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Sunday, December 12, 2021

प्रगतिवाद , हिंदी साहित्य

 'प्रगतिवाद' केवल काव्य प्रवृत्ति नहीं, व्यापक काव्यान्दोलन या साहित्यिक आंदोलन है। उसके पीछे मार्क्सवादी विचारधारा है जो राजनीतिक दृष्टि से आगे विश्वदृष्टि के रूप में भी महत्वपूर्ण है। प्रगतिवाद या प्रगतिशील साहित्य शब्द का प्रयोग 1936 के आसपास हुआ जब प्रगतिशील लेखक संघ स्थापित हो चुका था पर साहित्य में 1930 के बाद ही यह रूझान प्रकट होने लगा था जिसके पीछे बदली हुई राजनीतिक, सामाजिक वास्तविकता थी। प्रगतिवाद एक अर्थ में छायावाद का विकास है दूसरे अर्थ में छायावाद के विरुद्ध विकसित काव्यप्रवृत्ति। अन्तर्वस्तु की दृष्टि से प्रगतिवाद में ऐतिहासिक चेतना सामाजिक यथार्थ दृष्टि, परिवेश या प्रकृति के प्रति लगाव, जीवन के प्रति स्वीकृति का भाव, मानवीय संबंधों में समानता का आग्रह और भविष्योन्मुखी दृष्टि का महत्व है। रचनाविधान की दृष्टि से प्रगतिवाद में यथार्थबोध के अनुरूप नये रूपों की खोज, जीवन की हलचल से भरी भाषा, यथार्थ ज्ञान से प्रेरित ऐतिहासिक मूर्त्तता, लोकरूपों या छन्दों का आवश्यकतानुसार उपयोग, सहजता का शिल्प आदि महत्वपूर्ण हैं। प्रगतिवाद प्रयोगवाद या अन्य आधुनिकतावादी प्रवृत्ति के उभार के कारण कभी बीच में केन्द्र में न रह गया हो किंतु विकास उसका कभी स्थगित नहीं हुआ। यही कारण है कि आज भी जो नयी कविता लिखी जा रही है उसे प्रगतिवाद का ही विकास कहा जाएगा। प्रगतिवाद के प्रमुख कवि हैं : नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, शमशेर, मुक्तिबोध और त्रिलोचन। बाद के कवियों में केदारनाथ सिंह, धूमिल, कुमार विकल, अरुण कमल के नाम लिये जा सकते हैं। यों, ऐसे नामों की सूची बड़ी हो सकती है क्योंकि यह प्रवृत्ति आज पुनः केन्द्रीयता प्राप्त कर चुकी है।

ऐतिहासिक महत्व

प्रगतिवादी का एक काव्य प्रवृत्ति के रूप में और व्यापक साहित्यिक आंदोलन के रूप में ऐतिहासिक महत्व है। जिस समय अतिशय सूक्ष्मता और अति-कल्पनाशीलता के नाम पर हिन्दी कविता गूढ रहस्योन्मुख होती जा रही थी, प्रगतिवाद ने कविता को अपने समय के यथार्थ से, यथार्थ-बोध के अनेक रूपों से जोड़ा और कविता और राजनीति के बीच ऐसा घनिष्ठ संबंध विकसित किया जिससे आगे की कविता भी लाभान्वित हुई। प्रगतिवाद ने कविता संबंधी अवधारणा बदली और अपने समय के तीखे सवालों की गूंज कविता में पैदा की। प्रगतिवाद ने एक नये ही संदर्भ में ‘कविता किसके लिए'- जैसा सवाल उठाया। प्रगतिवाद अपनी ऐतिहासिक भूमिका के लिए साहित्य में स्थायी महत्व का विषय हो गया है।

साहित्यिक महत्व

प्रगतिवादी कविता उदाहरण है कि उसने साहित्य भूमि का विस्तार किया। कविता का संसार

अधिक यथार्थ, प्रामाणिक, व्यापक और विश्वसनीय लगने लगा। कविता की अंतर्वस्तु और रचनाविधान में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए। उपेक्षित जान पड़ने वाले विषयों, चरित्रों को काव्यात्मक प्रतिष्ठा मिली। कविता ने प्रत्यक्ष जीवन, लोकरूपों, लोक प्रचलित छन्दों का नया उपयोग किया और नयी संभावनाएँ खोजी।

