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Thursday, September 2, 2021

स्वातंत्र्योत्तर भारत और ‘राग दरबारी’

 स्वातंत्र्योत्तर भारत और ‘राग दरबारी

                                                             आर.पी मिश्रा

‘राग दरबारी’ व्यापक कथ्य, गहरी संवेदना और भाषिक संरचना की दृष्टि से एक वशिष्ठ व्यंगात्मक औपन्यासिक कृति है । वर्तमान युग की औपन्यासिक अनिवार्यता से भी यह कहीं विचलित नहीं हुआ है। लोकजीवन के साथ गहरा सम्पर्क ‘राग दरबारी’ की मूलभूत विशेषता है। श्रीलाल शुक्ल ने हिंदी के स्वातंत्र्योत्तर रचनाकारों में एक व्यंग्यकार  के रूप में अलग पहचान बनाई । इस पहचान का ठोस आधार है, सामाजिक राजनीतिक जीवन में उनकी गहरी पहचान। भारत का स्वाधीनता  संग्राम  जिस स्वतंत्रता समानता और भाई-चारा की न्यायपूर्ण व्यवस्था के लिए लड़ा गया था, स्वातंत्र्योत्तर काल में उसकी उपलब्धि नहीं हो पाई। एक संवेदनशील लेखक के रूप में श्रीलाल शुक्ल में संपूर्ण अराजक व्यवस्था और उत्पीड़ित जनजीवन को लेकर गहरा असंतोष दिखाई देता है। श्रीलाल शुक्ल ने स्वातंत्र्योत्तर सामाजिक राजनीतिक विसंगतियो का पर्दाफाश अपनी व्यंग्यात्मक शैली में अत्यंत कौशल के साथ किया है।

जनजीवन में बहुमुखी विकास की तमाम सारी लोकलुभावनी घोषणाओं के बावजूद बहुसंख्यात्मक साधारण आदमी का जीवन बद-से-बदतर हो गया है। एक प्रशासनिक अधिकारी और जनजीवन से गहराई के साथ जुड़े होने के कारण श्रीलाल शुक्ल इस स्थिति से आहत हुए है। फलस्वरूप ‘राग दरबारी’ में बीस-बाईस के विकास की तथाकथित उपलब्धियों की विकलांगता और विद्रूपता को उन्होंने निर्ममता के साथ अनावृत किया है। उपन्यास की मुख्य स्थली शिवपाल गंज भीम खेड़ा ग्राम पंचायत के अंतर्गत आने वाला एक गांव है। लेकिन इस गांव से किसान लगभग गायब है। अनेक प्रकार की सरकारी, गैर-सरकारी व्याधियों से ग्रस्त इस गांव में वैद्यजी हैं, जो अपनी वैद्यकी के साथ ही सहकारी समिति में मैनेजिंग डायरेक्टर और छंगामल विद्यालय इंटर कॉलेज में मैनेजर हैं। अब उनकी नजर गांव के प्रधान पद पर हैं। वहाँ बकवास करने वाले ‘गंजहो’  के साथ झूठी गवाही देने में माहिर पंडित राधे लाल ग्रांटखोरी के माहिर कालिका प्रसाद, जुआड़ी-शराबी जोगनाथ, छात्र-नेता रुप्पन, कुंठित-रीढ़हीन, रिसर्च स्कॉलर रंगनाथ के साथ ही प्रिंसिपल, सुपरवाइजर, मास्टर थानेदार, सनीचर जैसे लोग हैं। इन्हीं से गांव का व्यक्तित्व निर्मित किया गया है। अपने इस रूप में शिवपाल गंज गांव न होकर समूचे भारत के प्रतिनिधि के रूप में चित्रित हुआ है।


