अनघ', 'तिलोत्तामा', 'चंद्रहास' नामक तीन और छोटे छोटे पद्यबद्ध रूपक भी लिखे हैं।

गुप्तजी की प्रतिभा की सबसे बड़ी विशेषता है कालानुसरण की क्षमता अर्थात् उत्तरोत्तर बदलती हुई भावनाओं और काव्य प्रणालियों को ग्रहण करते चलने की शक्ति। इस दृष्टि से हिन्दीभाषी जनता के प्रतिनिधि कवि ये निस्संदेह कहे जा सकते हैं।

'भारतेंदु' के समय से स्वदेश प्रेम की भावना जिस रूप में चली आ रही थी उसका विकास 'भारतभारती' में मिलता है।

राजनीतिक आंदोलनों ने जो रूप धारण किया उसका पूरा आभास पिछली रचनाओं में मिलता है। सत्याग्रह,अहिंसा, मनुष्यत्ववाद, विश्वप्रेम, किसानों और श्रमजीवियों के प्रति प्रेम और सम्मान, सबकी झलक हम पाते हैं।

गुप्तजी की रचनाओं के भीतर तीन अवस्थाएँ लक्षित होती हैं। प्रथम अवस्था भाषा की सफाई की है।'भारतभारती' और 'वैतालिक' के बीच की रचनाएँ इस दूसरी अवस्था के उदाहरण में ली जा सकती हैं। उसके उपरांत 'छायावाद' कहीं जानेवाली कविताओं का चलन होता है और गुप्तजी का कुछ झुकाव प्रगीत मुक्तकों (लिरिक्स) और अभिव्यंजना के लाक्षणिक वैचित्रय की ओर भी हो जाता है। इस झुकाव का आभास 'साकेत' और 'यशोधारा' में भी पाया जाता है। यह तीसरी अवस्था है।

Sunday, September 26, 2021

तमस भीष्म साहनी: संक्षिप्त परिचय

 'तमस' भीष्म साहनी: संक्षिप्त परिचय

'तमस' भीष्म साहनी का सबसे प्रसिद्ध उपन्यास है। इसका प्रकाशन 1973 में हुआ था। तमस को 1975 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया था। इस पर 1986 में गोविंद निहलानी ने दूरदर्शन पर धारावाहिक व एक फ़िल्म भी बनाई थी।


तमस का सामाजिक अर्थ अंधकार, अज्ञान, होता है। 'तमस' की कथा परिधि में अप्रैल 1947 के समय में पंजाब के जिले को परिवेश के रूप में लिखा गया है। 'तमस' कुल पांच दिनों की कहानी को लेकर बुना गया उपन्यास है। परंतु कथा में जो प्रसंग-संदर्भ उभरे हैं। उसमें यह पांच दिनों की कथा न होकर। बीसवीं सदी के हिन्दुस्तान के अब तक के 100 वर्षों की कथा हो जाती है।


संपूर्ण कथावस्तु दो खंडों में विभक्त है। पहले खंड में कुल 13 प्रकरण है। दूसरा खंड गाँव पर केंद्रित है। भाषा हिंदी, उर्दू, अंग्रेजी के मिश्रित रूप वाली है। कथ्य के अनुरूप वर्णनात्मक, मनोविश्लेषणात्मक व विश्लेषणात्मक शैली का प्रयोग किया गया है।


भीष्म साहनी ने 'तमस' में सांप्रदायिकता की समस्या को उठाया है। भारत की आजादी के ठीक पहले सांप्रदायिकता की बैसाखियाँ लगाकर पाशविकता का जो नंगा नाच इस देश में नाचा गया उसका अंतरंग चित्रण भीष्म साहनी ने इस उपन्यास में किया है। आजादी से पहले विदेशी शासकों ने यहाँ की जमीन पर अपने पाँव मजबूत करने के लिए इस समस्या को हथकंडा बनाया था और आजादी के बाद हमारे देश के कुछ राजनीतिक दल इसका घृणित उपयोग कर रहे हैं। और इस सारी प्रक्रिया में जो तबाही हुई है उसका शिकार बनते रहे हैं वे निर्दोष और गरीब लोग जो न हिन्दू हैं, न मुसलमान बल्कि सिर्फ इन्सान हैं और हैं भारतीय नागरिक। 

सांप्रदायिकता एक सामाजिक व्यवस्था के तहत रची गई मानसिकता से उत्पन्न होती है। उपन्यासकार के अनुसार शहर में सब काम बटे हुए थे। कपड़े व अनाज का काम हिंदूओं के पास था, जबकि जूतों, मोटरों लारियों का काम मुसलमानों के हाथों में था।

कथासार / कथावस्तु

उपन्यास का आरंभ नत्थू के साथ होता है। मुरादअली ने नत्थू को सलोत्तरी साहब को डाक्टरी के लिए एक सुअर मारकर उपलब्ध कराने के लिए कहा है और इसके लिए नथू को पांच रुपये का नोट परश्रीमक के रूप में दिया जाता है। नत्थू जब सूअर मारकर घर लौट रहा था तब सांप्रदायिकता की आग सर्वत्र भड़की हुई थी। सांप्रदायिकता की इस आग को बुझाने का दायित्व वहाँ के डिप्टी कमिश्नर रिचर्ड पर था। उसकी अपनी पत्नी से हमेशा कटुता बनी रहती थी।


उधर कांग्रेसियों से प्रभात-फेरी के साथ-साथ गली मोहल्ले की सफाई शुरू कर दी। इनमें बख्शीजी मेहता जी, कश्मीरीलाल व शंकर आदि थे। तभी मालूम हुआ  की मस्जिद की सीढ़ियों पर कोई आदमी सूअर मार कर फेंक गया है। धर्मार्थ मुसलमान बदला लेने पर उत्सुक थे।


हिन्दू और मुसलमान दोनों एक दूसरे के शत्रु हो चुके थे। अंततः कुछ प्रतिष्ठित लोग डिप्टी कमिश्नर से मिलने के लिए रवाना हो गए। नगर के हिंदु युवकों को सैनिक प्रशिक्षण देने का काम मास्टर देवव्रत की देख-रेख में चल रहा था। प्रधान जी लाला लक्ष्मीनारायण इसमें आर्थिक सहयोग दे रहे थे। 


युवकों ने मास्टर जी के मार्गदर्शन में अच्छा खासा शस्त्रागार जुटा लिया था। किसी प्रकार उन्हें कड़वा तेल तो मिल गया या परंतु ऐसी कड़ाही नहीं मिल पाई थी जिसमें पूरा एक कनस्तर तेल उबाला जा सके।


कुछ समय के लिए नगर की स्थिति में कुछ सुधार हो गया था। नगर के शिवालय के बाज़ार में पुनः चहल पहल दिखने लगी थी। कुबड़े हलवाई के यहाँ भी भीड़ जुट गई थी।


नगर में सर्वत्र अशांति फैली हुई थी। भोले-भाले नागरिक अत्यंत भय से त्रस्त थे। सभी अपनी-अपनी सुरक्षा के लिए चिंतित थे। अबकी बार सांप्रदायिकता की आग की लपटें बहुत ऊँची उठ रही थी।


नत्थू अलग परेशान था। उसके मन में तरह-तरह की शंकाएँ उत्पन्न हो रही थी। कोई भी उसके घर आता तो उसका मन किसी अनिष्ट से काँप उठता। उसने सुअर मारने का रहस्य किसी से नहीं खोला था।


गुरुद्वारे में सिक्खों का जमघट लगा हुआ था। गुरुद्वारे में जहाँ गुरु ग्रंथ साहब का पाठ हो रहा था वहीं शत्रुओं से निपटने के लिए असलहा भी इकट्ठा किया जा रहा था छत पर दो विहंग भाले लिए हुए पहरा दे रहे थे।


सिखों और मुसलमानों में दो दिन तक युद्ध चलता रहा। गुरुद्वारे में अनेक लाशें बिछ गई। कस्बे में भी इधर उधर बहुत लाशें बिखरी हुई पड़ी थी, जो कि साम्प्रदायिकता के नाम पर मनुष्य के द्वारा मनुष्य पर किए गए अत्याचारों की क्रूर कथा कह रही थी। स्वार्थी लोग इस दंगे-फसाद में भी स्वार्थ साधन में लगे हुए थे। अमन कमेटी की बैठकों में जहाँ शरणार्थियों को राहत पहुँचाने की उपायों पर विचार होता था, वहीं मकानों जमीनों के सौदा भी तय होते थे।


अनेक बुद्धिमान लोग इस सत्य को पहचान गए थे कि साम्प्रदायिक दंगों के पीछे न तो हिंदू थे न मुसलमान, बल्कि अंग्रेज शासकों की शरारत थी। अंग्रेज शासक हिंदु और मुसलमानों की एकता में दरार डालकर दोनों को परस्पर भिड़वान चाहते थे।

तमस की तात्विक समीक्षा

 (i) कथानक के आधार पर

 'तमस' उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषता है कि यह घटना प्रधान है और इसमें स्पष्टतः किसी व्यक्ति को मुख्य पात्र नहीं कहा जा सकता। इसमें सभी पात्र सांप्रदायिक तनाव से किसी न किसी रूप जुड़े हुए हैं।

तनाव का सूत्रपात करने वाला नत्थू मुख्यतः इस कथा में जुड़ा हुआ है। सुअर व गाय को मरा देखकर हिंदु मुस्लिम दंगे नूरपुर तहसील में प्रारंभ हो जाते हैं। नगर के कांग्रेस कार्यकर्ता जो अब तक तमीरी का काम कर रहे थे, दंगा रुकवाने का प्रयास करते हैं। नत्थू सांप्रदायिक तनाव देखकर घोर प्रायश्चित में डूब जाता है और अंततः उसका पश्चताप ही उसकी मृत्यु का कारण बनता है। ग्राम ढोक इलाही बख्श में मुसलमान आबादी के मध्य एक मात्र घर सरदार हरनाम सिंह का था। उसे घर छोड़कर भागना पड़ा और किसी प्रकार बचते-बचाते वह अपनी  बूढ़ी पत्नी के साथ नगर के शरणार्थी शिविर तक पहुँचता है। उसका घर लूट लिया जाता है और मकान को आग लगा दी जाती है। उस का लड़का इकबाल सिंह विवशतः मुसलमान बन जाता है। दूसरे गाँव सैयदपुर में तो सिक्खों व मुसलमान में इतना भीषण संघर्ष होता है कि असंख्य व्यक्ति मारे जाते है और 27 महिलाएं बच्चों सहित कुएँ में डुबकर जान दे देती है। चार दिन तक पूरे जिले में मारकाट मची रहती है। तब जाकर डिप्टी कमिश्नर रिचर्ड कर्फ्यू लगाकर और अन्य तरीकों से दंगा-फसाद रुकवाता है स्पष्टतया यही मूल कथा भाग है और इसका किसी व्यक्ति विशेष से कोई महत्त्वपूर्ण सबंध नहीं है। 'तमस' में घटनाएँ जुड़ती चली जाती है।

(ii)पात्र योजना एवं चरित्र चित्रण के आधार पर

 'तमस' में पात्र योजना व चरित्र चित्रण अपने ढंग का है व बड़ा ही महत्त्वपूर्ण है। यह एक बृहदाकार उपन्यास है इसलिए जिस प्रकार कथा प्रसंगों की विविधता है उसी प्रकार पात्र योजना में भी विविधता है।

पात्रों का वर्गीकरण

i)   मुख्य और गौण पात्र

   

ii)  पुरुष और नारी पात्र


मुख्य और गौण पात्र

पुरुष पात्रों में मुख्य पात्र नत्थू, रिचर्ड हयातबख्श, बख्शी, जरनैल, लक्ष्मीनारायण व रणवीर है।

पुरुष और नारी पात्र

पुरुष पात्र

नत्थू-उपन्यास का नायक निर्धन व मेहनतकश चर्मकार हीन भावनाओं का शिकार, पत्नी प्रेमी धर्मभीरु।


