मुक्तक काव्य परंपरा और बिहारी
बहुत बड़ी बात को थोड़े शब्दों में चमत्कारपूर्ण ढंग से कह देना, एक बड़े प्रसंग को दोहे की सीमित काया में अंटाकर अलंकारी की लड़ी पिरो देना बिहारी का प्रमुख कौशल है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की 'दृष्टि में मुक्तक कविता में जो गुण होना चाहिए वह बिहारी के दोहों में अपने चरम उत्कर्ष को पहुँचा है. इसमें कोई संदेह नहीं। मुक्तक में प्रबंध के समान रस की धारा नहीं बहती, जिसमें कथा-प्रसंग की परिस्थिति में अपने को भूला हुआ पाठक मग्न हो जाता है और हृदय में एक स्थायी प्रभाव ग्रहण करता है। इसमें तो रस के ऐसे छींटे पड़ते हैं, जिनसे हृदय कलिका थोड़ी देर के लिए खिल उठती है। यदि प्रबंध काव्य एक विस्तृत बनस्थली है तो मुक्तक एक चुना हुआ गुलदस्ता है।
भारत में ईसा के आसपास से ही ऐसे शृंगारिक मुक्तको का प्रचलन था जिसमें धर्म और नैतिकता के अनुशासन से दूर लोक जीवन के रसमय पक्षों की झांकी उपस्थित की जाती थी। इस संदर्भ में सातवाहन नरेश हाल की प्राकृत रचना 'गाथा सप्तशती' उल्लेखनीय है। इसमें आमीर जाति के जीवन के उन्मुक्त हास-विलास, मनोरम प्रेम-क्रीडाओं और उन्मादक काम चेष्टाओं का मार्मिक अंकन हुआ है। यह कृति इतनी लोकप्रिय हुई कि इसके अनुकरण पर संस्कृत में भी रचनाएं होने लगीं। गोवर्द्धन की “आर्या सप्तशती"., अमरूक के "अमस्य शतक", उत्प्रेक्षावल्लभ के "सुन्दरी तिलक" आदि में इसी परम्परा का विकास है। बिहारी जहाँ एक ओर रीतिशास्त्र के जानकार थे, वहीं दूसरी ओर उनका शृंगारिक मुक्तको की इस सरस परम्परा से भी निकट का परिचय था और उन्होंने अपनी सतसई में दोनों का मुँह मिला दिया है। उन्होंने अपने संस्कार परिवेश और फारसी शायरी से कलम की सफाईऔर महीनकारी लेकर पुरानी उक्तियों को और भी बेधक बना दिया है एवं उसमें एक विशेष प्रकार की चमक भर दी है। गाथा सप्तशती का एक पद है-
अब्बो टुक्कर आरक पुणो वितन्ति करेसि गमणास। अज्ज विण होन्ति सरला वेणीय तरंगिणे चिउरा ।।
अर्थात "हे दुष्कर व्यवहार करने वाले ! अब तक तो तुम्हारे प्रवास के दिनों के गुलझट पड़े केश भी नहीं सुलझ पाए हैं और तुम फिर बाहर जाने की चिन्ता में लगे।" बिहारी ने इस भाव को किंचित बदलकर अपनी "सतसई' में यह रूप दे दिया है-
अजी न आए सहज रंग विरह दूबरे गात।
अब ही कहा चलाइयतु, ललन चलन की बात ।।
विरह में दुबली हुई (नायिका की) देह में अब तक स्वाभाविक कांति भी नहीं आई है (फिर) हे ललन,(परदेस) चलने की बात अभी क्यों चला रहे हैं?
