'जिन्दगीनामा': संक्षिप्त परिचय
आर0पी0 मिश्रा
'जिन्दगीनामा' कृष्णा सोबती का सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपन्यास है, यह उपन्यास बीसवीं सदी के हिन्दी उपन्यास साहित्य की भी बड़ी उपलब्धि है। 'जिन्दगीनामा' में विभाजनपूर्व पंजाब के जन-जीवन और संस्कृति का ऐसा अद्भुत पुनः सृजन किया गया है, जिसे पढ़ते हुए पाठक अभिभूत हो जाता है।
‘जिन्दगीनामा’ उपन्यास दसवें व अंतिम सिख गुरु गुरु गोविन्द सिंह के सुप्रसिद्ध फारसी क चूँ कार अज हमां हीलते दरगुज़श्त। हलालस्त बुर्दन ब- शमशीर दस्त’ (जब दूसरे सब रास्ते कारगर न हो सके तो जुल्म के खिलाफ तलवार उठा लेना ज़ायज़ है) को समर्पित है। उपन्यास का अंत भी उपन्यास के प्रमुख चरित्र शाह जी द्वारा इन्हीं पक्तियों के उद्धरण से होता है। उपन्यास के आरंभ व अंत दोनों जगह गुरु गोविन्द सिंह के संदेश का सन्दर्भ लेखिका और रचना के पंजाबी संस्कृति से गहरे जुड़ाव का प्रमाण है।
कृष्ण सोबती ने ‘जिन्दगीनामा’ की संकल्पना पंजाब के सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहास के रूप में की है। इतिहास की व्याख्या दस्तावेजों के रूप में न करके जन-सामान्य की सांस्कृतिक गतिविधियों द्वारा की है। कृष्णा सोबती का अपनी मातृभूति व संस्कृति से ऐसा गहरा लगाव है, जो उसके आरंभ में कविता बनकर फूट पड़ा है। उपन्यास के आरंभिक अट्ठाईस पृष्ठ कथा से अलग पंजाब का अत्यंत उदात्त और काव्यात्मक रेखाचित्र प्रस्तुत करते हैं।
उपन्यास में लेखिका के जन्मस्थान अविभाजित पंजाब के अब पाकिस्तान में रह गए जिला गुजरात की कमान की गई है। उपन्यास में कथा तो कम है, दृश्यों का एक सतत् क्रम है।। लेखिका ने डेरा जटा गाँव की यादों को एक संश्लिष्ट दृश्य में बाँधकर प्रस्तुत किया है।
उपन्यास का आरंभ शरद् पूर्णिमा की रात के खूबसूरत चित्रण में होता है। उसके बाद तो पंजाबी गांवों में बसे तीनों समुदायों हिंदू, मुसलमान व सिखों की घी-खिचड़ी जिन्दगी के अनेक चित्र सांस्कृतिक बिम्बों द्वारा प्रस्तुत हुए हैं, जिनमें ‘त्रिंजन भी है, लोहड़ी भी, प्रेम कथाएँ भी ईद और दशहरा भी और पंजाबी का विशेष त्यौहार ‘बैसाखी’ भी शाह जी के परिवार को कथा के केन्द्र में रखकर लेखिका अनेकानेक अन्य कहानियों भी उपन्यास के कलेवर में सँजो दी है।
जिन्दगीनामा उपन्यास में डेरा जट्टा गाँव के जीवन का हर पहलू जीवंत रूप में चित्रित है। उपन्यास के अंत तक देश के स्वतंत्रता संग्राम की गूँज भी सुनाई देने लगती है। भगत सिंह के चाचा अजीत सिंह, क्रांतिकारी कवि लालचंद ‘फलक’ और गदर (1914) के चर्चे उपन्यास के अंत तक शुरू हो जाते हैं। जिन्दगीनामा उपन्यास में वर्णित जीवन का कालखंड 1910 से 1915 का जान पड़ता है।
‘जिन्दगीमामा’ उपन्यास एक सांस्कृतिक ऐतिहासिक औपन्यासिक रचना है। इसमें व्यक्ति कथा कम, संस्कृति-कथा अधिक चित्रित हुई है। हालांकि इस संस्कृति कथा को बयान करने में लेखिका ने पंजाबी प्रभाव युक्त जिस भाषा का प्रयोग किया है, उससे रेणु के 'मैला आँचल’ की भाषा की तरह कुछ पाठकों के लिए संप्रेषण बाधा आई है, लेकिन सांस्कृतिक परिवेश की रचना की भाषा इसी रूप में सौन्दर्य सृजित कर सकती थी।
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