मुरादअली-सांप्रदायिक तनाव बढ़ाने वाला, स्वार्थी व कुटिल चरित्र संपन्न व्यक्ति।


रिचर्ड-अंग्रेजी शासन का नुमाइंदा, इतिहास का अध्येता किंतु चुस्त स्वार्थी और आंग्ल नीतियों का पोषक, प्रशासक पत्नी प्रेमी किंतु प्रेस के प्रति रूखा व्यक्ति, व्यवहार-कुशल।


लाला लक्ष्मीनारायण-हिंदू महासभा का कार्यकर्ता, सांप्रदायिक भावनाओं से युक्त स्वार्थी एवं कुटिल व्यक्ति।


रणवीर-लक्ष्मीनारायण का पुत्र सांप्रदायिक तनाव बढ़ाने वाले युवक संघ का प्रमुख कार्यकर्ता, मन से कोमल, सच्चरित्र किंतु दृढव्रती परिस्थितिवश हिंसा पर उतारू।


हरनाम सिंह-ग्रामीण सिक्ख, उदार सच्चरित्र किंतु परिस्थितियों व सांप्रदायिकता का शिकार।


हयातबख्श-सांप्रदायिक व्यक्ति और मुस्लिमलीग का कार्यकर्ता, पाकिस्तान का पक्षधर।


शाहनवाज-सच्चा मित्र उदारमना किंतु धार्मिक रूप से मुस्लिम सम्प्रदाय के प्रति सहानुभूतिशील।


देवदत-सच्चा साम्यवादी सभी सम्प्रदायों में सौहार्द बनाने को प्रयत्नशील और निःस्वार्थ व्यक्ति।


रघुनाथ-हिंदु मुस्लिम संप्रदायों में एकता पक्षधर शाहनवाज का मित्र किंतु साम्प्रदायिकता का शिकार, एक अध्ययनशील बुद्धिजीवी।


जरनैल-बाह्य रूप से सनकी कांग्रेसी किंतु सच्ची यथार्थ बात कहने वाला।


मेहता-भ्रष्ट और स्वार्थी कांग्रेसी कार्यकर्ता ।


बख्शी-राजनीति को अपने व्यक्तित्व को संवारने में अपनाने वाला स्वार्थी और महत्त्वाकांक्षी कांग्रेसी कार्यकर्ता, सांप्रदायिक सौहार्द भाव का पोषक व एकता का पक्षधर।


शंकरलाल-युवा कांग्रेसी, बेलाग बात कहने वाला मुँहफट कार्यकर्ता।


किशन सिंह-सिक्ख सम्प्रदायवादियों का नेता, उतेजक व हिंसा में विश्वास रखने वाला व्यक्ति।

अन्य पत्रों व नाम:

फजलदीन, नानबाई, रोशनलाल, कश्मीरीलाल, अजीज, मास्टर रामदास, पुण्यात्मका, वानप्रस्थी, देवव्रत, बोधराज, धर्मदेव, हरबर्ट मौलादाद, मीरदाद, हकीम अब्दुलगनी, सरदार बिशनासिंह, खुदा बख्श, करीमखान, एहशान अली, रमजान, इकबाल सिंह।

स्त्रीपात्र

लीजा-अंग्रेजी अधिकारी, रिचर्ड की पत्नी हीन भावनाओं व अकेलेपन की शिकार तरुणी।


नत्थू की पत्नी-पति को अत्यंत करने वाली सुशीला नारी, उदार व कर्तव्य-परायण।


बंतो-सरदार हरनाम सिंह की पत्नी, सांप्रदायिक तनाव की शिकार ग्रामीण महिला।


जसबीर कौर-हरनाम सिंह की अभागिन पुत्री, साम्प्रदायिक दंगे की शिकार।


लक्ष्मीनारयण की पत्नी-पतिपरायणा पुत्र स्नेह व धर्म भीरु महिला, सांप्रदायिक दंगे भयग्रस्त, उदारमना व ममतामयी नारी।


रघुनाथ की पत्नी-उदार हृदया पतिपरायणा व सीधी सादी नारी।


अकरा-रमजान की बहू, सांप्रदायिक भावना से ग्रस्त तरुणी।


रजो-अंकरा की सास व रमजान की माँ उदार हृदया दयाशील मुस्लिम नारी।

उपन्यास की वर्तमान प्रासंगिकता उपन्यास की वर्तमान प्रासंगिकता यह है कि वह आजादी के पूर्व अंग्रेज हाकिमों की फूट पैदा करने वाली और इस आधार पर शांति व्यवस्था के नाम पर अपने अस्तित्व को महसूस कराने वाली नीति सम्बन्धी दोगली चालों की ओर संकेत करता हुआ साम्राज्यवादी ताकतों की मौजूदा भूमिका पर प्रश्न चिन्ह लगाता है। अंग्रेज हाकिम आज नहीं हैं तो क्या, साम्राज्यवादी ताकतें और उनके अभिकर्ता तो हैं। अंग्रेज हाकिम और उसके मुरादअली जैसे पिट्ठू की भूमिका के निर्वाह का दायित्व अब साम्राज्यवादी प्रतिगामी तत्वों ने अपने कन्धों पर ले लिया है। देश के भीतर और बाहर उनके हिमायतियों की कमी नहीं है।

दूरदर्शन धारावाहिक तमस में दिए गए वक्तव्य में भीष्म जी ने कहा है कि "स्वतंत्रता के इतने साल बाद भी हम अपने समाज में से साम्प्रदायिक तत्वों को खतम नहीं कर पाए हैं। आज भी धार्मिक और जातीय दुर्भावना फैलाने वाले तत्व हमारे बीच सक्रिय हैं। 'तमस’ का मकसद है -इन संकीर्ण साम्प्रदायिक तत्वों को समझना, इनकी साजिश को समझना. इन्हें बेनकाब करना। विभाजन जैसी त्रासद ऐतिहासिक घटना को भीष्म जी ने नजदीक से देखा ही नहीं, भोगा भी है। इसलिए जिस परिवेश का ओर जिन स्थितियों का चित्रण किया है उनका निजी और निकट का परिचय है। इस कारण इस उपन्यास में एक आत्मीय और विश्वसनीयता भी मिलती है। लेखक के वर्णन इतने जीवंत हैं कि स्थितियां सजीव हो जाती हैं चाहे वह प्राकृतिक परिवेश का वर्णन हो या व्यक्ति की भीतरी हलचलों का । परिवेश की दृष्टि से 'तमस' एक प्रभावोत्पादक कृति बन पड़ी है।


Wednesday, September 22, 2021

सामाजिक और भावनात्मक लर्निंग (SEL) क्या है?

सामाजिक और भावनात्मक लर्निंग (SEL) क्या है?


   भारत की राष्ट्रीय शिक्षा नीति (२०२०) में सामाजिक और भावनात्मक लर्निंग (एसईएल) को शिक्षा का एक महत्वपूर्ण पहलू बताया गया है।सामाजिक और भावनात्मक लर्निंग (SEL) मानव विकास, स्वस्थ संबंध बनाने, स्वयं और सामाजिक जागरूकता रखने, समस्याओं को सुलझाने, जिम्मेदार निर्णय लेने और अकादमिक  लर्निंग के लिए बुनियादी आवश्यकता है।  सामाजिक और भावनात्मक लर्निंग (एसईएल) के प्रमुख तत्वों में सहानुभूति (empathy) और मन के सिद्धांत (theory of mind) का विकास शामिल है।  'सहानुभूति' (empathy) दूसरे व्यक्ति की भावनाओं को समझने और इस बात से अवगत होने की क्षमता है कि वे उन भावनाओं को क्यों महसूस कर रहे हैं। 'मन का सिद्धांत' (theory of mind)दूसरों के इरादों, ज्ञान और विश्वासों को समझने और यह पहचानने की क्षमता है कि वे आपके अपने से अलग हो सकते हैं। शोध में पाया गया है कि अधिक सामाजिक कौशल और भावनात्मक नियमन वाले छात्रों के सफल होने की संभावना अधिक होती है।


   वास्तव में यह, शरीर विज्ञान (फिजियोलॉजी} में निहित है।  न्यूरोबायोलॉजिकल रूप से, मस्तिष्क के विभिन्न भाग जैसे प्रीफ्रंटल(prefrontal)  और फ्रंटल कॉर्टिस (frontal cortices), एमिग्डाला(amygdala), और सुपीरियर टेम्पोरल सल्कस ( superior temporal sulcus) सामाजिक और भावनात्मक लर्निंग (SEL) के संज्ञानात्मक तंत्र(cognitive mechanisms)में शामिल हैं।   वैज्ञानिकों ने प्रस्तावित किया है कि सामाजिक और भावनात्मक लर्निंग (SEL) के शारीरिक और मनोवैज्ञानिक कारक स्वाभाविक रूप से जुड़े हुए हैं।

मस्तिष्क प्रणाली जो बुनियादी मानव व्यवहार के लिए जिम्मेदार हैं, जैसे भूख लगना, सामाजिक और भावनात्मक लर्निंग (SEL) में शामिल जटिल तंत्र के लिए पुन: उपयोग किया जा सकता है।  यह समझा सकता है कि जिस तरह से हम शारीरिक रूप से महसूस करते हैं वह दुनिया के हमारे सामाजिक-भावनात्मक मूल्यांकन को सीधे प्रभावित करता है।  

Sunday, September 19, 2021

भाषा संप्रेषण

भाषा संप्रेषण

आर.पी मिश्रा

भाषा संप्रेषण का साधन है अर्थात दो व्यक्ति भाषा के माध्यम से विचारों का आदान-प्रदान करते हैं। जब व्यक्ति माइक का इस्तेमाल करता है; तो संप्रेषण का क्षेत्र बढ़ जाता है। जब व्यक्ति लेखन का उपयोग करता है, तो उसका पाठक वर्ग क्षेत्र और काल की दृष्टि से विस्तृत हो जाता है। इस तरह विज्ञान में उन्नति और प्रौद्योगिकी के विकास कारण संप्रेषण का विस्तार होता गया। हम जिन माध्यमों से संप्रेषण करते हैं उन्हें संचार साधन कहते हैं और वह संप्रेषण भी आधुनिक संदर्भ में संचार कहा जाता है। यह रोचक तथ्य है कि अंग्रेजी में संप्रेषण, संचार दोनों के लिए एक ही शब्द है-Communication. हिन्दी में भाषिक व्यापार संप्रेषण है, संप्रेषण के साधनों के संदर्भ में भौतिक संदेश संप्रेषण संचार है।
संप्रेषण के तीन पक्ष हैं-संप्रेषित करने वाला (वक्ता या लेखक) , संदेश जो संप्रेषित किया जाता है और संदेश ग्रहण करने वाला (श्रोता या पाठक) । भाषा की दृष्टि से संदेश की संप्रेषणीयता का सवाल आता है। उस दृष्टि से भाषा एक कोड है, अर्थ की वाहिका है। अगर कोड त्रुटिपूर्ण हो तो संदेश संप्रेषित नहीं होगा। इस कारण शुद्ध उच्चारण, सही लेखन, उपयुक्त शब्दों का प्रयोग, व्याकरण सम्मत वाक्यों की रचना संप्रेषण के लिए आवश्यक है। यह संप्रेषण का भाषा वैज्ञानिक पक्ष है।
  भाषिक संप्रेषण में दोनों पक्षों में परस्परता एक प्रमुख लक्षण है। इस कारण वक्ता और श्रोता; या लेखक और पाठक यह सुनिश्चित करते हैं कि संदेश उचित ढंग से संप्रेषित हो रहा है या नहीं। संप्रेषण को साधना एक अनिवार्य कौशल है, जिसकी झलक संप्रेषण की स्थितियों में देखी जा सकती है। संप्रेषण के औपचारिक संदर्भ है जैसे पत्र लेखन, भाषण, साक्षात्कार कार्यालय की बैठक आदि। उन संदर्भों में विचारों के संप्रेषण को औपचारिक रूप में निश्चित किया गया है। जैसे पत्र लेखन में सम्बोधन, विषय प्रवर्तन, स्वलेख, भेजने वाला का पता आदि लेखन को संदेश की दृष्टि से सुनिश्चितता प्रदान करते हैं। इस तरह विविध विधाओं की भाषाएँ शब्दावली, अभिव्यक्तियों आदि विधागत भाषिक अभिलक्षण हैं, जो संप्रेषणीयता सुनिश्चित करते हैं।
संचार का संदर्भ भौतिक साधनों से है। आधुनिक युग में दूर संचार, उपग्रह संचार, इंटरनेट आदि साधन विकसित हुए हैं, जिनसे संप्रेषण के नये आयाम खुले हैं। टेलीकांफ्रेंसिंग ( teleconferencing) एक नया संप्रेषण है, जिसमें विश्व भर के विद्वान पूरी परस्परता के साथ विचार-विमर्श में भाग ले सकते हैं। यह भौतिक संप्रेषण के कारण ही संभव हुआ है।