बिहारी का यह दोहा गाथाकार की उक्ति से कहीं ज्यादा मार्मिक और मनोज्ञ बन गया है क्योंकि वहाँ उलझे हुए केशों के ही न सुलझ पाने की चर्चा थी, यहाँ प्रिय के प्रवास का प्रभाव सम्पूर्ण शरीर की विवर्णता के रूप में प्रकट हुआ है। इससे विरह की तीव्रता की व्यजना तो होती ही है, पाठकों के अंत:करण पर भी इसका प्रभाव अधिक सीधा और गहरा पड़ता है। यह दोहा एक बाह्य व्यापार मात्र से सम्बद्ध नहीं और अपेक्षाकृत विशद जीवन-दृष्टि तथा व्यापक मानसिक संघटन का परिचायक है।
बिहारी एक सजग कलाकार हैं। उन्होंने जीवन में 713 दोहों का ही एक ग्रंथ लिखा और वह है "बिहारी सतसई" बिहारी मुक्तक कवि हैं। मुक्तकार के पास जीवन का आधार फलक अत्यंत सीमित होता है और उसमें ही उसे सजीव रूप रेखाऐं और रंग भरने पड़ते है। जिस मुक्तक काव्य में यह रूप रंग जितना उज्ज्वल होगा वह उतना ही सफल होगा। संस्कृत के अमरूक और बिहारी के दोहों में मुक्तक काव्य की यह विशिष्टता अपनी चरम सीमा पर पहुँची हुई है। मुक्तक काव्य में कल्पना की समाहार शक्ति और भाषा की समास शक्ति का होना अनिवार्य होता है, उसे अपने खंड दृश्यों में रस की एक ऐसी वेगवती अजय धारा प्रवाहित करनी होती है जो हृदय कलिका को विकसित कर दे, उसके प्रत्येक पद्म का पूर्वापर सम्बन्ध से रहित अपना एक अलग अस्तित्व हो, उसके पद्य स्तबकों में प्रभावजन्य एक अपूर्व निविड़ता और तरलता हो, जो स्थायी प्रभाव उत्पन्न करने में सक्षम हो और पाठक को चमत्कृत कर दे। मुक्तक के ये सभी गुण अपने भव्य रूप में बिहारी के दोहों में विद्यमान है ।उन्होंने गागर में सागर भर दिया है। किसी ने ठीक ही कहा है
सतसैया के दोहरे, ज्यों नावक के तीर।
देखन में छोटे लगैं, बेधैं सकल सरीर II
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने मुक्तक की सफलता के लिए शर्ते रखी हैं - "कल्पना को समाहार शक्ति " और "भाषा की समान शक्ति" बिहारी रमणीय प्रसंगों की उद्भावना और संयोजन में जितने पटु हैं, भाषा को चुस्त प्रयोग में भी उतने ही सुदक्ष। इसीलिए वे दोहे की छोटी-सी जमीन पर इतने करिश्मे दिखा सके हैं जैसे नट कूदकर छोटी-सी कुंडली से शीघ्रता से निकल जाता है। ध्यातव्य है कि एक से एक बारीक सूझ बिहारी की कविता में मिलेगी। फिर, खूबी यह कि ये कल्पनाएँ एक-दूसरे से जुड़ी प्रतीत रहती हैं। कल्पना की इसी समाहार शक्ति के कारण बिहारी ने एक-एक दोहे में अपार अर्थ- गाम्भीर्य भर दिया है - "अर्थ अमित अरू आखर थोरे "- तुलसीदास की इस उक्ति को बिहारी ने ही चरितार्थ किया।
बिहारी की काव्य-भाषा में समास शक्ति पूर्ण रूप में विद्यमान है। इसके कारण काव्य-भाषा में अद्भुत कसावट आ गई है। थोड़े में बहुत अधिक कह देना बिहारी का बहुत बड़ा कौशल है और यही उनकी सफलता का रहस्य भी है। लेकिन इसके लिए उन्हें शब्दों की ज्यादा तोड़-मरोड़ नहीं करनी पड़ी है।
संक्षिप्तता और सांकेतिकता के अतिरिक्त, बिहारी की काव्य-कला का दूसरी विशेषता है वाग्वैदग्ध या कथन-चातुरी। बिहारी एक साधारण-सी लगने वाली बात को भी इस खूबी से इस शब्दावली में कहते हैं कि वह साधारण बात भी अपूर्व-असाधारण हो जाती है। अच्छे गहने और अच्छे वस्त्र के अभाव में भी वस्तुतः सुंदर स्त्री सुंदर लगती है। यह एक साधारण बात है। मगर इसी को बिहारी इस खूबी से कहते हैं कि एक अपूर्व चमत्कार आ जाता है.
भूषण भार सँभारिहैं, क्यों यह तन सुकुमार।
सूघो पायँ न परत महि, सोमा ही के भार।।
बिहारी ने शब्दों का निपुण और बेजोड़ प्रयोग किया है। यदि किसी शब्द विशेष को बदलकर पर्यायवाची अन्य शब्द रख दिए जाएँ तो सारा चमत्कार तो चौपट हो ही जाएगा "लीक नहीं यह पीक की, श्रुति- मन-मूल कपाल।" यहाँ "श्रुति" आदि शब्द बदले नहीं जा सकते। बिहारी के दोहे में प्रत्येक शब्द एक विशिष्ट चित्र, ध्वनि और अर्थ रखता है। निम्नलिखित दोहे में प्रत्येक शब्द एक शब्द-चित्र दे रहा है और लगता है कि आँखों के सामने तस्वीरों की रील चल रही हैं-
भरत, ढरत, बूढ़त, तिरत रहत, घरी लौं नैन ।
ज्यों-ज्यों पट झटकति, हँसति, हठति, नचावति नैन ॥
इसी प्रकार निम्नलिखित दोहे में प्रत्येक शब्द ऐसी ध्वनि लिए हुए है कि उच्चारण से वस्तु का बोध हो जाता है-
रनित भृंग घंटावली झरित दान मधु-नीरू।
मंद मंद आवतु चल्यौ कुंजर कुंज समीरु ।।
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