प्रगतिवाद : सीमा और व्याप्ति

प्रगतिवाद का विरोध करने वाले ही उसकी सीमा यह बताते रहे हैं कि वह मार्क्सवाद का साहित्यिक रूपांतर मात्र है। पर यह सब जानते हैं कि यदि प्रगतिवाद नाम से परिचित काव्य प्रवृत्ति के महत्वपूर्ण कवियों में नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, शमशेर बहादुर सिंह, गजानन माधव मुक्तिबोध और त्रिलोचन जैसे बड़े कवि हैं तो उनका काम केवल मार्क्सवाद के सिद्धांत विवेक के जरिए नहीं चल सकता। मार्क्सवाद में उनकी आस्था जहाँ व्यापक जीवन ज्ञान में और गहरी जीवनासक्ति में सहायक हुई वहीं वे प्रगतिवाद को समर्थ काव्य प्रवृत्ति के रूप में विकसित करने के लिये, यथार्थ के नये रूपों की समझ के अनुरूप, नयी काव्य शैली का विकास करते रहे हैं। वैसे एक साहित्यिक आंदोलन के रूप में प्रगतिवाद का इतिहास मोटे तौर पर 1936 ई. से शुरू होने के बाद के लगभग बीस वर्षों का इतिहास है किन्तु यह ‘साहित्य में स्वस्थ सामाजिकता, व्यापक भावभूमि और उच्च विचार के निरंतर विकास का इतिहास है, जो न केवल राजनीतिक जागरण से आरंभ होकर क्रमशः जीवन की व्यापक समस्याओं की ओर, आदर्शवाद से आरंभ होकर क्रमशः यथार्थवाद की ओर और यथार्थवाद से आरंभ होकर क्रमशः स्वस्थ सामाजिक यथार्थवाद की ओर अग्रसर होता जा रहा है"। अतः व्यापक अर्थों में प्रगतिवाद न स्थिर मतवाद है न स्थिर काव्य रूप। उसमें निरंतर विकास हुआ है। आज प्रगतिशीलता के व्यापक अर्थ में ऐतिहासिक चेतना, जीवन विवेक, जीवनानुभवों के विस्तार, यथार्थ के मूल रूपों की समझ, जीवनधर्मी सौन्दर्यबोध, प्रकृतिबोध का उल्लेख किया जाता है, फिर भी जीवन को देखने की यथार्थवादी दृष्टि विशेष अर्थ में मार्क्सवादी दृष्टि को यहां प्रमुखता प्राप्त है। प्रगतिवाद के विकास में अपना योगदान देने वाले परवर्ती कवियों में केदारनाथ सिंह, धूमिल, कुमार विमल, अरुण कमल, राजेश जोशी के नाम उल्लेखनीय हैं।

प्रगतिवाद के प्रमुख कवि

नागार्जुन

प्रगतिवादी काव्यधारा के महत्वपूर्ण कवियों में प्रमख नागार्जुन के बारे में आज यह बात सहज ही कही जा सकती है कि समकालीन हिन्दी काव्य परिदृश्य में भी उन्हें केन्द्रीयता प्राप्त है। मैथिली काव्य रचनाओं के लिए साहित्य अकादमी द्वारा सम्मानित नागार्जुन खड़ी बोली हिन्दी कविताओं में भी मूल काव्य ऊर्जा, गहरी आंचलिकता, ठेठपन, तदभवता, व्यंग्यपूर्ण आक्रामकता और गहरी जीवनासक्ति का प्रमाण देते हैं। राजनीतिक कविताएं नागार्जुन के यहाँ बड़ी संख्या में हैं। उनमें जो सपाट तात्कालिक या इकहरी नहीं हैं, नागार्जुन की बड़ी कवि-प्रतिभा का प्रमाण देती हैं। कविता के लिए जो विषय अकल्पनीय या असंभव माने जाते हैं उनपर भी नागार्जुन ने कविताएँ लिखी हैं और असाधारण सफलता प्राप्त की है। जीवन के प्रति प्रगाढ़ राग की कविताएँ भी उनके यहाँ कम नहीं हैं। पर उनकी कविता का एक रंग वह है जहाँ नफरत, प्यार, विक्षोभ, जिज्ञासा घुलमिल जाते हैं उनमें फर्क करना मुश्किल हो जाता है। नागार्जुन का कविता की अंतर्वस्तु, रूप और भाषा पर अनोखा नियंत्रण दिखाई देता है। एक उदाहरण, उनकी समग्र काव्य क्षमता देखने के लिए प्रकृति से शुरू होकर एक दम सरल विन्यास वाली कविता कैसे राजनीतिक कविता हो जाती है, यह देखने के लिए शीर्षक है