  जन संचार (mass communication) उधार-अनुवाद को प्रक्रिया से बना शब्द है। वास्तव में यह संप्रेषण का एक नया आयाम है जिसमें पूरा समाज संदेश देने और लेने का काम करता है। रेडियो, पत्रकारिता, टेलीविज़न आदि में परस्परता के अभाव में भी लोगों की व्यापक प्रतिभागिता रहती है। वैसे संचार साधनों के विकास के कारण इनमें परस्परता भी बढ़ी है। जन संचार ने इस बदलती परिस्थिति में कई नई विधाओं को भी जन्म दिया है। जन संचार के साधन केवल सूचनाओं का ही प्रसारण नहीं करते, बल्कि वैचारिक धरातल पर भी समाज दूसरे समाजों को अपने संदेश प्रभावित कर सकते हैं। इसे लोग संस्कृति पर प्रभाव के रूप में देखते हैं और इसकी उपादेयता या अवांछनीयता के बारे चिंताशील है।





Wednesday, September 8, 2021

मैला आंचल” आंचलिक उपन्यास

 “मैला आंचल”   आंचलिक उपन्यास

आर.पी. मिश्रा

सन् 1954 में प्रकाशित रेणु का "मैला आंचल”  हिंदी साहित्य में आंचलिक उपन्यास की परंपरा को स्थापित करने का प्रथम व सफल प्रयास है। "मैला आंचल” वस्तु और शिल्प दोनो ही स्तरों पर अपने पूर्ववर्ती उपन्यासों से अलग इसलिए है कि उसमें पहले से चली आ रही परंपरा को छोड़ कर एक नए शिल्प में ग्रामीण जीवन को प्रस्तुत किया है। उपन्यासों में नायकत्व की जिस परंपरा को निभाया जा रहा था उसमें बदलाव लाया अर्थात् व्यक्ति के स्थान पर समूचे अंचल विशेष को ही नायकत्व प्रदान किया। इसी के साथ दूसरा महत्वपूर्ण परिवर्तन यह किया कि उस अंचल विशेष की भाषा का अधिक से अधिक प्रयोग किया ताकि उस जन समुदाय की इच्छा-आकांक्षा रीति-रिवाज, पर्व-त्यौहार सोच-विचार को ज्यादा प्रामाणिक रूप में चित्रित किया जा सके। मैला आँचल के पहले संस्करण की भूमिका में स्वयं रेणु ने उसे "आंचलिक उपन्यास" कहा है। जिसकी कथा के केंद्र में है बिहार का पूर्णिया जिला, जो अपने पिछड़ेपन के लिए कुख्यात रहा है। रेणु के शब्दों में, “इसमें फूल भी है शूल भी, धूल भी  गुलाल भी- मैं किसी से भी दामन बचाकर निकल नहीं पाया।” यही वह विशिष्ट जीवन संदर्भ है जो रेणु के उपन्यास का यथार्थ है। इन्हीं दो बिंदुओं को चिन्हित करते हुए हम आंचलिक उपन्यास से उन उपन्यासों को अलग करते हैं जो गाँव की पृष्ठभूमि को आधार बनाकर लिखे गए हैं। इस तरह इनको दो श्रेणियों में रखा जा सकता है। पहली श्रेणी में आते हैं प्रेमचंद के "प्रेमाश्रम" "रंगभूमि" और "गोदान" के अतिरिक्त शिवपूजन सहाय का "देहाती दुनिया" शिवप्रसाद रुद्र का "बहती गंगा", भैरवप्रसाद गुप्त का "सती मैया का चौरा" और नागार्जुन का "बलचनमा"। इन सबकी पृष्ठभूमि में गाँव की संवेदना रची बसी है। "गोदान से लेकर आज तक न जाने कितने ही उपन्यास लिखे गए हैं जिनकी पृष्ठभूमि में गाँव का जीवन अपनी अच्छाई-बुराई के साथ निहित है। लेकिन ये उपन्यास किसी अंचल विशेष की समूची तस्वीर पेश नहीं करते बल्कि इनकी रुचि आम भारतीय गाँवों में हो रहे बदलाव को चित्रित करने में ज्यादा है। "मेरीगंज" गाँव का जीवंत चित्र उसमें रह रहे व्यक्तियों की विनोदप्रियता, परस्पर वैमनस्य, प्रेम, घृणा, तिरस्कार, द्वेष, जलन, समर्पण, अमानवीय शोषण, मानवीय संबंध, संवेदना, करूणा आदि मानवीय गुणों-अवगुणों के समस्त उतार-चढ़ावों के साथ रेणु ने उपस्थित किया है। इस उपन्यास में उपस्थित किए गए बाह्य नैतिकता के प्रति तिरस्कार का भाव भी उभरकर आता है तो आंतरिक नैतिकता के लिए छटपटाहट भी दिखाई देती है। परस्पर विरोधी मान्यताओं के बावजूद "मैला आचल” के केंद्र में जीवन के प्रति गहरी आस्था का भाव निहित है। इसमें बैलों के गले में पड़ी घंटियों की रुनझुन एक संगीत का सृजन करती है। एक लय समूचे उपन्यास में व्याप्त है। यही लय जीवन के प्रति आस्था का संचार करती है। मैला आचल जिस प्रकार आंचलिक परिवेश को जीवंत बनाने में सक्षम है उसी प्रकार उसमें अपने समय का बोध भी परिलक्षित होता है। मेरीगंज जैसे पिछड़े ग्रामांचल में मलेरिया केंद्र खुल जाने से जन-जीवन में एक तरह की हलचल पैदा हो जाती है। मार्टिन द्वारा की गई कोशिश लगभग पैंतीस वर्षों के बाद मलेरिया केंद्र के खुलने से साकार होना विज्ञान और आधुनिकता को अपनाने की रफ्तार को खुद ही बयान करती है। भूत-प्रेतो और जीनों डाकिनियों के अस्तित्व में विश्वास करने वाली और उनकी प्रसन्नता अप्रसन्नता की चिंता से निरंतर ग्रस्त रहने वाली जनता के अंधविश्वासी मन की भयानक परिणति गनेश की नानी की हत्या में होती है।

जातिव्यवस्था का कट्टर रूप भी यहाँ दिखाई देता है। गाँव के हर एक व्यक्ति के मन में डॉ. प्रशांत की जाति मालूम करने की प्रबल इच्छा है। ब्राह्मण, क्षत्रिय राजपूत यादव, दलितों के अलग-अलग टोले हैं, दलितों के टोले में सवर्ण लोग तभी प्रवेश करते हैं, जब कोई निहायत ही स्वार्थ हो । राजपूतों को जब मजदूरी के लिए दलितों को बुलाना होता है तभी वे दलितों की बस्ती में जाते हैं, अन्यथा छुआछूत का पूरा माहौल है। मठ के महंत द्वारा पूरे गाँव को दिए गए भंडारे में हर जाति के लोग अलग पंक्ति में बैठकर खाना खाते हैं लेकिन किसी को इसमें आपत्ति महसूस नहीं होती।

रेणु राजनीति को संपूर्ण जीवन का पर्याय तो नहीं मानते और न ही उसे मानव नियति की मात्र नियामक शक्ति, किंतु वे उसे जीवन को गहरे प्रभावित करने वाली शक्ति के रूप में जरुर देखते हैं। इसी राजनीति ने आजादी के बाद गाँव की संरचना में काफी उलट-फेर किया और धर्म, नैतिकता, आदर्श तथा मानवीय संबंधों के अर्थ बदल कर रख दिया। आजादी के बाद पैदा हुई राजनीतिक क्षुद्रताओं को बहुत गहराई से देखा गया है और इस नए वर्ग की अवसरवादिता और स्वार्थी वृत्ति को उजागर किया है। गांधीवाद की खोल ओढ़े भ्रष्ट राजनेताओं ने भ्रष्टाचार को फैलाने में जो साथ दिया उसके परिणाम आज सबके सामने मौजूद है। आजादी की लड़ाई का उद्देश्य और उस संघर्ष में अंतर्भूत चेतना का आज कहीं अता-पता नहीं है। रेणु ने इसे जगह-जगह उभारने की कोशिश की है और उसके भयंकर परिणामों को संकेतों के माध्यम से भविष्य का चित्र प्रस्तुत किया है। आजादी के बाद स्थिति में सुधार आने के स्थान पर वह पहले से बदतर होती गई। नए कांग्रेसियों की वजह से कांग्रेस के दफ्तरों में एक नयी तरह की संस्कृति ने जन्म लिया। गांधीवाद के प्रति अपनी आस्था के बावजूद उसके नाम में रेणु ने कोई संकोच नहीं किया। राजनीति, समाज, धर्म, जाति सभी तरह की विसंगतियों पर रेणु ने "मैला आंचल" के द्वारा प्रहार किया है। सामाजिक बदलाव की गति के मंद होने के लिए धर्म, जाति, बिरादरी जैसी सामाजिक जकड़न का बहुत बड़ा हाथ रहा है। मनुष्य की योग्यता के निर्धारण में जाति की अब भी निर्णायक भूमिका बनी हुई है।

 आंचलिक संदर्भ 

‘मैला आंचल’ के प्रकाशन से हिंदी में आंचलिक प्रयास की धारा का प्रारंभ माना जाता । अपने प्रकाशन के चार दशक से ज्यादा समय बीत जाने पर भी ‘मैला आंचल’ आज भी हिंदी में आंचलिक उपन्यास के अप्रतिम उदाहरण के रूप में स्थिर है।

 ‘मैला आंचल’ का महत्व केवल एक आंचलिक उपन्यास होने तक ही सीमित नहीं है, यह हिन्दी का व भारतीय उपन्यास साहित्य का एक अत्यंत श्रेष्ठ उपन्यास भी माना जाता है । इस अर्थ में ‘मैला आंचल’ का दर्जा क्लासिक रचना का है ‘गोदान’ के बाद हिंदी के जो कुछ सर्वश्रेष्ठ उपन्यास माने जाते हैं, ‘मैला आंचल’ उनमें से एक है ।

‘मैला आंचल’ व अपने अन्य उपन्यासों में रेणु ने बिहार के मिथिला अंचल को आधार बनाकर अपने अंचल के दुख सुख वहाँ के सहन सांस्कृतिक लोक जीवन को अत्यंत कुशलता और कलात्मकता से औपन्यासिक स्वरूप प्रदान किया है। अपने अंचल को अपनी रचनाओं के केंद्र में रखकर प्रस्तुत करने के कारण फणीश्वरनाथ रेणु हिंदी में आंचलिक उपन्यास की परंपरा के प्रवर्तक के रूप में प्रतिष्ठित हुए। 

