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Monday, April 22, 2024

रहस्य

रहस्य 
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यहां आते ही
अब तक 
तय की गयी तमाम दूरियां
पैरों में सिमट आती हैं 

तमाम गिले-शिकवे
विलीन होते हैं एक रहस्य में 
उस रहस्य को न जाना मैंने
यह जरूर जाना 
कि जब-जब यहां आया 
मैं एक रहस्य में खो जाता हूं
वह क्या है मैं नहीं जानता !

नहीं जानता, मैं कैसे कहां पहुंचता हूं 
नहीं जानता उस अदृश्य अनाम को 
रहता जो साथ मेरे
दिखता नहीं दूर दिगंत तक 
नहीं जानता कहां-कहां चलते
कहां पहुंचता हूं..

और यहां आते ही वहां होता हूं
जहां से अल्सुबह 
रोज़ आती रहती हैं सदाएं 
दुआओं में उठे हाथ 
बंद आंखों में जो साक्षात दिखते हैं
की जा रही वो मौन प्रार्थनाएं
आती रहती मुझ तक 
एक रहस्य को भेदते
भरती ऊर्जा मेरे तन-मन में

फिर से यात्राएं करते
फिर से थकते हुए आता जब 
यहां तक ! 
फिर एक रहस्य होता है सामने 
खुली आंखों से कुछ नहीं दिखता

बंद आंखों में दिखती हैं 
आ रही अनगिनत सहस्त्र किरणें 
वो अनजान दुआएं
मौन प्रार्थनाएं
एक रहस्य को भेदते
दूसरे में विलीन होते
और न जानते
उस एक रहस्य को
मन की अतल गहराई में
महसूस करते...

जीवन के ये रहस्य
हम कहां जान पाते कभी 
जिंदगी से जुड़ा हमारा सफ़र
एक रहस्य ही होता है
यही जाना जब-जब आया यहां 
लौटते हुए उसे महसूस किया
शायद हर आदमी की दुनिया एक रहस्य है 

एक की दुनिया
दूसरे से जुदा है 

जब-जब आया यहां
बस इतना ही जाना !
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अमरेंद्र मिश्र
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Friday, April 19, 2024

ईश्वर 
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बड़ा आसान है ईश्वर की 
पूजा करना 
बड़ा कठिन है उसके सामने
सच्चे मन से खड़ा होना 

जो सच्चे नहीं, ईमानदार नहीं
निष्कलंक और निर्दोष नहीं
पता नहीं वो ईश्वर के दर 
क्या मांगते हैं ?
और क्या मिलता है उन्हें
और क्या देते हैं वे
आनेवाली नस्ल को 

बड़ा मुश्किल है खुद को
खुद के खिलाफ खड़ा करना
बनना निर्मम खुद के लिए खुद से
और तपना आग में उनके लिए
जो हमारे लिए सच बोलते
चलते रहे, हमारे साथ अदृश्य 

हमें कुछ पता नहीं उनका 
जो ईश्वर के दर नहीं गये कभी
पर ईश्वर के साथ बने रहे
सच बोलते रहे
मांगा कुछ नहीं
वक़्त नहीं मिला कुछ मांगने का 
ज़रूरत भी नहीं महसूस की 

उनका ईश्वर उनके साथ था 
या था अनुपस्थित 
कुछ सोचा नहीं इस पर भी
पर लगा मानो ईश्वर ने कहा
मैं तुम्हारे साथ ही चलता रहा हूं
था कुछ अदृश्य-सा 

जैसे सच प्रकाश में भी अदृश्य
होता हमारे भीतर है 
मेरी अंतरयात्रा सच से सच तक
उद्धार से संहार तक 
चलते हुए उस विराट शून्य पर
समापन लेती है 
जहां से बार-बार हम नया
बनते रहते हैं...
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अमरेंद्र मिश्र
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Thursday, April 18, 2024

शब्द-महिमा

शब्द-महिमा 
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वे लोग पता नहीं कहां हैं जिन्होंने नये-नये शब्द गढ़े और उनका यह शाब्दिक अभियान आज भी जारी है।परंपरागत संज्ञा संबोधन अपने स्वरूप और अपनी गरिमा खोते जा रहे हैं जिससे आपसी रिश्तों की महत्ता उपहास का पात्र बनती जा रही है।कुछ बानगी देखिये और ऐसे और  शब्दों की तलाश कीजिये।
आपके लिये ऐसे कुछ शब्द प्रस्तुत हैं-