"काले काले"

काले काले ऋतु रंग

काली काली घन घटा

काले काले गिरि श्रृंग

काली काली छवि घटा

काले काले परिवेश

काली काली करतूत

काली काली करतूत

काले काले परिवेश

काली काली महँगाई

काले काले अध्यादेश।

वाक्य क्रम के बदलाव में एक संयुक्त पद “काले काले” की आवृत्ति में कला भी अपना काम कर रही है और वर्ग संघर्ष या व्यवस्था से संघर्ष का ऐतिहासिक विवेक भी। नागार्जुन को आधुनिक कबीर कहा गया है, वह उनके फक्कड़ क्रांतिकारी व्यक्तित्व को देखते हुए उनकी कला में भी यही व्यक्तित्व समाया है।

 केदारनाथ अग्रवाल

केदारनाथ अग्रवाल प्रगतिवादी काव्यधारा के प्रतिनिधि तथा महत्वपूर्ण कवि हैं। रूमानी आदर्शवाद से यथार्थवाद तक, रूपासक्ति से जीवनासक्ति तक और कोमल रागात्मकता से खुरदुरे वस्तुचित्रण तक केदार की कविता के अनेक रंग हैं। भावुकता केदार के यहाँ आत्मीयता का पर्याय है। पत्नी प्रेम पर जैसी अकुण्ठ कविताएं केदारनाथ अग्रवाल ने लिखी हैं, किसी ने नहीं लिखीं। प्रेम, सौन्दर्य प्रकृति के गहरे लगाव के साथ केदार संघर्षशील जनता के कठोर जीवन, कठिन श्रम और दृढ़ आस्था की ओर बराबर सजग रहे हैं। 'चन्द्रगहना से लौटती बेर' तथा 'बसंती हवा' से केदार की खास पहचान बनी। यह सहजता, यह स्वाभाविकता सच्ची जीवनासक्ति से ही पैदा होती है।

एक बीते के बराबर

यह हरा ठिगना चना

बाँधे मुरैठा शीश पर

छोटे गुलाबी फूल का

सजकर खड़ा है।

और सरसों की न पूछो

हो गयी सबसे सयानी

हाथ पीले कर लिये हैं।

केदारनाथ अग्रवाल स्वीकार करते हैं कि मार्क्सवादी विचारधारा के कारण ही उन्हें नयी जीवन दृष्टि और नयी काव्यदृष्टि मिली। 'देवली के नरसंहार' जैसी तात्कालिक घटनाओं पर भी केदार ने कविताएँ लिखी हैं और अपनी वर्ग चेतना का प्रमाण दिया है।

शमशेर बहादुर सिंह

शमशेर बहादुर सिंह को प्रगतिवादी काव्यधारा से सम्बद्ध करने में उन्हें कठिनाई होती है जो

प्रगतिवाद को स्थिर मतवाद ही मानते हैं, उसकी काव्यात्मक संभावनाओं को महत्व नहीं देते।

शमशेर को रूपवादी या प्रयोगशील मानकर अलग कर दिया जाता है। शमशेर विचारधारा की दृ

ष्टि से मार्क्सवादी हैं और मार्क्सवाद को विशेष महत्व देते । जनता के प्रति उनकी सहानभूति

किसी से कम नहीं है। पर कविता को वे उसकी मुक्त संभावनाओं में देखते हैं। रूप और शिल्प

उन्हें जीवन की प्रकट सच्चाइयों की तरह ही जरूरी जान पड़ते हैं। ‘लेकर सीधा नारा' शमशेर

की वह महत्वपूर्ण कविता है जो प्रगतिवादी आंदोलन के दौर में विशेष चर्चित हुई।

लेकर सीधा नारा

कौन पुकारा

अंतिम आशाओं की सन्ध्याओं से

मैं समाज तो नहीं, न मैं कुल

जीवन

कण समूह में हूँ मैं केवल

एक कण

कौन सहारा।

शमशेर मानते रहे हैं कि उनकी असली जमीन रोमानी ही थी पर 'अमन का राग', 'यह शाम है

जैसी कविताएँ वे अपनी आस्था के अनुरूप लिखते रहे हैं। सांप्रदायिक दंगों पर उन्होंने बाद में