‘मैला आंचल’ में रेणु ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण तकनीक का प्रयोग किया है, जिसके द्वारा आंचलिक परिवेश के सौंदर्य उसकी सजीवता और मानवीय संवेदनाओं को उजागर  किया है। दृश्यों को चित्रित करने के लिए लेखक ने गीत, लय-ताल वाद्य मनार, खंजड़ी नृत्य, लोकनाटक जैसे उपकरणों का भी बखूबी इस्तेमाल किया है। ध्वनि का जैसा सर्जनात्मक उपयोग ‘मैला आंचल’ में हुआ है, उतना शायद ही हिंदी के किसी अन्य उपन्यास में हुआ हो। ‘ढाक ढिन्ना’, ताक ढिन्ना’ ‘डा डिगा’! रि-रित्ता धिन-ता’ आदि की अनुगूंज सारे उपन्यास में सुनाई देती है। ध्वनियों के द्वारा लेखक ने पूरे परिवेश को वाणी दी है।लोकगीतों की कड़ियां स्थान-स्थान पर लेखक की मनोभावना व विचार को ही अभिव्यक्ति करती है।

मठ के वातावरण को चित्रित करने के लिए प्रातःकाल का कीर्तन बीजक पाठक साहेब बन्दगी’, का अभिवादन और ‘सतगुरु हो! सतगुरु को बार-बार दोहराने का उपयोग सफलता से किया गया है।

राजनीतिक पार्टियों की गतिविधियों की सरगर्मी को दिखाने के लिए तरह-तरह के नारी सहायता ली गई है। कहीं ‘किसान राज कायम हो’। ‘मजदूर राज कायम हो’। ‘गरीबों की पार्टी सोशलिस्ट पार्टी, सोशलिस्ट पार्टी जिंदाबाद की ध्वनि है तो कहीं की ‘जै हो गन्ही महतमा की गूंज सुनाई पड़ती है। जलसे जुलूस और मीटिंगों में भी ध्वनि और भाषणों का योगदान है। नारों को कहीं-कहीं गीतों में डालने का उपक्रम भी है।


‘मैला आंचल’ में आंचलिक पहलू उभारने के लिए लेखक ने अंचल के भौगोलिक परिस्थितियों के चित्रण से लेकर सामाजिक-सांस्कृतिक पर्यावरण के चित्रण तक बढ़ी गहराई लगाव से प्रस्तुत किया है।  ‘मैला आंचल’ में मौजूद मेरीगंज गांव भौगोलिक, सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अन्य किसी गांव से भिन्न है।  मेरीगंज में मनाए जाने वाले तीज-त्यौहारों गांव में मनाए जाने वाले ऋतपर्वों, लोक-व्यवहार के विविध रूपों व मानवीय संबंधों के विशिष्ट रुपों के वर्णन के माध्यम से रेणु ने "मैला आंचल” में अपने प्रिय अंचल का इतना गहरा व व्यापक चित्र खींचा है कि सचमुच है उपन्यास हिंदी में आंचलिक औपन्यासिक परंपरा की सर्वश्रेष्ठ कृति बन गया है।


 सामाजिक और राजनीतिक संदर्भ

राजनीतिक संदर्भ में रेणु ने 1946 में उपनिवेशवादी शासन की छत्रछाया में कांग्रेसी मंत्री मंडलों के कार्यकलापों और 1948 में अंग्रेजों के चले जाने के बाद उसी शासन को बिना किसी परिवर्तन के चलाए जाने को बड़ी गहराई से चित्रित किया है । भारतीय राजनीति के सभी पहलू कांग्रेसी आंदोलन, समाजवादी आंदोलन, क्रांतिकारी आंदोलन, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की हिंदू राज्य की पताका लहराने की कोशिश देश का विभाजन सांप्रदायिक दंगों आदि तो उपन्यास में चित्रित हुए ही हैं, शासन व्यवस्था के औपनिवेशिक स्वरूप को भी लेखक ने उद्घाटित किया है, जो स्वतंत्रता पूर्व व स्वातंत्र्योत्तर काल में बिना किसी परिवर्तन के चलता रहता है। शोषक वर्गों व शोषित वर्गों दोनों की ही स्थिति स्वतंत्रता के पहले और बाद एक ही तरह की बनी रहती है। भारतीय समाज के इस कटु राजनीति के यथार्थ को रेणु ने मैला आंचल में ईमानदारी से अंकित कर दिया है। 

उसी प्रकार बिहार के सुदूर क्षेत्र के विशेषत: मिथिला अंचल के सामाजिक मानचित्र को भी रेणु ने मैला आंचल में पूरी विविधता से उकेरा है । गांव का जाति-विभाजन शिक्षा चिकित्सा सुविधाओं का अभाव मानसिक पिछड़ापन गांव में मनाए जाते पर्व-त्यौहार लोकगीत संगीत स्त्री-पुरुष संबंध सामाजिक जीवन के विभिन्न पहलुओं को जिन्होंने बड़ी सजीवता से उपन्यास में अंकित किया है। गांव के जीवन में बलदेव, बावन दास, कालीचरण और डॉक्टर प्रशांत कुमार की मौजूदगी और प्रयत्नों से होने वाले सामाजिक परिवर्तनों का अंकन भी रेणु ने इस परिवर्तन के अंतर्विरोधों के साथ किया है। बिहार के मिथिला अंचल के राजनीतिक, सामाजिक व सांस्कृतिक जीवन का एक प्रामाणिक रूप जानने समझने के लिए ‘मैला आंचल’ एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक कृति का दर्जा रखती है।


Monday, September 6, 2021

जिन्दगीनामा': संक्षिप्त परिचय

 'जिन्दगीनामा': संक्षिप्त परिचय 

आर0पी0 मिश्रा                                           

'जिन्दगीनामा' कृष्णा सोबती का सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपन्यास है, यह उपन्यास बीसवीं सदी के हिन्दी उपन्यास साहित्य की भी बड़ी उपलब्धि है। 'जिन्दगीनामा' में विभाजनपूर्व पंजाब के जन-जीवन और संस्कृति का ऐसा अद्भुत पुनः सृजन किया गया है, जिसे पढ़ते हुए पाठक अभिभूत हो जाता है। 


‘जिन्दगीनामा’  उपन्यास दसवें व अंतिम सिख गुरु गुरु गोविन्द सिंह के सुप्रसिद्ध फारसी क चूँ कार अज हमां हीलते दरगुज़श्त। हलालस्त बुर्दन ब- शमशीर दस्त’ (जब दूसरे सब रास्ते कारगर न हो सके तो जुल्म के खिलाफ तलवार उठा लेना ज़ायज़  है) को समर्पित है। उपन्यास का अंत भी उपन्यास के प्रमुख चरित्र शाह जी द्वारा इन्हीं पक्तियों के उद्धरण से होता है। उपन्यास के आरंभ व अंत दोनों जगह गुरु गोविन्द सिंह के संदेश का सन्दर्भ लेखिका और रचना के पंजाबी संस्कृति से गहरे जुड़ाव का प्रमाण है।

कृष्ण सोबती ने ‘जिन्दगीनामा’ की संकल्पना पंजाब के सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहास के रूप में की है। इतिहास की व्याख्या दस्तावेजों के रूप में न करके जन-सामान्य की सांस्कृतिक गतिविधियों द्वारा की है। कृष्णा सोबती का अपनी मातृभूति व संस्कृति से ऐसा गहरा लगाव है, जो उसके आरंभ में कविता बनकर फूट पड़ा है। उपन्यास के आरंभिक अट्ठाईस पृष्ठ कथा से अलग पंजाब का अत्यंत उदात्त और काव्यात्मक रेखाचित्र प्रस्तुत करते हैं।


उपन्यास में लेखिका के जन्मस्थान अविभाजित पंजाब के अब पाकिस्तान में रह गए जिला गुजरात की कमान की गई है। उपन्यास में कथा तो कम है, दृश्यों का एक सतत् क्रम है।। लेखिका ने डेरा जटा गाँव की यादों को एक संश्लिष्ट दृश्य में बाँधकर प्रस्तुत किया है।


उपन्यास का आरंभ शरद् पूर्णिमा की रात के खूबसूरत चित्रण में होता है। उसके बाद तो पंजाबी गांवों में बसे तीनों समुदायों हिंदू, मुसलमान व सिखों की घी-खिचड़ी जिन्दगी के अनेक चित्र सांस्कृतिक बिम्बों द्वारा प्रस्तुत हुए हैं, जिनमें ‘त्रिंजन भी है, लोहड़ी भी, प्रेम कथाएँ भी ईद और दशहरा भी और पंजाबी का विशेष त्यौहार ‘बैसाखी’ भी शाह जी के परिवार को कथा के केन्द्र में रखकर लेखिका अनेकानेक अन्य कहानियों भी उपन्यास के कलेवर में सँजो दी है।


जिन्दगीनामा उपन्यास में डेरा जट्टा गाँव के जीवन का हर पहलू जीवंत रूप में चित्रित है। उपन्यास के अंत तक देश के स्वतंत्रता संग्राम की गूँज भी सुनाई देने लगती है। भगत सिंह के चाचा अजीत सिंह, क्रांतिकारी कवि लालचंद ‘फलक’ और गदर (1914) के चर्चे उपन्यास के अंत तक शुरू हो जाते हैं। जिन्दगीनामा उपन्यास में वर्णित जीवन का  कालखंड 1910 से 1915 का जान पड़ता है।

‘जिन्दगीमामा’ उपन्यास एक सांस्कृतिक ऐतिहासिक औपन्यासिक रचना है। इसमें व्यक्ति कथा कम, संस्कृति-कथा अधिक चित्रित हुई है। हालांकि इस संस्कृति कथा को बयान करने में लेखिका ने पंजाबी प्रभाव युक्त जिस भाषा का प्रयोग किया है, उससे रेणु के 'मैला आँचल’ की भाषा की तरह कुछ पाठकों के लिए संप्रेषण बाधा आई है, लेकिन सांस्कृतिक परिवेश की रचना की भाषा इसी रूप में सौन्दर्य सृजित कर सकती थी।


 




Saturday, September 4, 2021

झूठा सच: यशपाल (सारांश एवं परिचय)


 'झूठा सच' यशपाल (सारांश एवं परिचय)


झूठा सच निर्विवाद रूप से यशपाल का सर्वश्रेष्ठ उपन्यास है। इसका पहला खंड सन् 1958 और दूसरा सन् 1960 में प्रकाशित हुआ इन्द्रनाथ मदान ने रंगों के रूपक द्वारा इसे लाल से गुलाबी की ओर यशपाल के   संचरण के रूप में देखा है। अर्थात् अपने पूर्ववर्ती उपन्यासों में कम्युनिस्ट पार्टी की विचारधारा और नीतियों के समर्थक जैसे नायकों की रचना यशपाल करते रहे थे, यहाँ वे उससे थोड़ा हटे हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि कम्युनिस्ट विचारधारा के प्रति वे उदासीन हो गए हैं। 'दादा कामरेड', 'पार्टी कामरेड', 'देशद्रोही' आदि उपन्यासों का सामाजिक फलक बहुत छोटा है। इनमें पार्टी नीतियाँ प्रमुख होकर आई है जबकि लाहौर को केन्द्र बनाकर लिखा गया 'झूठा सच' का पहला खण्ड पंजाब और पंजाबियत को समग्रता के साथ अपने में समाए हुए है। विभाजन की त्रासदी उस पर एक आघात बनकर आती है। इस खण्ड में भी असद, गिल जैसे कम्युनिस्ट पात्र है, लेकिन विभाजन की त्रासद पृष्ठभूमि में उनकी किसी क्रांतिकारी भूमिका का उल्लेख सम्भव नहीं था। जबकि उपन्यास के दूसरे खण्ड 'देश का भविष्य में यशपाल ने कम्युनिस्ट पात्रों और उनकी गतिविधियों का समुचित उल्लेख किया है। पी.सी. जोशी और बी.टी. रणदिवे की पोलिटिकल लाइन पर खुलकर चर्चा हुई है। लेकिन इसका सम्बन्ध देश के वर्तमान से न होकर देश के भविष्य से अधिक है।