1947 ई0 की स्वाधीनता के बाद भारत की स्वाधीन सरकार ने मिश्रित अर्थव्यवस्था की आड़ में देश का विकास के लिए जो पूंजीवादी रास्ता अपनाया उसमें देश की आम जनता विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्र की जनता की बदहाली बढ़ती गई। शासन सत्ता समाज से, जनता के एक बहुत बड़े समुदाय से कटकर एक अत्यंत सीमित वर्ग के हाथों में केंद्रित हो गयी। स्वतंत्रता आंदोलन की मूल कारक शक्ति जनता उपेक्षित रह गयी। संप्रदायवाद, जातिवाद, भाई-भतीजावाद को निजी ही नहीं, सार्वजनिक संस्थानों से भी बढ़ावा मिला। इस आपाधापी, मनमानी का सर्वाधिक शिकार ग्रामीण क्षेत्र बने। सहकारी समितियों विकास खंडों की स्थापना का लाभ ग्रामीण क्षेत्र के मुट्ठीभर प्रभावशाली संपन्न व्यक्तियों और नौकरशाही द्वारा उठाया गया। प्रशासनिक स्तर पर वित्त, स्वास्थ्य और सहकारिता मंत्रालय से संबद्ध श्रीलाल शुक्ल को स्वातंत्र्योत्तर  सामाजिक राजनीति का गहन अनुभव था। इसे उन्होंने अपने उपन्यास ‘राग दरबारी’ में बड़ी ही कलात्मकता से समाविष्ट किया है।

‘राग दरबारी’ कोई राजनीतिक उपन्यास नहीं है। इसमें किसी भी महत्वपूर्ण राजनीतिक घटना को कहीं भी, किसी भी रूप में प्रत्यक्ष रूप से एक कथा का आधार नहीं बनाया गया है। लेकिन उपन्यास में घटित घटनाओं, पात्रों के मनोभावों, उनकी चारित्रिक विशेषताओं की पुष्टि के कतिपय राजनीतिक तथ्यों का संकेत इस प्रकार हुआ है कि तत्कालीन राजनीति पर श्रीलाल शुक्ल का कटाक्ष उजागर हो जाता है।

लेखक ने सनीचर के रूप में विराजमान साक्षात प्रजातंत्र और वैद्यजी के लोकतंत्रीय हथकंडे को भारतीय राजनीति के छल छद्म का पर्याय बना दिया है। इससे लगता है लोकतंत्र का बीज भारतीय जमीन पर पड़ते ही सड़ गया।

‘राग दरबारी’ में शिक्षा-संस्था के रूप में छंगामल विद्यालय इंटर कॉलेज को कथा का प्रमुख केंद्र बनाया गया है। स्वातंत्र्योत्तर भारत में शिक्षा की विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों की शिक्षा संस्थानों में व्याप्त भ्रष्टाचार को उजागर करने के लिए उपन्यासकार ने ऐसा किया है। छंगामल विद्यालय इंटरकॉलेज और तमाम कॉलेजों की स्थापना के पीछे निहित उद्देश्य पर टिप्पणी करते हुए उपन्यासकार ने लिखा है, ‘ये कॉलेज प्रायः किसी स्थानीय जननायक की प्रेरणा से शिक्षा प्रचार के लिए और वास्तव में उसके लिए विधानसभा या लोकसभा की जमीन तैयार करने के उद्देश्य से खोले जाते थे और मुख्य कार्य कुछ मास्टरों और सरकारी अनुदानों का शोषण करना था।

 उपन्यास के कथा-पट पर अंकित कॉलेज के मैनेजर वैद्यजी और छात्र नेता रुप्पन ही नहीं, उसके प्रिंसिपल और खन्ना तथा मालवीय जैसे मास्टरों के कारनामे स्वातंत्र्योत्तर भारत की शिक्षा पद्धति पर गहरा कटाक्ष है। वस्तुतः उपन्यासकार ने ग्रामीण क्षेत्रों की विकृत, भ्रष्ट शिक्षा व्यवस्था ही नहीं, वरन संपूर्ण देश की बौद्धिक क्रीड़ा और शिक्षण प्रशिक्षण व्यवस्था के यथार्थ की हास्यपदता भी प्रकट की है। 

