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Saturday, September 4, 2021

झूठा सच: यशपाल (सारांश एवं परिचय)


 'झूठा सच' यशपाल (सारांश एवं परिचय)


झूठा सच निर्विवाद रूप से यशपाल का सर्वश्रेष्ठ उपन्यास है। इसका पहला खंड सन् 1958 और दूसरा सन् 1960 में प्रकाशित हुआ इन्द्रनाथ मदान ने रंगों के रूपक द्वारा इसे लाल से गुलाबी की ओर यशपाल के   संचरण के रूप में देखा है। अर्थात् अपने पूर्ववर्ती उपन्यासों में कम्युनिस्ट पार्टी की विचारधारा और नीतियों के समर्थक जैसे नायकों की रचना यशपाल करते रहे थे, यहाँ वे उससे थोड़ा हटे हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि कम्युनिस्ट विचारधारा के प्रति वे उदासीन हो गए हैं। 'दादा कामरेड', 'पार्टी कामरेड', 'देशद्रोही' आदि उपन्यासों का सामाजिक फलक बहुत छोटा है। इनमें पार्टी नीतियाँ प्रमुख होकर आई है जबकि लाहौर को केन्द्र बनाकर लिखा गया 'झूठा सच' का पहला खण्ड पंजाब और पंजाबियत को समग्रता के साथ अपने में समाए हुए है। विभाजन की त्रासदी उस पर एक आघात बनकर आती है। इस खण्ड में भी असद, गिल जैसे कम्युनिस्ट पात्र है, लेकिन विभाजन की त्रासद पृष्ठभूमि में उनकी किसी क्रांतिकारी भूमिका का उल्लेख सम्भव नहीं था। जबकि उपन्यास के दूसरे खण्ड 'देश का भविष्य में यशपाल ने कम्युनिस्ट पात्रों और उनकी गतिविधियों का समुचित उल्लेख किया है। पी.सी. जोशी और बी.टी. रणदिवे की पोलिटिकल लाइन पर खुलकर चर्चा हुई है। लेकिन इसका सम्बन्ध देश के वर्तमान से न होकर देश के भविष्य से अधिक है।


'झूठा सच' में भी कम्युनिस्ट पात्र है लेकिन उसमें पार्टी और उसकी विचारधारा के बाहर का एक खुला और भरा-पूरा संसार भी है और वही उपन्यास में अधिक महत्वपूर्ण है। उपन्यास का आरंभ लाहौर की एक गली में मास्टर राम लुभाया की माँ की मृत्यु से होता है। लाहौर का शांत और आपसी सद्भाव वाला यह जीवन देखते-देखते नेताओं के राजनैतिक स्वार्थों की भेंट चढ़ जाता है। इन्हीं आर्यसमाजी मास्टर राम लुभाया का बेटा जयदेवपुरी और बेटी तारा 'झूठा सच' के केन्द्रीय पात्रों के रूप में विकसित होते हैं। जयदेव पत्रकार हैं। साम्प्रदायिक दंगों में मारे गए दौलू मामा की मृत्यु पर लिखी गई उसकी टिप्पणी का एक अंश है, "तुम्हारे कत्ल के लिए उत्तेजना दिलाने की जिम्मेदारी उन नेताओं पर है जो तुम्हारे जैसे इंसानों को शासन के सिंहासन पर पहुँच सकने का जीना बनाने के लिए जनता को ईंट गारे की तरह प्रयोग करना चाहते हैं। क्या हम सर्वसाधारण स्वार्थों में अंधे और क्रूर लोगों के सपनों के महलों में पहुंचने के लिए जीने बनते रहेंगे? क्या सर्वसाधारण अपने नेताओं को मानवता की कसौटी पर जाँचकर नहीं परखेंगे? क्या अपने स्वार्थों के लिए सर्वसाधारण को अंधा बना देना ही धर्म की रक्षा, प्रजातन्त्र और जनवाद है?...........” (झूठा सच. पृ. 137) जयदेव पूरी की इस टिप्पणी में पत्रकारोचित  आवेश के बावजूद राजनीति और नेताओं के प्रति हताशा का स्वर बहुत स्पष्ट है।‘झूठा सच' के समर्पण में यशपाल इन दो पक्षों को ही आमने-सामने रखकर उपन्यास के नामकरण की ओर संकेत करते हैं। एक ओर जनसमुदाय है जो सदा झूठ से ठगा गया है और दूसरी ओर झूठ का वव्साय करने वाले नेता है, जिनके द्वारा झूठ से छली जाकर भी जनता सच के प्रति अपनी निष्ठा और उसकी और बढ़ने का साहस नहीं छोड़ती। 

उपन्यास के दूसरे खंड ‘देश का भविष्य’ में यशपाल कांग्रेस की जनविरोधी  राजनीति और उसके दूरगामी परिणामों की ओर संकेत करके उससे मुक्ति का आह्वाहन करते हुए देश का भविष्य देश की जनता के ही हाथ में होने की घोषणा करते हैं। ‘झूठा सच’ के रूसी अनुवाद की भूमिका लिखते हुए चेलेशेव  इस सवाल को उठाते हैं, "ये कौन लोग हैं जिनके काम में भारत का भविष्य है? ये बहुत से लोग हैं, सूद जी जैसे लोगों से कही अधिक। ये वे भूखे लोग हैं जो अपनी रोटी का आखिरी टुकड़ा भी शरणार्थियों को देते है। ये साहसी नवयुवक और नवयुवतियों है जो धार्मिक कट्टरता की आग को बुझाने के लिए कृतसंकल्प है। ये वोट डालने वाली साधारण जनता है जो सूदजी तथा उन जैसे लोगों का विरोध करती है। उपन्यास के अंत में डॉ0 नाथ का स्वगत कथन पूरी तरह से प्रतीकात्मक है। इससे विश्वास होता है कि जनता निर्जीव नहीं है और वह सदा मूक भी नहीं रहती.. ..." (यशपाल के पत्र, मधुरेश, पृ. 128)