(1) मां-ममी,मोम(2) पिता-पापा,पा,पोप,डैडी,डैड (बाबूजी आज़ कोई भी नहीं कहता) (3)चाचा-अंकल,चाचू,चा (4)जीजा-जीजू(5)दादाजी-दादू,ग्रैंडप्पा,(6) दीदी-दी (7) ओके-के,(8) बाबूजी-ज्यादातर बेचारगी के लिए प्रयुक्त होता है-सब्जी वाले, कबाड़ी, पॉकेट मार इसका प्रयोग ज़्यादातर करते हैं। इत्यादि।

आधुनिक हिंदी सिनेमा ने तो आदर सूचक शब्दों के साथ खूब ज्यादती की है-

(1) भाई-ज्यादातर गुंडे के लिये (2) गुरु-गुंडे के सरदार के लिये (3) उस्ताद-जो बदमाशियां सिखाये (4) बाप-अनादर का प्रतीक (5) बहन-गाली के लिये (तेरी बहन (भैन) लगती है क्या ? (6) अम्मा-हिकारत और गुस्से में प्रयोग-अब चुप हो जा मेरी अम्मा (मां)(7) डॉक्टर-डॉक
हिंदी का प्रशंसक शब्द तो अंग्रेजी के 'फैन' के आगे लापता ही हो गया है।

टेलिविजन सीरियल ने तो यहां तक कहना शुरू कर दिया कि -"रावण ने सीता का किडनैप किया था..,

ऐसे कितने ही उदाहरण होंगे जिनसे हमें रोज दो-चार होना पड़ता है।नये-नये शोधार्थी अगर इन पर काम करें तो आनेवाले लोग शब्द की इयत्ता और महत्ता को समझें और फिर जानें कि शब्द को हमारे यहां 'ब्रह्म' क्यों कहा गया !

Wednesday, April 17, 2024

दिल्ली की एक रात

दिल्ली की एक रात
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सातवें - आठवें दशक में जब हम कहीं बाहर से घूम फिर कर वापस लौटते थे तो एक हफ़्ते के भीतर दिल्ली बदली-बदली सी लगती थी। लेकिन तब बड़ा सुकून था। डीटीसी की नाइट बस सर्विस और दिल्ली पुलिस का विश्वजनीन महत्व था। सड़क, पार्क सब सुरक्षित थे। रात का डिनर लेने के बाद रात के बारह बजे तक लोग अपने घरों से बाहर निकल पार्क में घूमते हुए मिलते थे। डिनर लेने के बाद मैं खुद अपने फ्लैट से सटे एक पार्क में टहलता रहता था।एक संवेदनशील आत्मीयता और गहरी मित्रता के बूते हम कठिन से कठिन समस्याओं से जूझते रहते थे। दिल्ली हमारे लिए पुरुषार्थ की प्रतीक थी। यहां जो आया, अपने कठिन परिश्रम और कठोर संघर्ष के बल पर आगे बढ़ा। दिल्ली ने जरूरतमंद लोगों को हमेशा आगे बढ़ संबल दिया। तब हत्या और अपराध की इतनी घटनायें कहां होती थीं ! मुझे याद है कि अस्सी के दशक में धौलाकुआं स्थित एक नेवी अफसर के दो बच्चों, संजय - गीता को रंगा-बिल्ला नाम के अपराधियों ने अपहरण के बाद बुद्ध जयंती पार्क में हत्या कर दी थी तो यह ख़बर एक बड़ी ख़बर बन गयी थी और ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था... शायद उसी हादसे के बाद दिल्ली दिसंबर की ठंड और कुहासे सी खुद में ही सिकुड़ती गयी और आज़ यह बढ़ते आपराधिक ग्राफ के बाद बेबस दिख रही है।