‘राग दरबारी’ में स्वातंत्र्योत्तर भारत के प्रशासन के रूप में शिवपाल गंज थाना, थानेदार और सिपाही ही मुख्य रूप से आए हैं। लेकिन  कोऑपरेटिव यूनियन और छंगामल विद्यालय इंटरकॉलेज के संदर्भ में प्रशासन के सहकारिता अधिकारी और शिक्षा विभाग के अधिकारी भी अपने मूलभूत चरित्र के साथ उपस्थित हुए हैं। शिवपाल गंज के जुआरी संघ के मैनेजिंग डायरेक्टर थानेदार से हाथ जोड़कर कहते हैं कि ‘हुजूर आप मेरा चालान अवश्य कर दें। चालान हो जाता तो सारी झंझट खत्म हो जाती।‘ इस कथन से जुआरी संघ के साथ थानेदार की मिलीभगत का भी पता चलता है। थाने के सामने एक नंग-धड़ंग लंगोटधारी भंग घोट रहा है। वह अकेला सिपाही बीस गांवों की सुरक्षा के लिए तैनात है और जिस हालात में, जहां है वही से बीसों गांवों के अपराध को रोक सकता है। अपराध हो गया तो पता लगा सकता है तथा अपराध नहीं हुआ तो उसे करा सकता है।

 जुआरियों के साथ थानेदार और सिपाहियों की मिलीभगत है। रामधीन भीखम खेड़वी के घर आई डाके की फर्जी चिट्ठी पर भय, सिपाहियों के साथ फर्जी मुठभेड़ का दृश्य पुलिस प्रशासन की कलई पूरी तरह उतार देती है। जिला विद्यालय, डिप्टी डायरेक्टर एजुकेशन, कोऑपरेटिव इंस्पेक्टर की उपस्थिति से सरकारी प्रशासन तंत्र का पूरा यथार्थ सामने आ जाता है। जो कमी रह जाती है, उसे कोऑपरेटिव का सुपरवाइजर गबन के द्वारा पूरा कर देता है।

‘राग दरबारी’ उपन्यास स्वातंत्र्योत्तर भारतीय न्याय-व्यवस्था के यथार्थ का एक जीवंत दस्तावेज है। न्याय की दुस्तरता पर उपन्यासकार ने एक टिप्पणी इस प्रकार की है ‘पुनर्जन्म के सिद्धांत की ईजाद दीवानी की अदालतों में हुई है ताकि वादी और प्रतिवादी इस अफसोस को लेकर न मरे कि उनका मुकदमा पड़ा रहा। इसके सहारे वे चैन से मर सकते हैं कि मुकदमे का फैसला सुनने के लिए अभी अगला जन्म तो पड़ा ही है।‘ 

स्वाधीनता के बाद भारतीय गांवों के समुचित विकास खंडो के साथ ही सहकारी समितियों, ग्राम सभाओं, न्याय-पंचायतों आदि की भी व्यवस्था हुई। इन्हें समुचित रूप से चलाने के लिए बीडीओ, एसडीओ, बहुत सारे इंस्पेक्टरों, ग्राम सेवकों, पंचायत मंत्रियों आदि जैसे कर्मचारियों का जाल बिछाया गया। पंचवर्षीय योजनाओं के प्रावधान से इनके लिए समुचित वित्तीय अनुदान भी सरकार की भारत की लोकतंत्रीय प्रणाली के मद्देनज़र कुछ विकास आधारित संस्थाओं में चुनाव की भी व्यवस्था की गई। इसके अंतर्गत ग्राम सभा के प्रधान का चुनाव गांव के सभी बालिग मतदाताओं द्वारा और ब्लॉक प्रमुख चुनाव, प्रधानों द्वारा किए जाने का प्रावधान था। सहकारी संघ के मैनेजिंग डायरेक्टर के लिए भी चुनावों का प्रावधान रखा गया। ‘राग दरबारी’ में इन तथ्यों को पूरी तरह से ध्यान में रखा गया है। 