'झूठा सच' में भी कम्युनिस्ट पात्र है लेकिन उसमें पार्टी और उसकी विचारधारा के बाहर का एक खुला और भरा-पूरा संसार भी है और वही उपन्यास में अधिक महत्वपूर्ण है। उपन्यास का आरंभ लाहौर की एक गली में मास्टर राम लुभाया की माँ की मृत्यु से होता है। लाहौर का शांत और आपसी सद्भाव वाला यह जीवन देखते-देखते नेताओं के राजनैतिक स्वार्थों की भेंट चढ़ जाता है। इन्हीं आर्यसमाजी मास्टर राम लुभाया का बेटा जयदेवपुरी और बेटी तारा 'झूठा सच' के केन्द्रीय पात्रों के रूप में विकसित होते हैं। जयदेव पत्रकार हैं। साम्प्रदायिक दंगों में मारे गए दौलू मामा की मृत्यु पर लिखी गई उसकी टिप्पणी का एक अंश है, "तुम्हारे कत्ल के लिए उत्तेजना दिलाने की जिम्मेदारी उन नेताओं पर है जो तुम्हारे जैसे इंसानों को शासन के सिंहासन पर पहुँच सकने का जीना बनाने के लिए जनता को ईंट गारे की तरह प्रयोग करना चाहते हैं। क्या हम सर्वसाधारण स्वार्थों में अंधे और क्रूर लोगों के सपनों के महलों में पहुंचने के लिए जीने बनते रहेंगे? क्या सर्वसाधारण अपने नेताओं को मानवता की कसौटी पर जाँचकर नहीं परखेंगे? क्या अपने स्वार्थों के लिए सर्वसाधारण को अंधा बना देना ही धर्म की रक्षा, प्रजातन्त्र और जनवाद है?...........” (झूठा सच. पृ. 137) जयदेव पूरी की इस टिप्पणी में पत्रकारोचित  आवेश के बावजूद राजनीति और नेताओं के प्रति हताशा का स्वर बहुत स्पष्ट है।‘झूठा सच' के समर्पण में यशपाल इन दो पक्षों को ही आमने-सामने रखकर उपन्यास के नामकरण की ओर संकेत करते हैं। एक ओर जनसमुदाय है जो सदा झूठ से ठगा गया है और दूसरी ओर झूठ का वव्साय करने वाले नेता है, जिनके द्वारा झूठ से छली जाकर भी जनता सच के प्रति अपनी निष्ठा और उसकी और बढ़ने का साहस नहीं छोड़ती। 

उपन्यास के दूसरे खंड ‘देश का भविष्य’ में यशपाल कांग्रेस की जनविरोधी  राजनीति और उसके दूरगामी परिणामों की ओर संकेत करके उससे मुक्ति का आह्वाहन करते हुए देश का भविष्य देश की जनता के ही हाथ में होने की घोषणा करते हैं। ‘झूठा सच’ के रूसी अनुवाद की भूमिका लिखते हुए चेलेशेव  इस सवाल को उठाते हैं, "ये कौन लोग हैं जिनके काम में भारत का भविष्य है? ये बहुत से लोग हैं, सूद जी जैसे लोगों से कही अधिक। ये वे भूखे लोग हैं जो अपनी रोटी का आखिरी टुकड़ा भी शरणार्थियों को देते है। ये साहसी नवयुवक और नवयुवतियों है जो धार्मिक कट्टरता की आग को बुझाने के लिए कृतसंकल्प है। ये वोट डालने वाली साधारण जनता है जो सूदजी तथा उन जैसे लोगों का विरोध करती है। उपन्यास के अंत में डॉ0 नाथ का स्वगत कथन पूरी तरह से प्रतीकात्मक है। इससे विश्वास होता है कि जनता निर्जीव नहीं है और वह सदा मूक भी नहीं रहती.. ..." (यशपाल के पत्र, मधुरेश, पृ. 128)

यशपाल मूलत: एक मध्यवर्गीय समाज के लेखक है। मध्यवर्ग के चित्रण और प्रतिनिधित्व की दृष्टि से ‘झूठा सच’ एक बड़ा और सार्थक प्रयास है। राम ज्वाया, रामलुभाया, जयदेव, तारा, पंडित गिरधारी लाल, कनक, नैयर, डॉ० प्राणनाथ और पंजाब के असंख्य परिवार मध्यम वर्ग के विभिन्न स्तरों का प्रतिनिधित्व करते हैं। पारिवारिक स्वार्थों का तनाव और सम्मिलित परिवारों का विघटन, आर्थिक संकट और साधनहीन श्रेणी की विरासत, संघर्ष लिए तैयार युवा पीढ़ी आदि 'झूठा सच' के पलक को एक प्रीतिकर विस्तार देते हैं। प्रेम, विवाह, शिक्षा और रोजगार की समस्याएँ एवं अर्थाभाव और हीन सामाजिक स्थिति से उत्पन्न कुठाओ और हीनभाव के विभिन्न रूप जयदेव और तारा के चरित्रों में मिलते हैं। इस समाज में विवाह की समस्या सबसे बड़ी और जटिल है। तारा और कनक के माध्यम से लेखक इसके विविध पक्षों पर विचार करता है। गिरधारी लाल इन दो ध्रुवों  के बीच जैसे सामजस्य और संतुलन स्थापित करते हैं। विवाह को एक सामाजिक-आर्थिक समझौते के रूप में स्वीकृति देकर वे विश्वास करते हैं कि सामाजिक-आर्थिक चौखटे के बाहर जाकर वह बिखर जाएगा। शीलो और रतन का प्रसंग इसी समस्या का एक और पक्ष है। भले ही समाज की दृष्टि में यह तारा पर व्यभिचार को प्रश्रय देने का उदाहरण हो, लेकिन तारा ने शीलो को रतन से मिलाकर सामाजिक क्रांति विशेषतः नारी मुक्ति की दिशा में एक सही कदम उठाया है। उपन्यास के अधिकांश महत्वपूर्ण पात्र मध्यवर्गीय समाज से संबद्ध है और वे अपने समाज और परिवेश के प्रति सच्चे और ईमानदार है। पात्रों के इस वैविध्य के कारण ही 'झूठा सच’ वस्तुतः सामाजिक जीवन का महाकाव्य बन सका है। यह लेखक की एक बड़ी सफलता है कि वह प्रमुख और गौण दोनों प्रकार के पात्रों पर समान रूप से ध्यान केन्द्रित कर सकता है। तारा, पुरी और कनक जैसे मुख्य पात्रों के साथ गिरधारी लाल, नैयर, गिल, असद, मर्सी, दत्ता, उर्मिला के अतिरिक्त शीलो, रतन, भगवती, पूरणदेई, सीता, मेलादेई, कतारो, खुशालसिंह आदि जैसे ढेरों पात्रों को लेखक ने गहरी आत्मीयता और संयम के साथ गढ़ा है।


जयदेवपुरी उपन्यास का नायक और मुख्यपात्र है। वह अपनी सारी दुर्बलताओं, शक्ति और संभावनाओं के साथ उपन्यास में उपस्थित है। उसके आदर्शों पर धीरे-धीरे मध्यवर्गीय जीवन का यथार्थ और उसकी वास्तविकताएँ हावी होती जाती है। सारे जद्दोजहद के बाद, परिस्थितियों से समझौता करके, वह एक वामपंथी कांग्रेसी और फिर अवसरवादी नेता बन जाता है। यदि लेखक चाहता तो अपने पूर्व उपन्यासों की परम्परा में उसे आसानी से कम्युनिस्ट हीरो बनाया जा सकता था। लेकिन यह काम वह उससे न लेकर गिल जैसे बहुत से दूसरे पात्रों से लेता है। पुरी मध्यवर्गीय आकांक्षाओं और विडम्बनाओं का एक प्रतिनिधि चरित्र है, जिसमें विकास के स्थान पर लगातार हास लक्षित किया जा सकता है।


उपन्यास के स्त्री-पात्रों में तारा और कनक दोनों ही समान रूप से महत्वपूर्ण है। अपने-अपने ढंग से वे दोनों ही मध्यवर्ग के दो भिन्न स्तरों का प्रतिनिधित्व करती हैं।

तारा आरंभ में एक साधारण लड़की के रूप में सामने आती है जो अपने परिवेश की विद्रूपताओं से लड़ने के लिए अपनी सारी सीमाओं के बीच, हर मुमकिन कोशिश करती है।  उसकी त्रासदी किन्हीं अर्थों में समूचे मध्यवर्ग की त्रासदी है। घटना के बहाव में सोमा की तरह बहती नहीं है, बल्कि बहाव को काटकर मनचाही दिशा में बढ़ने के लिए संघर्ष  करती है। कनक अपेक्षाकृत अधिक सहज और सरल है। भारी कठिन और विपरीत स्थितियों के बीच भी वह अपनी निष्ठा और आस्था को बचाए रखती है। उर्मिला शुरू में एक किशोरी है जो सिर्फ अपनी धमनियों में बहते रक्त के प्रति ही सच्ची है। लेकिन बाद में यह गलत समझौतों से ऊपर उठकर अपने पैरों पर खड़ी हो अपने जीवन और भाग्य का निर्माण करने वाली स्त्री में बदल जाती है। इनके अलावा भी सैकड़ों छोटे-बड़े पात्र है जो पंजाब की धरती की बू-वास लिए है, जो संघर्ष करते हैं और जीवन की बेहतरी के लिए हर मुमकिन कोशिश करते हैं।


उपन्यास का पहला खंड 'वतन और देश' मुख्य रूप से लाहौर पर केन्द्रित है। पंजाबी जीवन का लोक रस, उसके रीति-रिवाज, आचार-व्यवहार, बोलियाँ, फेरी वालों की आवाजें और गीत आदि उसे गहरी स्थानीय रंगत देते हैं। लेकिन इसमें आचलिकता का कहीं कोई आग्रह नहीं है। उपन्यास का आरंभ ही रामज्वाया और रामलुभाया की माँ की मृत्यु पर स्यापे से होता है। यह वह सूत्र है जो उपन्यास के भावी विकास की दिशा का संकेत देता है। लाहौर की गलियाँ और बाजार, अनारकली, मालरोड, ग्वालमंडी, मजंग, नीला गुबंद, शाहमली, भाटी दरवाजा, भोला पांधे की गली आदि लगता है जैसे समूचा लाहौर मूर्तरूप से सामने खड़ा है। स्यापे में कौला नाहन उलाहना देती है "बोल मेरिए राणिए रामजीदा नाम .. फेरी वाले चिल्लाते हैं, "लै लौ जी जीकेल्ले  हरी छाल दे..... मरूद अलाहाबादी, नार काबल कंधार देजे.......” भागवंती गाली देती है..... "ये झूठे चुगली लगाने वाले बच्चे-पिट्टे, एंडीचड्णे मरैं, इनकी सात पीढ़ियों औन्तर रहे।"....... ये सारी चीजें उपन्यास की प्रामाणिक स्थानीयता की दृष्टि से उल्लेखनीय है। कदाचित पहली बार यशपाल 'झूठा सच’ में पंजाब के जनजीवन के बहाव में इतना तन्मय होकर बहे हैं।