दिल्ली के नागरिकों को तो छोड़िए। वे तो जो झेलना है, उसे रोज़ ही झेल रहे हैं लेकिन उनके बारे में सोचकर दुख होता है जो यहाँ बेहतर ईलाज के लिए आते हैं या जो रोज़गार के लिए आते हैं, या जो टूरिस्ट हमारे यहाँ आते हैं और जब दिल्ली को इतना निर्मम पाते हैं तो कैसी छवि लेकर अपने देश लौटते होंगे ! आज़ जिस तरह दिल्ली चल रही है वह इसकी स्वाभाविक 'चाल' नहीं थी। 

आज दिल्ली एक हफ़्ते में नहीं, रोज़ बदल रही है.. पल-पल बदल रही है और हमें आज़ जो दिख रहा है वह चालीस - पचास बरस पहले नहीं दिखता था। लेकिन क्या करें,हम इसे ही भरपूर जीते हैं।सुना है कि जो जगह ब्रेड और बटर से जुड़ी होती है वह कभी नहीं छूटती।
रात एक बजे सराय रोहिल्ला से लौटते पास से गुजरती टैक्सी की खिड़की से आती एक कारुणिक चीत्कार को सुनते हुए... लगता है मानों किसी का यह अपहरण दृश्य आंखों के सामने चल रहा है।
मुझे याद नहीं कि 'कोरोना' काल में जिस तरह इस दिल्ली ने लचर प्रशासन की कुव्यवस्था के चलते हजारों कामगार श्रमिक मजदूरों को विस्थापित किया है उतना पहले ऐसा कभी देखने को मिला हो। मासूम निर्दोष लोगों, महिलाओं और बच्चों तक पर प्रशासन ने जिस तरह का कहर बरपाया है,वैसा दृश्य पहले कभी देखने को नहीं मिला। कहते हैं कि दिल्ली में जो भी एक बार आ जाता है वह कभी भूखा नहीं मरता।

आज़ 'कोरोना' से भी बड़ी महामारी भूख, बेरोजगारी, मासूम बच्चों का उत्पीड़न, महिलाओं पर बेवजह जुर्म, दीवारों पर चिपके झूठ के रंग-बिरंगे इश्तहार, बुद्धिजीवियों को हाशिए पर धकेले जाने की कोशिशें यही आज़ का सच है। और उससे भी बड़ा सच है कि यह सब देखकर दोषियों पर सही,संतुलित और कठोरतम ऐक्शन लेने की जगह सत्ता का सिर्फ़ 'कलेजा फटता' है !

दिल्ली के साथ-साथ क्या देश के दूसरे राज्यों में बसे कामगार मजदूरों की यही समस्या नहीं है ? क्या लगभग हर हिस्से से कमोवेश'विस्थापन' का दौर जारी नहीं है ? जिस घर में रहते हुए परिवार के सदस्यों के बीच प्यार और संवेदना महसूस करते रोजी-रोटी के लिए जो अपना गांव छोड़कर दूसरी जगहों पर गये, किसी कारणवश वहां से भी विस्थापित होने के बाद वे कहां जायेंगे ? आश्चर्य नहीं कि कुछ कामगार मजदूरों का कोई अता-पता नहीं मिलता। खासकर बिहार से मेहनत मजदूरी करने आए कुछ श्रमिक दिल्ली में कुछेक महीने यहां वहां काम करने के बाद कुछ समय के लिए जब गांव जाते हैं तो फिर नहीं लौटते और कुछ अविश्वसनीय शिकायतें अपने पीछे छोड़ जाते हैं जिसका खामियाजा दूसरे श्रमिकों को झेलना पड़ता है जो विश्वास करने लायक हैं। ऐसा भी देखा गया है कि कई श्रमिक यहां से पलायन करने के बाद अपने गांव भी नहीं पहुंचते। ऐसे लोग आख़िर कहां जा पहुंचते हैं यह सोचने की बात है।

कुछ व्यवस्थावादी जो इन समस्याओं पर काल्पनिक चश्मे से उनका समाधान खोजते हैं, वे एक तरह से यथार्थ को झुठलाते हैं क्योंकि ऐसा करना अधिक आसान और आरामदायक है।और बिना मतलब फोन पर 'सब ठीक हो जायेगा' कहते हैं,उन्हें सोचना चाहिए कि बिना किसी ठोस प्रशासनिक प्रयास के उनका सिर्फ़ आशावादी होना ख़ुद को ख़ुद से ही धोखा देने के अलावा और क्या हो सकता है ‌!

