दिल्ली की एक रात
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सातवें - आठवें दशक में जब हम कहीं बाहर से घूम फिर कर वापस लौटते थे तो एक हफ़्ते के भीतर दिल्ली बदली-बदली सी लगती थी। लेकिन तब बड़ा सुकून था। डीटीसी की नाइट बस सर्विस और दिल्ली पुलिस का विश्वजनीन महत्व था। सड़क, पार्क सब सुरक्षित थे। रात का डिनर लेने के बाद रात के बारह बजे तक लोग अपने घरों से बाहर निकल पार्क में घूमते हुए मिलते थे। डिनर लेने के बाद मैं खुद अपने फ्लैट से सटे एक पार्क में टहलता रहता था।एक संवेदनशील आत्मीयता और गहरी मित्रता के बूते हम कठिन से कठिन समस्याओं से जूझते रहते थे। दिल्ली हमारे लिए पुरुषार्थ की प्रतीक थी। यहां जो आया, अपने कठिन परिश्रम और कठोर संघर्ष के बल पर आगे बढ़ा। दिल्ली ने जरूरतमंद लोगों को हमेशा आगे बढ़ संबल दिया। तब हत्या और अपराध की इतनी घटनायें कहां होती थीं ! मुझे याद है कि अस्सी के दशक में धौलाकुआं स्थित एक नेवी अफसर के दो बच्चों, संजय - गीता को रंगा-बिल्ला नाम के अपराधियों ने अपहरण के बाद बुद्ध जयंती पार्क में हत्या कर दी थी तो यह ख़बर एक बड़ी ख़बर बन गयी थी और ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था... शायद उसी हादसे के बाद दिल्ली दिसंबर की ठंड और कुहासे सी खुद में ही सिकुड़ती गयी और आज़ यह बढ़ते आपराधिक ग्राफ के बाद बेबस दिख रही है।
दिल्ली के नागरिकों को तो छोड़िए। वे तो जो झेलना है, उसे रोज़ ही झेल रहे हैं लेकिन उनके बारे में सोचकर दुख होता है जो यहाँ बेहतर ईलाज के लिए आते हैं या जो रोज़गार के लिए आते हैं, या जो टूरिस्ट हमारे यहाँ आते हैं और जब दिल्ली को इतना निर्मम पाते हैं तो कैसी छवि लेकर अपने देश लौटते होंगे ! आज़ जिस तरह दिल्ली चल रही है वह इसकी स्वाभाविक 'चाल' नहीं थी।
आज दिल्ली एक हफ़्ते में नहीं, रोज़ बदल रही है.. पल-पल बदल रही है और हमें आज़ जो दिख रहा है वह चालीस - पचास बरस पहले नहीं दिखता था। लेकिन क्या करें,हम इसे ही भरपूर जीते हैं।सुना है कि जो जगह ब्रेड और बटर से जुड़ी होती है वह कभी नहीं छूटती।
रात एक बजे सराय रोहिल्ला से लौटते पास से गुजरती टैक्सी की खिड़की से आती एक कारुणिक चीत्कार को सुनते हुए... लगता है मानों किसी का यह अपहरण दृश्य आंखों के सामने चल रहा है।
मुझे याद नहीं कि 'कोरोना' काल में जिस तरह इस दिल्ली ने लचर प्रशासन की कुव्यवस्था के चलते हजारों कामगार श्रमिक मजदूरों को विस्थापित किया है उतना पहले ऐसा कभी देखने को मिला हो। मासूम निर्दोष लोगों, महिलाओं और बच्चों तक पर प्रशासन ने जिस तरह का कहर बरपाया है,वैसा दृश्य पहले कभी देखने को नहीं मिला। कहते हैं कि दिल्ली में जो भी एक बार आ जाता है वह कभी भूखा नहीं मरता।
आज़ 'कोरोना' से भी बड़ी महामारी भूख, बेरोजगारी, मासूम बच्चों का उत्पीड़न, महिलाओं पर बेवजह जुर्म, दीवारों पर चिपके झूठ के रंग-बिरंगे इश्तहार, बुद्धिजीवियों को हाशिए पर धकेले जाने की कोशिशें यही आज़ का सच है। और उससे भी बड़ा सच है कि यह सब देखकर दोषियों पर सही,संतुलित और कठोरतम ऐक्शन लेने की जगह सत्ता का सिर्फ़ 'कलेजा फटता' है !
दिल्ली के साथ-साथ क्या देश के दूसरे राज्यों में बसे कामगार मजदूरों की यही समस्या नहीं है ? क्या लगभग हर हिस्से से कमोवेश'विस्थापन' का दौर जारी नहीं है ? जिस घर में रहते हुए परिवार के सदस्यों के बीच प्यार और संवेदना महसूस करते रोजी-रोटी के लिए जो अपना गांव छोड़कर दूसरी जगहों पर गये, किसी कारणवश वहां से भी विस्थापित होने के बाद वे कहां जायेंगे ? आश्चर्य नहीं कि कुछ कामगार मजदूरों का कोई अता-पता नहीं मिलता। खासकर बिहार से मेहनत मजदूरी करने आए कुछ श्रमिक दिल्ली में कुछेक महीने यहां वहां काम करने के बाद कुछ समय के लिए जब गांव जाते हैं तो फिर नहीं लौटते और कुछ अविश्वसनीय शिकायतें अपने पीछे छोड़ जाते हैं जिसका खामियाजा दूसरे श्रमिकों को झेलना पड़ता है जो विश्वास करने लायक हैं। ऐसा भी देखा गया है कि कई श्रमिक यहां से पलायन करने के बाद अपने गांव भी नहीं पहुंचते। ऐसे लोग आख़िर कहां जा पहुंचते हैं यह सोचने की बात है।
कुछ व्यवस्थावादी जो इन समस्याओं पर काल्पनिक चश्मे से उनका समाधान खोजते हैं, वे एक तरह से यथार्थ को झुठलाते हैं क्योंकि ऐसा करना अधिक आसान और आरामदायक है।और बिना मतलब फोन पर 'सब ठीक हो जायेगा' कहते हैं,उन्हें सोचना चाहिए कि बिना किसी ठोस प्रशासनिक प्रयास के उनका सिर्फ़ आशावादी होना ख़ुद को ख़ुद से ही धोखा देने के अलावा और क्या हो सकता है !
लेकिन हम यहां शिद्दत से हैं और मजे में हैं अपनी तमाम परेशानियों और संघर्षों के बावजूद।
इसलिये-'सलाम दिल्ली '!
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