भाषिक प्रयोग की दृष्टि से भी ‘झूठा सच' एक श्रेष्ठ, सफल और जन-जीवन की भाषा का प्रतिनिधि उपन्यास है। संतुलन, अनुपात और स्थान का ध्यान रखते हुए लेखक ने उपन्यास की भाषा को पंजाबी रंगत दी है, जिसमें भाषा की अपनी स्थानीय गंध सी बसी है। उसमें कितने ही पंजाबी शब्द-अमरू, भाया, कुड़माई, भाइया, सिरसड़े, झाई-नालदा आदि अपने मूल रूप में उपस्थित हैं। पढ़े-लिखे मध्यवर्गीय पात्र बोलचाल में अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग भी करते हैं-अपने खास पंजाबी उच्चारण के साथ। भोला पांधे की गली का निम्न मध्य वर्ग जो भाषा बोलता है, उससे उसकी मिट्टी का आत्मीय और अन्तरंग संबंध है। उपन्यास के प्रथम खण्ड में कितने ही मुस्लिम पात्र है जो उर्दू बोलते हैं। लेकिन इन पात्रों की उर्दू का भी अपना-अपना रंग और स्तर है। गौस मुहम्मद की भाषा ठीक वैसी ही नहीं है जैसी हाफिज जी की है। उपन्यास में ब्यौरों और वृत्तांत वाला रचना-विधान ठीक वैसा ही है जैसा किसी विशाल जनजीवन का चित्रण करने वाले किसी बड़े फलक के उपन्यास का होना चाहिए। उसका शिल्प ‘बूँद और समुद्र', 'भूले बिसरे चित्र' और प्रेमचंद के अधिकांश बड़े फलक वाले उपन्यासों वाला शिल्प है।


भाषा की दृष्टि से विचार करें तो ‘झूठा सच' के शब्द या वाक्यांश प्रयोग में एक बात खटकती है। लगता है, यशपाल रेणु के उपन्यासों की भाषा की अत्यधिक आंचलिकता, जो प्रायः पठनीयता में बाधक बनी है, से उबरने के प्रति काफी सावधान दिखाई देते हैं। इसलिए वे ठेठ पंजाबी शब्दों और वाक्यांशों का हिन्दी रूपान्तर कोष्ठकों में देते चलते हैं। जैसे-उलाहनी (विलाप के बोल), डिट्ठे पलंगा बालिए (भरे पूरे घर वाली), हुँदया हुक्म चालिए (जिसका हुक्म चलता हो), लग्गे बागा वालिए (अनेक बागों की मालकन) इसके साथ ही विशिष्ट पात्रों द्वारा बोले गए अंग्रेजी शब्दों, वाक्यांशों का कोष्ठकों में हिन्दी रूपान्तर भी देते चलते हैं। वस्तुतः भाषा प्रयोग की यह पद्धति उपन्यास के पाठ-प्रवाह में बाधक बनी है।


'झूठा सच' के दूसरे खण्ड देश का भविष्य में यशपाल उस समूची प्रक्रिया को बहुत विश्वसनीय रूप में अंकित करते हैं कि कैसे रातों-रात कांग्रेसियों और उनके हिमायतियों की एक पूरी की पूरी फौज खड़ी हो जाती है। सूद जी, अवस्थी जी, ठाकुर साहब और मिसेज़ अगरवाला जैसे लोग अपनी उपस्थिति में अकेले नहीं हैं। देश की आजादी के साथ जन्मे वे एक पूरे वर्ग के रूप में उभरे हैं। अंग्रेजों के जमाने में यही मिसेज अगरवला ब्रिटिश निटिंग क्लब की मेंबर थीं और किराए पर स्वेटर बुनवाकर ब्रिटिश जवानों को भिजवाती थीं। अब वे खद्दर पहनने लगी हैं- जो, उन्हीं के अनुसार, उनके पेट पर मूँज की तरह गड़ता है। गांधी जी की हत्या वाली रात में शराब के बीच कांग्रेसी नेताओं की बहसों के प्रसंग कहीं-कहीं अतिरंजनापूर्ण लग सकते हैं, लेकिन फिर लेखक जल्दी ही पाठक का विश्वास पा लेता है।


'झूठा सच' जैसे बड़े फलक और आकार वाले उपन्यासों पर 'बाह्य विस्तार का आरोप जब-तब लगाया जाता रहा है। उसका पहला खण्ड अपेक्षाकृत अधिक संश्लिष्ट और सुगठित है। लेकिन उसमें भी अंत तक पहुँचते-पहुँचते इस विस्तार का मोह सचमुच बढ़ा है। बंतो, अमरो, सतवंत और दुर्गा आदि की अलग-अलग कहानियों का भी सार एक ही है। वे सब अमानुषिकता और नृशंसता के ही बयान हैं। उपन्यास का दूसरा खण्ड ढीला-ढाला सा है। उसमें जनता के संघर्ष और नेताओं के व्यापक भ्रष्टाचार का संतुलन भी डगमगाया है। लेकिन इन सारी सीमाओं के बावजूद 'झूठा सच' यशपाल का सर्वश्रेष्ठ उपन्यास तो है ही, वह हिन्दी के कुछ उल्लेखनीय उपन्यासों में से भी एक है। प्रेमचंद की जनवादी परम्परा का विकसित, परिष्कृत और समयानुकूल परिवर्तित रूप उसमें देखा जा सकता है। अपने 'विशाल फलक, बहुविध समस्याओं और व्यापक जीवन चित्रों के कारण यह उनके अन्य उपन्यासों से विशिष्ट और श्रेष्ठ है।



Thursday, September 2, 2021

हिंदी साहित्य प्रश्नोत्तरी #1

 हिंदी साहित्य प्रश्नोत्तरी #1

आर0पी0 मिश्रा


1. प्रसाद के महाकाव्य ‘कामायनी’ का प्रकाशन वर्ष क्या है?
(अ) 1931 ई.
(ब) 1930 ई.
(स) 1932 ई.
(द) 1936 ई.

उत्तर: (द) 1936 ई.

2. ‘कुकुरमुत्ता’ के रचयिता हैं—
(अ) दुष्यंत
(ब) निराला
(स) त्रिलोचन
(द) भवानी प्रसाद मिश्र

उत्तर: (ब) निराला

3.  यामा’ के रचयिता कौन हैं?
(अ) निराला
(ब) महादेवी वर्मा
(स) पंत
(द) जयशंकर प्रसाद

उत्तर: (ब) महादेवी वर्मा



4 . ‘अनामिका’ के रचयिता हैं—
(अ) निराला
(ब) अज्ञेय
(स) त्रिलोचन
(द) नरेश मेहता

उत्तर: (अ) निराला


5. छायावाद की पहली काव्य-रचना कौन सी है?
(अ) रेणुका
(ब) आँसू
(स) तुलसीदास
(द) बापू

उत्तर: (स) तुलसीदास

6. ‘अभी न होगा मेरा अंत/अभी-अभी तो आया है/मेरे जीवन में मृदुल वसंत’—जीवन के सौंदर्य का आस्वाद ग्रहण करने की यह इच्छा किस कवि की है?
(अ) पंत
(ब) प्रसाद
(स) निराला
(द) महादेवी

उत्तर: (स) निराला

7. ‘अंजलि’, ‘अभिशाप’, ‘रूपराशि’, ‘चित्र रेखा’, ‘चंद्रकिरण’, ‘संकेत’, ‘जौहर’, ‘एकलव्य’ आदि किस छायावादी कवि के प्रसिद्ध काव्य-ग्रंथ हैं?
(अ) पंत
(ब) महादेवी
(स) निराला
(द) रामकुमार वर्मा

उत्तर: (द) रामकुमार वर्मा

8. ‘कैदी और कोकिला’ किसकी रचना है? (अ) सियारामशरणगुप्त
(ब) सुभद्राकुमारी चौहान
(स) नरेंद्र शर्मा
(द) माखनलाल चतुर्वेदी

उत्तर: (द) माखनलाल चतुर्वेदी


9. एक भारतीय आत्मा’ के उपनाम से पहचाने जानेवाले..................पराधीनता की वेदना और अथक संघर्ष के अनुभवों को व्यक्त करनेवाले कवि हैं।
(अ) माखनलाल चतुर्वेदी (ब) दिनकर (स) अंचल (द) मैथिलीशरण गुप्त

उत्तर: (अ) माखनलाल चतुर्वेदी


10. ‘न हाथ एक शस्त्र हो, न साथ एक अस्त्र हो/न अन्न, नीर, वस्त्र हो, हटो नहीं, डटो वहीं/बढ़े चलो, बढ़े चलो।’—निहत्थे होकर भी आततायी के सामने डटे रहने का वीरभाव किस कवि ने व्यक्त किया है?

(अ) सोहनलाल द्विवेदी
(ब) नवीन
(स) प्रभात
(द) नरेंद्र शर्मा

उत्तर: (अ) सोहन लाल द्विवेदी

स्वातंत्र्योत्तर भारत और ‘राग दरबारी’

 स्वातंत्र्योत्तर भारत और ‘राग दरबारी

                                                             आर.पी मिश्रा

‘राग दरबारी’ व्यापक कथ्य, गहरी संवेदना और भाषिक संरचना की दृष्टि से एक वशिष्ठ व्यंगात्मक औपन्यासिक कृति है । वर्तमान युग की औपन्यासिक अनिवार्यता से भी यह कहीं विचलित नहीं हुआ है। लोकजीवन के साथ गहरा सम्पर्क ‘राग दरबारी’ की मूलभूत विशेषता है। श्रीलाल शुक्ल ने हिंदी के स्वातंत्र्योत्तर रचनाकारों में एक व्यंग्यकार  के रूप में अलग पहचान बनाई । इस पहचान का ठोस आधार है, सामाजिक राजनीतिक जीवन में उनकी गहरी पहचान। भारत का स्वाधीनता  संग्राम  जिस स्वतंत्रता समानता और भाई-चारा की न्यायपूर्ण व्यवस्था के लिए लड़ा गया था, स्वातंत्र्योत्तर काल में उसकी उपलब्धि नहीं हो पाई। एक संवेदनशील लेखक के रूप में श्रीलाल शुक्ल में संपूर्ण अराजक व्यवस्था और उत्पीड़ित जनजीवन को लेकर गहरा असंतोष दिखाई देता है। श्रीलाल शुक्ल ने स्वातंत्र्योत्तर सामाजिक राजनीतिक विसंगतियो का पर्दाफाश अपनी व्यंग्यात्मक शैली में अत्यंत कौशल के साथ किया है।

जनजीवन में बहुमुखी विकास की तमाम सारी लोकलुभावनी घोषणाओं के बावजूद बहुसंख्यात्मक साधारण आदमी का जीवन बद-से-बदतर हो गया है। एक प्रशासनिक अधिकारी और जनजीवन से गहराई के साथ जुड़े होने के कारण श्रीलाल शुक्ल इस स्थिति से आहत हुए है। फलस्वरूप ‘राग दरबारी’ में बीस-बाईस के विकास की तथाकथित उपलब्धियों की विकलांगता और विद्रूपता को उन्होंने निर्ममता के साथ अनावृत किया है। उपन्यास की मुख्य स्थली शिवपाल गंज भीम खेड़ा ग्राम पंचायत के अंतर्गत आने वाला एक गांव है। लेकिन इस गांव से किसान लगभग गायब है। अनेक प्रकार की सरकारी, गैर-सरकारी व्याधियों से ग्रस्त इस गांव में वैद्यजी हैं, जो अपनी वैद्यकी के साथ ही सहकारी समिति में मैनेजिंग डायरेक्टर और छंगामल विद्यालय इंटर कॉलेज में मैनेजर हैं। अब उनकी नजर गांव के प्रधान पद पर हैं। वहाँ बकवास करने वाले ‘गंजहो’  के साथ झूठी गवाही देने में माहिर पंडित राधे लाल ग्रांटखोरी के माहिर कालिका प्रसाद, जुआड़ी-शराबी जोगनाथ, छात्र-नेता रुप्पन, कुंठित-रीढ़हीन, रिसर्च स्कॉलर रंगनाथ के साथ ही प्रिंसिपल, सुपरवाइजर, मास्टर थानेदार, सनीचर जैसे लोग हैं। इन्हीं से गांव का व्यक्तित्व निर्मित किया गया है। अपने इस रूप में शिवपाल गंज गांव न होकर समूचे भारत के प्रतिनिधि के रूप में चित्रित हुआ है।