उपन्यासकार में ग्राम सभा के चुनावों की हास्यास्पदता को उजागर करने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में प्रचलित तीन पद्धतियों का उल्लेख अत्यंत मनोरंजक ढंग से किया गया है। एक राम नगर वाली, दूसरी  नोवादावाली और तीसरी महिपालपुर वाली। इस प्रकार की पद्धतियां कथाकार की कल्पना भले ही हो लेकिन ग्राम पंचायतों के चुनाव के यथार्थ को आवश्यक उद्घाटित करती है।

 सामुदायिक विकास के लिए योजना आयोग द्वारा पर्याप्त ( अनुदान) दिया जाता है। यह अनुदान सरकारी समिति, ग्राम पंचायत और विकास खंडो के माध्यम से प्राप्त होता है। शिवपालगंज में अनुदान खोर कालिका प्रसाद का अप्रतिम व्यक्तित्व है। यह कार्य में क्षेत्रीय एम.एल.ए. खद्दर की पोशाक और कार्रवाई रोक पाने के कौशल से करते थे। मुर्गी पालन चर्म उद्योग, खाद के गड्ढे पक्का करवाए बिना धुएं का चूल्हा लगवाने, सुलभ शौचालय बनवाने आदि के सारे अनुदान खाकर उन्होंने अपेक्षित कारगुजारी की समुचित रिपोर्ट भेज दी है। मात्र पांच बीघे खेत की जमानत पर वे पचासों तरह के कर्ज और तकबियाँ उदरस्थ कर चूके हैं। यह है, सामुदायिक विकास की यथार्थ का एक छोटा सा उदाहरण। प्रधान बनने के एक महीना पहले ही सनीचर इस महापुरुष को लेकर विकास खंड के कृषि विकास अधिकारी के साथ सहकारी खेती का सौदा कर आता है। भूदान आंदोलन, जमींदारी उन्मूलन, विकास खंडों, सहकारी समितियों, ग्राम पंचायतों की व्यवस्था के बावजूद गांव की बदहाली बढ़ती जा रही है। शिवपाल गंज का थानेदार कहता है कि अब गांव में चोर, भूदानी, कार्यकर्ता की ‘शगल’ (वेश) में आने लगे हैं । उपन्यास में प्रयुक्त भूदानी चेहरा, भूदानी नमस्कार, भूदानी मुद्रा आदि शब्दों का प्रयोग एक विशेष छ्दम में उद्घाटन के लिए हुआ है।

 विकास खण्ड, सहकारी समिति, ग्राम पंचायत आदि लूट खसोट और भ्रष्टाचार के अड्डे बन गए हैं। यहाँ किसान और कृषि कार्य पूरी तरह से गायब है। कृषि क्रांति दरोदीवार पर लिखे नारों तक सीमित रह गई है। जो बाकी रह गया है उसे नेताओं और सरकारी अफसरों के भाषणों से पूरा कर दिया जाता है। शिवपालगंज के बस अड्डे की गंदगी और उस के निकट मिठाई की दुकान, मंदिर, धर्मशाला आदि गंदगी उत्पादक संस्थाएँ उसके नाम को रोशन करती है। गांव के किनारे छोटे से तालाब की गंदगी को देखकर उपन्यासकार को मैथिलीशरण गुप्त की 50 वर्ष पहले लिखी गई कविता की पंक्तियाँ – अहा ग्राम्य  जीवन भी क्या है? याद आ जाती है।

छंगामल इंटर कॉलेज गांव के लिए शिक्षा का नहीं, अशिक्षा का केंद्र बना हुआ है। यहां हुल्लड़बाजी, गुंडई, दुष्चरित्रता की शिक्षा मिलती है। स्थानीय थाना असुरक्षा का केंद्र बना हुआ है। इसके रहते घटनाएं नहीं, दुर्घटनाएं होती है, चोरी नहीं, डकैती पड़ती है। जुआ, शराब आदि के अड्डे उसी के संकेत पर चलते हैं। सबसे ऊपर कोढ़ में खात की तरफ शिवपाल गंज  छाती पर वैद्यजी सवार है।