जो कविताएँ लिखी हैं वे प्रगतिशील विचारधारा, जीवन दृष्टि के बगैर असंभव है।

 गजानन माधव मुक्तिबोध

मुक्तिबोध की कविता का प्रगतिशील यथार्थवादी काव्यधारा से सहज संबंध बिठाने में डॉ.रामविलास शर्मा तक को कठिनाई होती है। अब शायद यह बात अधिक स्पष्टतापूर्वक कही जा रही है कि प्रगतिशील यथार्थवादी कविता की ही कम से कम दो परंपराएँ हैं -एक में नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल आते हैं, दूसरी में शमशेर, मुक्तिबोध । मुक्तिबोध ने सीधे-सीधे स्वीकार किया है कि एक कला सिद्धांत के पीछे विशेष जीवन दृष्टि होती है, उसके पीछे एक जीवन दर्शन होता है और उसके पीछे एक राजनैतिक दृष्टि भी होती है। मुक्तिबोध की महत्वपूर्ण लम्बी कविताएँ राजनैतिक दृष्टि से वंचित नहीं हैं। यह राजनीतिक दृष्टि मार्क्सवाद ही है जो व्यापक अर्थ में विश्वदृष्टि भी है। 'अन्तःकरण का आयतन' कविता में मुक्तिबोध अपना पक्ष स्पष्ट करते

पृथ्वी के प्रसारों पर

जहाँ भी स्नेह या संगर

वहाँ पर एक मेरी छटपटाहट है

वहाँ है जोर गहरा एक मेरा भी

सतत मेरी उपस्थिति

नित्य सन्निधि है।

मुक्तिबोध ने यथार्थ चित्रण के लिए फैन्टेसी का भी उपयोग किया और इस प्रकार एकरस जान पड़ने वाले काव्यरूप में विविधता, नाटकीयता, गति पैदा की। अँधेरी दुनिया के रहस्यों को भेदते हुए मुक्तिबोध के जो विचार स्फुलिंग सामने आते हैं वे एक निश्चित विचारधारा या जीवन दृष्टि का प्रमाण देते हैं। वे सत्ता को किस तरह बेनकाब करते हैं इसका सटीक उदाहरण है

'भूलगलती' नाम कविता जिसमें भूलगलती सिंहासन पर बैठी है और 'सच' नाम का पात्र गिरफ्तार करके लाया जाता है। अँधेरे में' मुक्तिबोध की सबसे महत्वपूर्ण कविता है – आधुनिक कविता की विशिष्ट उपलब्धियों में एक।


 त्रिलोचन

त्रिलोचन की एक अलग पहचान है। परम्परा में ही उन्हें रखना हो तो वे तुलसी और निराला की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले कवि हैं। उन्होंने राजनीतिक विषयों पर कविताएं नहीं लिखी हैं कि उनकी विचारधारा तक सीधे पहुंचना आसान हो। पर साधारण विषयों पर, जीवन के बहुत मामूली प्रसंगों पर लिखते हुए भी वे अपनी दृष्टि का प्रमाण देते हैं। सानेट त्रिलोचन का अपना आविष्कार है। सानेटों में जितनी सहजता से वे आत्मकथा या सामाजिक संदेश बिखेरते चलते हैं, उसी से उनकी साफ दृष्टि और असाधारण काव्यक्षमता का पता चलता है। त्रिलोचन की कविताएँ सीधे जीवन को पकड़ती हैं। त्रिलोचन के सानेटों में आत्मभर्त्सना के जो अंकुठ संकेत हैं उनसे उनकी जीवनशक्ति प्रकटहोती है। "भीख मांगते उसी त्रिलोचन को देखा कल/जिसको समझे था है तो है यह फौलादी", 'नगई महरा' जैसे इतिवृत्त में उनका ढंग दूसरा है बतकही वाला ढंग। कृत्रिमता, बनावटीपन से मुक्त यह सहज आत्मीयता त्रिलोचन का काव्यवैशिष्ट्य है- शब्दकार इन शब्दों में जीवन होता है।





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