1947 ई0 की स्वाधीनता के बाद भारत की स्वाधीन सरकार ने मिश्रित अर्थव्यवस्था की आड़ में देश का विकास के लिए जो पूंजीवादी रास्ता अपनाया उसमें देश की आम जनता विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्र की जनता की बदहाली बढ़ती गई। शासन सत्ता समाज से, जनता के एक बहुत बड़े समुदाय से कटकर एक अत्यंत सीमित वर्ग के हाथों में केंद्रित हो गयी। स्वतंत्रता आंदोलन की मूल कारक शक्ति जनता उपेक्षित रह गयी। संप्रदायवाद, जातिवाद, भाई-भतीजावाद को निजी ही नहीं, सार्वजनिक संस्थानों से भी बढ़ावा मिला। इस आपाधापी, मनमानी का सर्वाधिक शिकार ग्रामीण क्षेत्र बने। सहकारी समितियों विकास खंडों की स्थापना का लाभ ग्रामीण क्षेत्र के मुट्ठीभर प्रभावशाली संपन्न व्यक्तियों और नौकरशाही द्वारा उठाया गया। प्रशासनिक स्तर पर वित्त, स्वास्थ्य और सहकारिता मंत्रालय से संबद्ध श्रीलाल शुक्ल को स्वातंत्र्योत्तर  सामाजिक राजनीति का गहन अनुभव था। इसे उन्होंने अपने उपन्यास ‘राग दरबारी’ में बड़ी ही कलात्मकता से समाविष्ट किया है।

‘राग दरबारी’ कोई राजनीतिक उपन्यास नहीं है। इसमें किसी भी महत्वपूर्ण राजनीतिक घटना को कहीं भी, किसी भी रूप में प्रत्यक्ष रूप से एक कथा का आधार नहीं बनाया गया है। लेकिन उपन्यास में घटित घटनाओं, पात्रों के मनोभावों, उनकी चारित्रिक विशेषताओं की पुष्टि के कतिपय राजनीतिक तथ्यों का संकेत इस प्रकार हुआ है कि तत्कालीन राजनीति पर श्रीलाल शुक्ल का कटाक्ष उजागर हो जाता है।

लेखक ने सनीचर के रूप में विराजमान साक्षात प्रजातंत्र और वैद्यजी के लोकतंत्रीय हथकंडे को भारतीय राजनीति के छल छद्म का पर्याय बना दिया है। इससे लगता है लोकतंत्र का बीज भारतीय जमीन पर पड़ते ही सड़ गया।

‘राग दरबारी’ में शिक्षा-संस्था के रूप में छंगामल विद्यालय इंटर कॉलेज को कथा का प्रमुख केंद्र बनाया गया है। स्वातंत्र्योत्तर भारत में शिक्षा की विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों की शिक्षा संस्थानों में व्याप्त भ्रष्टाचार को उजागर करने के लिए उपन्यासकार ने ऐसा किया है। छंगामल विद्यालय इंटरकॉलेज और तमाम कॉलेजों की स्थापना के पीछे निहित उद्देश्य पर टिप्पणी करते हुए उपन्यासकार ने लिखा है, ‘ये कॉलेज प्रायः किसी स्थानीय जननायक की प्रेरणा से शिक्षा प्रचार के लिए और वास्तव में उसके लिए विधानसभा या लोकसभा की जमीन तैयार करने के उद्देश्य से खोले जाते थे और मुख्य कार्य कुछ मास्टरों और सरकारी अनुदानों का शोषण करना था।

 उपन्यास के कथा-पट पर अंकित कॉलेज के मैनेजर वैद्यजी और छात्र नेता रुप्पन ही नहीं, उसके प्रिंसिपल और खन्ना तथा मालवीय जैसे मास्टरों के कारनामे स्वातंत्र्योत्तर भारत की शिक्षा पद्धति पर गहरा कटाक्ष है। वस्तुतः उपन्यासकार ने ग्रामीण क्षेत्रों की विकृत, भ्रष्ट शिक्षा व्यवस्था ही नहीं, वरन संपूर्ण देश की बौद्धिक क्रीड़ा और शिक्षण प्रशिक्षण व्यवस्था के यथार्थ की हास्यपदता भी प्रकट की है। 

‘राग दरबारी’ में स्वातंत्र्योत्तर भारत के प्रशासन के रूप में शिवपाल गंज थाना, थानेदार और सिपाही ही मुख्य रूप से आए हैं। लेकिन  कोऑपरेटिव यूनियन और छंगामल विद्यालय इंटरकॉलेज के संदर्भ में प्रशासन के सहकारिता अधिकारी और शिक्षा विभाग के अधिकारी भी अपने मूलभूत चरित्र के साथ उपस्थित हुए हैं। शिवपाल गंज के जुआरी संघ के मैनेजिंग डायरेक्टर थानेदार से हाथ जोड़कर कहते हैं कि ‘हुजूर आप मेरा चालान अवश्य कर दें। चालान हो जाता तो सारी झंझट खत्म हो जाती।‘ इस कथन से जुआरी संघ के साथ थानेदार की मिलीभगत का भी पता चलता है। थाने के सामने एक नंग-धड़ंग लंगोटधारी भंग घोट रहा है। वह अकेला सिपाही बीस गांवों की सुरक्षा के लिए तैनात है और जिस हालात में, जहां है वही से बीसों गांवों के अपराध को रोक सकता है। अपराध हो गया तो पता लगा सकता है तथा अपराध नहीं हुआ तो उसे करा सकता है।

 जुआरियों के साथ थानेदार और सिपाहियों की मिलीभगत है। रामधीन भीखम खेड़वी के घर आई डाके की फर्जी चिट्ठी पर भय, सिपाहियों के साथ फर्जी मुठभेड़ का दृश्य पुलिस प्रशासन की कलई पूरी तरह उतार देती है। जिला विद्यालय, डिप्टी डायरेक्टर एजुकेशन, कोऑपरेटिव इंस्पेक्टर की उपस्थिति से सरकारी प्रशासन तंत्र का पूरा यथार्थ सामने आ जाता है। जो कमी रह जाती है, उसे कोऑपरेटिव का सुपरवाइजर गबन के द्वारा पूरा कर देता है।

‘राग दरबारी’ उपन्यास स्वातंत्र्योत्तर भारतीय न्याय-व्यवस्था के यथार्थ का एक जीवंत दस्तावेज है। न्याय की दुस्तरता पर उपन्यासकार ने एक टिप्पणी इस प्रकार की है ‘पुनर्जन्म के सिद्धांत की ईजाद दीवानी की अदालतों में हुई है ताकि वादी और प्रतिवादी इस अफसोस को लेकर न मरे कि उनका मुकदमा पड़ा रहा। इसके सहारे वे चैन से मर सकते हैं कि मुकदमे का फैसला सुनने के लिए अभी अगला जन्म तो पड़ा ही है।‘ 

स्वाधीनता के बाद भारतीय गांवों के समुचित विकास खंडो के साथ ही सहकारी समितियों, ग्राम सभाओं, न्याय-पंचायतों आदि की भी व्यवस्था हुई। इन्हें समुचित रूप से चलाने के लिए बीडीओ, एसडीओ, बहुत सारे इंस्पेक्टरों, ग्राम सेवकों, पंचायत मंत्रियों आदि जैसे कर्मचारियों का जाल बिछाया गया। पंचवर्षीय योजनाओं के प्रावधान से इनके लिए समुचित वित्तीय अनुदान भी सरकार की भारत की लोकतंत्रीय प्रणाली के मद्देनज़र कुछ विकास आधारित संस्थाओं में चुनाव की भी व्यवस्था की गई। इसके अंतर्गत ग्राम सभा के प्रधान का चुनाव गांव के सभी बालिग मतदाताओं द्वारा और ब्लॉक प्रमुख चुनाव, प्रधानों द्वारा किए जाने का प्रावधान था। सहकारी संघ के मैनेजिंग डायरेक्टर के लिए भी चुनावों का प्रावधान रखा गया। ‘राग दरबारी’ में इन तथ्यों को पूरी तरह से ध्यान में रखा गया है। 

उपन्यासकार में ग्राम सभा के चुनावों की हास्यास्पदता को उजागर करने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में प्रचलित तीन पद्धतियों का उल्लेख अत्यंत मनोरंजक ढंग से किया गया है। एक राम नगर वाली, दूसरी  नोवादावाली और तीसरी महिपालपुर वाली। इस प्रकार की पद्धतियां कथाकार की कल्पना भले ही हो लेकिन ग्राम पंचायतों के चुनाव के यथार्थ को आवश्यक उद्घाटित करती है।

 सामुदायिक विकास के लिए योजना आयोग द्वारा पर्याप्त ( अनुदान) दिया जाता है। यह अनुदान सरकारी समिति, ग्राम पंचायत और विकास खंडो के माध्यम से प्राप्त होता है। शिवपालगंज में अनुदान खोर कालिका प्रसाद का अप्रतिम व्यक्तित्व है। यह कार्य में क्षेत्रीय एम.एल.ए. खद्दर की पोशाक और कार्रवाई रोक पाने के कौशल से करते थे। मुर्गी पालन चर्म उद्योग, खाद के गड्ढे पक्का करवाए बिना धुएं का चूल्हा लगवाने, सुलभ शौचालय बनवाने आदि के सारे अनुदान खाकर उन्होंने अपेक्षित कारगुजारी की समुचित रिपोर्ट भेज दी है। मात्र पांच बीघे खेत की जमानत पर वे पचासों तरह के कर्ज और तकबियाँ उदरस्थ कर चूके हैं। यह है, सामुदायिक विकास की यथार्थ का एक छोटा सा उदाहरण। प्रधान बनने के एक महीना पहले ही सनीचर इस महापुरुष को लेकर विकास खंड के कृषि विकास अधिकारी के साथ सहकारी खेती का सौदा कर आता है। भूदान आंदोलन, जमींदारी उन्मूलन, विकास खंडों, सहकारी समितियों, ग्राम पंचायतों की व्यवस्था के बावजूद गांव की बदहाली बढ़ती जा रही है। शिवपाल गंज का थानेदार कहता है कि अब गांव में चोर, भूदानी, कार्यकर्ता की ‘शगल’ (वेश) में आने लगे हैं । उपन्यास में प्रयुक्त भूदानी चेहरा, भूदानी नमस्कार, भूदानी मुद्रा आदि शब्दों का प्रयोग एक विशेष छ्दम में उद्घाटन के लिए हुआ है।

 विकास खण्ड, सहकारी समिति, ग्राम पंचायत आदि लूट खसोट और भ्रष्टाचार के अड्डे बन गए हैं। यहाँ किसान और कृषि कार्य पूरी तरह से गायब है। कृषि क्रांति दरोदीवार पर लिखे नारों तक सीमित रह गई है। जो बाकी रह गया है उसे नेताओं और सरकारी अफसरों के भाषणों से पूरा कर दिया जाता है। शिवपालगंज के बस अड्डे की गंदगी और उस के निकट मिठाई की दुकान, मंदिर, धर्मशाला आदि गंदगी उत्पादक संस्थाएँ उसके नाम को रोशन करती है। गांव के किनारे छोटे से तालाब की गंदगी को देखकर उपन्यासकार को मैथिलीशरण गुप्त की 50 वर्ष पहले लिखी गई कविता की पंक्तियाँ – अहा ग्राम्य  जीवन भी क्या है? याद आ जाती है।

छंगामल इंटर कॉलेज गांव के लिए शिक्षा का नहीं, अशिक्षा का केंद्र बना हुआ है। यहां हुल्लड़बाजी, गुंडई, दुष्चरित्रता की शिक्षा मिलती है। स्थानीय थाना असुरक्षा का केंद्र बना हुआ है। इसके रहते घटनाएं नहीं, दुर्घटनाएं होती है, चोरी नहीं, डकैती पड़ती है। जुआ, शराब आदि के अड्डे उसी के संकेत पर चलते हैं। सबसे ऊपर कोढ़ में खात की तरफ शिवपाल गंज  छाती पर वैद्यजी सवार है।