लेकिन हम यहां शिद्दत से हैं और मजे में हैं अपनी तमाम परेशानियों और संघर्षों के बावजूद।

इसलिये-'सलाम दिल्ली '!

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रामनवमी

रामनवमी 
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इस पावन पर्व पर शुभकामनाएं भर देना पर्याप्त नहीं। उत्सव मनाना और मंदिरों का पर्यटन ही काफ़ी नहीं। यह सब तो पारंपरिक है। उपवास, पूजा-पाठ भी चित्त की शुद्धि के लिए जरूरी है। सब ठीक है। लेकिन इन सबसे ज़्यादा जरूरी है, राम के आदर्श और कर्तव्य को अपने जीवन में उतारने का प्रयास। यह जितना आध्यात्मिक होगा उतना ही कर्तव्य परायणता का उद्बोधक भी होगा। राम का पूरा जीवन कर्तव्य पालन का अनुपम उदाहरण है। वे हर जगह अपना वचन निभाते हैं। पिता की आज्ञा मान वन-गमन करते हैं और चौदह वर्ष तक ऋषि मुनी का जीवन व्यतीत करते हैं। उनका जीवन कर्तव्यनिष्ठा और कर्तव्य पालन का दृष्टांत बन जाता है जब वे न सिर्फ अपने माता-पिता वरन लोक कल्याण हेतु कठोर कर्तव्य का पालन करते हैं। 

लोकहित में अपना कर्तव्य निभाना एक बहुत बड़े साहस और त्याग की मांग करता है। जहां कर्तव्य प्रधान होता है, वहां दुनिया की तमाम सुख संपदा छोटी और तुच्छ हो जाती है। कर्तव्य किसी प्रकार की माया - ममता या भावुकता से ऊपर होता है। यह एक जरूरी नैतिक अवधारणा है। यह किसी भी तरह के स्वार्थ या लेन-देन से परे होता है। इसीलिये यह एक हद तक कठोर भी होता है। भगवान् राम वैसा बन पाये तो मर्यादा पुरुषोत्तम बने। 

और तुलसी 'रामायण' लिखने बैठे तो उन्हें पूरी की पूरी सृष्टि ही सियाराममय लगी। "सिया राममय सब जग जानी, करहुं प्रणाम जोर जुग पाणि। '' और वे स्वयं राममय बन गये। तुलसी की इस 'रामायण' में सबकुछ तो है! संयुक्त परिवार है, टूटता परिवार है, परस्पर प्रेम है, ईर्ष्या है, द्वेष है, युद्ध है, शांति है, राज्याभिषेक है, वन-गमन है, भ्राता प्रेम है, भक्त की भक्ति है, दुश्मनी है, दोस्ती है, षडयंत्र है, धोखा है,राजनीति है और है एक आदर्श और समष्टिगत चेतना। 

राम अपने आदर्श में महान हैं और कर्तव्य में महानतम। वे पिता की आज्ञा से घर छोड़कर वन-गमन करते हैं और लौट कर फिर से राजकाज ठुकराते हैं। दोनों जगह कर्तव्य जीतता है। कर्तव्य पहले आता है, आदर्श उसके पीछे हो लेता है। और तब हमें लगता है, हमारे मर्यादा पुरुषोत्तम राम सचमुच कितने महान हैं और हम उनके आदर्शों को जरा-सा भी अपने जीवन में उतार लें तो कितने धन्य बन जायें ! 

आप सबको रामनवमी पर आत्मीय शुभकामनाएं और बधाई !

असम के जननायक ज़ुबीन गर्ग: एक कलाकार जो सिर्फ़ आवाज़ नहीं, असम की पहचान थे#

 #असम के जननायक ज़ुबीन गर्ग: एक कलाकार जो सिर्फ़ आवाज़ नहीं, असम की पहचान थे# असम के प्रिय गायक, संगीतकार और सामाजिक कार्यकर्ता ज़ुबीन गर्ग ...