नैतिक अवमूल्यन की पहुँच परिवार के अंदर भी प्रवेश कर गयी है। माने हुए लठैत ठाकुर दुरबीन सिंह बुढ़ापे में अपने नशेबाज भतीजे के जोरदार तमाचे से कुएँ की जगत पर गिर पड़ते हैं। वृद्ध  कुसहर प्रसाद अपने बेटे छोटे पहलवान की लाठी का शिकार बनते हैं। रुप्पन कई मुद्दों पर अपने पिता वैद्यजी का विरोध करने लगा है। बड़ा बेटा बद्री पहलवान वैद्यजी के मुँह पर खरी-खोटी सुनाने से नहीं चूकता।

स्वाधीनता के बाद पंचवर्षीय योजनाओं के तहत योजना आयोग द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों के आर्थिक विकास के साथ ही बहुमुखी विकास पर रुपया पानी की तरह बहाया गया। लोगों में जिस अनुपात में शासन पर आत्मनिर्भरता की वृत्ति में वृद्धि हुई है, सरकार पर उससे कहीं अधिक अविश्वास बढ़ा। विकास के नाम पर गांव के अंदर हुल्लड़बाजी, असुरक्षा, तनाव, लूट खसोट, पारस्परिक अविश्वास, असहयोग संस्थाजीविता, भ्रष्टाचार वृद्धि हुई है। अस्वस्थ नेतृत्व के कारण राष्ट्रीय भावना का लोप हुआ है। कहीं कोई प्रेरणास्रोत नहीं रह गया। नयी पीढ़ी नितांत खोखली, निस्तेज और उद्दंड सिद्ध हुई । सामुदायिक विकास योजनाओं के तहत शोषण के नये-नये क्षेत्र खुले, जिसका सर्वाधिक प्रमुख क्षेत्र बनी शिक्षा और शिक्षण संस्थाएँ। इन सारी स्थितियों को देखते हुए शहर से आए इंडोलॉजी के शोध छात्रो तथा कथित बुद्धिजीवी बाबू रंगनाथ काफी असंतुष्ट रहने लगे थे। लेकिन प्रधानी में सनीचर की विजय के विजय के बाद उनके धैर्य का बांध डगमगाने लगा। इसका संकेत देते हुए उपन्यासकार ने लिखा है:

“सनीचर के विजय के दिन उसने ( रंगनाथ ने) में बहुत कुछ सोच डाला और उस दौरान उसे प्रदेश की राजधानी में जाने कितने वैद्यजी और मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों की कतार में जाने कितने सनीचर घुसे दिखे।“ (पु0296) लेकिन पवित्र भ्रष्टाचार का केंद्र छंगामल इंटरकॉलेज में मालवीय और खन्ना के विरुद्ध चल रहे षड्यंत्र को देखकर उनके धैर्य का बांध टूट जाता है और वे कहते हैं:

“धरती पर एक शिवपालगंज ही नहीं है। हमारे-तुम्हारे लिए सारा मुल्क पड़ा हुआ है। इस पर भुनभुनाते हुए रुप्पन ने कहा, “मुझे लगता है दादा सारे मुल्क में शिवपालगंज ही फैला हुआ है।“ (पु0 388)  

 उपन्यास में चित्रित समाज के चित्रण से ऐसा लगता है कि इसमें शिवपाल गंज के माध्यम से सारे गांव, समाज ही नहीं वरन समूचे स्वातंत्रयोत्तर भारत का यथावत प्रस्तुत किया गया है। अतः ‘राग दरबारी’ में चित्रित स्वातंत्रयोत्तर भारत के गांव और समाज की वास्तविक स्थिति समूचे देश के यथार्थ को प्रतीकित करती है।





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