नैतिक अवमूल्यन की पहुँच परिवार के अंदर भी प्रवेश कर गयी है। माने हुए लठैत ठाकुर दुरबीन सिंह बुढ़ापे में अपने नशेबाज भतीजे के जोरदार तमाचे से कुएँ की जगत पर गिर पड़ते हैं। वृद्ध  कुसहर प्रसाद अपने बेटे छोटे पहलवान की लाठी का शिकार बनते हैं। रुप्पन कई मुद्दों पर अपने पिता वैद्यजी का विरोध करने लगा है। बड़ा बेटा बद्री पहलवान वैद्यजी के मुँह पर खरी-खोटी सुनाने से नहीं चूकता।

स्वाधीनता के बाद पंचवर्षीय योजनाओं के तहत योजना आयोग द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों के आर्थिक विकास के साथ ही बहुमुखी विकास पर रुपया पानी की तरह बहाया गया। लोगों में जिस अनुपात में शासन पर आत्मनिर्भरता की वृत्ति में वृद्धि हुई है, सरकार पर उससे कहीं अधिक अविश्वास बढ़ा। विकास के नाम पर गांव के अंदर हुल्लड़बाजी, असुरक्षा, तनाव, लूट खसोट, पारस्परिक अविश्वास, असहयोग संस्थाजीविता, भ्रष्टाचार वृद्धि हुई है। अस्वस्थ नेतृत्व के कारण राष्ट्रीय भावना का लोप हुआ है। कहीं कोई प्रेरणास्रोत नहीं रह गया। नयी पीढ़ी नितांत खोखली, निस्तेज और उद्दंड सिद्ध हुई । सामुदायिक विकास योजनाओं के तहत शोषण के नये-नये क्षेत्र खुले, जिसका सर्वाधिक प्रमुख क्षेत्र बनी शिक्षा और शिक्षण संस्थाएँ। इन सारी स्थितियों को देखते हुए शहर से आए इंडोलॉजी के शोध छात्रो तथा कथित बुद्धिजीवी बाबू रंगनाथ काफी असंतुष्ट रहने लगे थे। लेकिन प्रधानी में सनीचर की विजय के विजय के बाद उनके धैर्य का बांध डगमगाने लगा। इसका संकेत देते हुए उपन्यासकार ने लिखा है:

“सनीचर के विजय के दिन उसने ( रंगनाथ ने) में बहुत कुछ सोच डाला और उस दौरान उसे प्रदेश की राजधानी में जाने कितने वैद्यजी और मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों की कतार में जाने कितने सनीचर घुसे दिखे।“ (पु0296) लेकिन पवित्र भ्रष्टाचार का केंद्र छंगामल इंटरकॉलेज में मालवीय और खन्ना के विरुद्ध चल रहे षड्यंत्र को देखकर उनके धैर्य का बांध टूट जाता है और वे कहते हैं:

“धरती पर एक शिवपालगंज ही नहीं है। हमारे-तुम्हारे लिए सारा मुल्क पड़ा हुआ है। इस पर भुनभुनाते हुए रुप्पन ने कहा, “मुझे लगता है दादा सारे मुल्क में शिवपालगंज ही फैला हुआ है।“ (पु0 388)  

 उपन्यास में चित्रित समाज के चित्रण से ऐसा लगता है कि इसमें शिवपाल गंज के माध्यम से सारे गांव, समाज ही नहीं वरन समूचे स्वातंत्रयोत्तर भारत का यथावत प्रस्तुत किया गया है। अतः ‘राग दरबारी’ में चित्रित स्वातंत्रयोत्तर भारत के गांव और समाज की वास्तविक स्थिति समूचे देश के यथार्थ को प्रतीकित करती है।





Tuesday, August 31, 2021

गजानन माधव ‘मुक्तिबोध’ – भूल-गलती (कविता)

 

गजानन माधव ‘मुक्तिबोध’ – भूल-गलती (कविता)


गजानन माधव ‘मुक्तिबोध’ जी का आधुनिक युग में ‘प्रगतिवाद’ और ‘प्रयोगवादी’ कविताओं में महत्वपूर्ण स्थान है। उन्हें प्रगतिवाद और नई कविता के बीच का ‘सेतु’ भी माना जाता है। गजानन माधव ‘मुक्तिबोध’ का संपूर्ण काव्य ‘फैंटसी’ शिल्प पर आधारित है। मुक्तिबोध अपने आप में एक अनूठे कवि थे। उनके जैसा उनके पहले कोई कवि नहीं मिलता है और आगे भी इस परंपरा का कोई कवि नहीं दीख रहा है। मुक्तिबोध जी ने 200 के करीब छोटी-बड़ी और लंबी महाकाव्यात्मक कविताएँ लिखी है। मुक्तिबोध की पहचान उनकी लम्बी कविताओं से ही है। सबसे बड़ी बिडम्बना यह है कि इनके जीवन में इनकी कोई भी सग्रह प्रकाशित नहीं हुई थी। ‘भूल-गलती’ नामक कविता उनके काव्य संग्रह ‘चाँद का मुँह टेढ़ा’ में 1964 में प्रकाशित हुई थी। इस कविता संग्रह की भूमिका में शमशेरबहादुर सिंह जी ने संकेत किया है कि मुक्तिबोध की कविता की सबसे प्रमुख विशिष्टता नये और प्राणवान बिम्बों का निर्माण है।

आज हमारे समाज में भ्रष्टाचार और अनैतिकता बढ़ती ही जा रही है, जिससे हमारे हृदय की कोमल भावनाएँ इनके नीचे पीसती ही जा रही है। साहित्य में भी इस तरह की चिंता को समय-समय पर व्यक्त किया जाता रहा है। गजानन माधव मुक्तिबोध इसी विचार को लेकर भूल-गलती नामक कविता की रचना करते है। इस कविता में वे भूल-गलती या भ्रष्टाचार को किसी राजा या शहंशाह की तरह चित्रित करते हैं, जिसके दरबार में समाज के सभी वर्गों के लोग सिर झुकाकर खड़े है। दरबार में सत्य और इमान को जंजीरों में बांधकर लाया जाता है। भ्रष्टाचार रूपी राजा को लोगों की कमजोरियों से ही शक्ति मिलती है। जिससे वह निरंतर और भी अधिक बलशाली होता चला जाता है, लेकिन कवि पूरी तरह से निराशावादी नहीं है। वे इस कविता के द्वारा आशा व्यक्त करते हैं कि कभी न कभी किसी न कसी व्यक्ति की आत्मा जरूर जगेगा और तब वह क्रांति के रास्ते पर चलने लगेगा और उसके पीछे-पीछे सारा समाज भी चलने लगेगा इस तरह बुराई का नाश हो जाएगा।

भूल-गलती (कविता)

भूल-गलती
आज बैठी है जिरहबख्तर पहनकर
तख्त पर दिल के;
चमकते हैं खड़े हथियार उसके दूर तक,
आँखें चिलकती हैं नुकीले तेज पत्थर सी,
खड़ी हैं सिर झुकाए
          सब कतारें
                   बेजुबाँ बेबस सलाम में,
अनगिनत खंभों व मेहराबों-थमे
                           दरबारे आम में।

सामने
बेचैन घावों की अजब तिरछी लकीरों से कटा
चेहरा
कि जिस पर काँप
दिल की भाप उठती है…
पहने हथकड़ी वह एक ऊँचा कद
समूचे जिस्म पर लत्तर
झलकते लाल लंबे दाग
बहते खून के।


वह कैद कर लाया गया ईमान…
सुलतानी निगाहों में निगाहें डालता,
बेखौफ नीली बिजलियों को फेंकता
खामोश !!
                        सब खामोश
मनसबदार,
शाइर और सूफी,
अल गजाली, इब्ने सिन्ना, अलबरूनी
आलिमो फाजिल सिपहसालार, सब सरदार
                         हैं खामोश !!
नामंजूर,
उसको जिंदगी की शर्म की सी शर्त
नामंजूर
हठ इनकार का सिर तान…खुद-मुख्तार
कोई सोचता उस वक्त –
छाये जा रहे हैं सल्तनत पर घने साये स्याह,
सुलतानी जिरहबख्तर बना है सिर्फ मिट्टी का,
वो-रेत का-सा ढेर-शाहंशाह,
शाही धाक का अब सिर्फ सन्नाटा !!
(लेकिन, ना
जमाना साँप का काटा)
भूल (आलमगीर)
मेरी आपकी कमजोरियों के स्याह
लोहे का जिरहबख्तर पहन, खूँख्वार
हाँ खूँख्वार आलीजाह,
वो आँखें सचाई की निकाले डालता,
सब बस्तियाँ दिल की उजाड़े डालता
करता हमें वह घेर
बेबुनियाद, बेसिर-पैर…
हम सब कैद हैं उसके चमकते तामझाम में
                               शाही मुकाम में !!

इतने में हमीं में से
अजीब कराह-सा कोई निकल भागा
भरे दरबारे-आम में मैं भी
सँभल जागा
कतारों में खड़े खुदगर्ज-बा-हथियार
बख्तरबंद समझौते
सहमकर, रह गए,
दिल में अलग जबड़ा, अलग दाढ़ी लिए,
दुमुँहेपन के सौ तजुर्बों की बुजुर्गी से भरे,
दढ़ियल सिपहसालार संजीदा
                      सहमकर रह गये !!

लेकिन, उधर उस ओर,
कोई, बुर्ज के उस तरफ जा पहुँचा,
अँधेरी घाटियों के गोल टीलों, घने पेड़ों में
कहीं पर खो गया,
महसूस होता है कि यह बेनाम
बेमालूम दर्रों के इलाके में
(सचाई के सुनहले तेज अक्सों के धुँधलके में)
मुहैया कर रहा लश्कर;
हमारी हार का बदला चुकाने आएगा
संकल्प-धर्मा चेतना का रक्तप्लावित स्वर,
हमारे ही हृदय का गुप्त स्वर्णाक्षर
प्रकट होकर विकट हो जायगा !!


 इस कविता में मुक्तिबोध जी ने दरबार का अत्यंत जीवंत बिम्ब बनाया है। मुक्तिबोध की लम्बी कविताओं में दृश्यों के बाद दृश्य रहते हैं लेकिन इस कविता में एक ही दृश्य के इर्द-गिर्द समूची कविता गढ़ी गई है। नई कविता में कवि की काव्य भाषा भी खास होती है। उसमे शब्द, बिम्ब और अर्थ एक दूसरे के साथ माला की तरह गुंथे हुए होते हैं। भूल-गलती कविता में फ़ारसी शब्दावली के जरिए मध्ययुगीन वातावरण का निर्माण किया गया है। कविता में बादशाह और कैदी की कथा उतनी ही प्रधानता से चलती रहती है जितनी की प्रधानता से भूल और ईमान की कथा। जयशंकर प्रसाद की कामायनी का विश्लेषण करते हुए मुक्तिबोध ने एक जगह कहा था कि कथा के प्राचीनता के आवरण को चीरकर रह-रह कर प्रसाद के समय का सत्य झाँका जाता है। उसी तरह इस कविता में मध्ययुगीन वातावरण और मनोवैज्ञानिक आवरण को चीरकर मुक्तिबोध के सत्य दिखाई देने लगता है। मुक्तिबोध के सभी कविताओं की विशेषता है, लयात्मक होना। यह लय पानी की लहरों की तरह निरंतर एक विशेष आरोह अवरोह क्रम में चलता रहता है। निराला जी ने कहा है कि ऐसी कविताओं का सौंदर्य ‘आर्ट ओफ़ रीडिंग’ के जरिए खुलता है। इस कविता में उन्होंने फ़ारसी शब्दावली का प्रयोग प्रचुर मात्रा में प्रयोग किया है। समूची कविता की अंतिम चार पंक्तियों में एक भी फ़ारसी शब्द नहीं आया है। यही मुक्तिबोध की स्वाभाविक भाषा है। धूमिल के शब्दों में कोई भी कविता सबसे पहले सार्थक वक्तव्य होती है।” इस कविता के अंतिम पंक्तियों में उसी तरह के वक्तव्य के जरिए कवि का आशावाद दिखाई देता है।

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