यशपाल मूलत: एक मध्यवर्गीय समाज के लेखक है। मध्यवर्ग के चित्रण और प्रतिनिधित्व की दृष्टि से ‘झूठा सच’ एक बड़ा और सार्थक प्रयास है। राम ज्वाया, रामलुभाया, जयदेव, तारा, पंडित गिरधारी लाल, कनक, नैयर, डॉ० प्राणनाथ और पंजाब के असंख्य परिवार मध्यम वर्ग के विभिन्न स्तरों का प्रतिनिधित्व करते हैं। पारिवारिक स्वार्थों का तनाव और सम्मिलित परिवारों का विघटन, आर्थिक संकट और साधनहीन श्रेणी की विरासत, संघर्ष लिए तैयार युवा पीढ़ी आदि 'झूठा सच' के पलक को एक प्रीतिकर विस्तार देते हैं। प्रेम, विवाह, शिक्षा और रोजगार की समस्याएँ एवं अर्थाभाव और हीन सामाजिक स्थिति से उत्पन्न कुठाओ और हीनभाव के विभिन्न रूप जयदेव और तारा के चरित्रों में मिलते हैं। इस समाज में विवाह की समस्या सबसे बड़ी और जटिल है। तारा और कनक के माध्यम से लेखक इसके विविध पक्षों पर विचार करता है। गिरधारी लाल इन दो ध्रुवों  के बीच जैसे सामजस्य और संतुलन स्थापित करते हैं। विवाह को एक सामाजिक-आर्थिक समझौते के रूप में स्वीकृति देकर वे विश्वास करते हैं कि सामाजिक-आर्थिक चौखटे के बाहर जाकर वह बिखर जाएगा। शीलो और रतन का प्रसंग इसी समस्या का एक और पक्ष है। भले ही समाज की दृष्टि में यह तारा पर व्यभिचार को प्रश्रय देने का उदाहरण हो, लेकिन तारा ने शीलो को रतन से मिलाकर सामाजिक क्रांति विशेषतः नारी मुक्ति की दिशा में एक सही कदम उठाया है। उपन्यास के अधिकांश महत्वपूर्ण पात्र मध्यवर्गीय समाज से संबद्ध है और वे अपने समाज और परिवेश के प्रति सच्चे और ईमानदार है। पात्रों के इस वैविध्य के कारण ही 'झूठा सच’ वस्तुतः सामाजिक जीवन का महाकाव्य बन सका है। यह लेखक की एक बड़ी सफलता है कि वह प्रमुख और गौण दोनों प्रकार के पात्रों पर समान रूप से ध्यान केन्द्रित कर सकता है। तारा, पुरी और कनक जैसे मुख्य पात्रों के साथ गिरधारी लाल, नैयर, गिल, असद, मर्सी, दत्ता, उर्मिला के अतिरिक्त शीलो, रतन, भगवती, पूरणदेई, सीता, मेलादेई, कतारो, खुशालसिंह आदि जैसे ढेरों पात्रों को लेखक ने गहरी आत्मीयता और संयम के साथ गढ़ा है।


जयदेवपुरी उपन्यास का नायक और मुख्यपात्र है। वह अपनी सारी दुर्बलताओं, शक्ति और संभावनाओं के साथ उपन्यास में उपस्थित है। उसके आदर्शों पर धीरे-धीरे मध्यवर्गीय जीवन का यथार्थ और उसकी वास्तविकताएँ हावी होती जाती है। सारे जद्दोजहद के बाद, परिस्थितियों से समझौता करके, वह एक वामपंथी कांग्रेसी और फिर अवसरवादी नेता बन जाता है। यदि लेखक चाहता तो अपने पूर्व उपन्यासों की परम्परा में उसे आसानी से कम्युनिस्ट हीरो बनाया जा सकता था। लेकिन यह काम वह उससे न लेकर गिल जैसे बहुत से दूसरे पात्रों से लेता है। पुरी मध्यवर्गीय आकांक्षाओं और विडम्बनाओं का एक प्रतिनिधि चरित्र है, जिसमें विकास के स्थान पर लगातार हास लक्षित किया जा सकता है।


उपन्यास के स्त्री-पात्रों में तारा और कनक दोनों ही समान रूप से महत्वपूर्ण है। अपने-अपने ढंग से वे दोनों ही मध्यवर्ग के दो भिन्न स्तरों का प्रतिनिधित्व करती हैं।

तारा आरंभ में एक साधारण लड़की के रूप में सामने आती है जो अपने परिवेश की विद्रूपताओं से लड़ने के लिए अपनी सारी सीमाओं के बीच, हर मुमकिन कोशिश करती है।  उसकी त्रासदी किन्हीं अर्थों में समूचे मध्यवर्ग की त्रासदी है। घटना के बहाव में सोमा की तरह बहती नहीं है, बल्कि बहाव को काटकर मनचाही दिशा में बढ़ने के लिए संघर्ष  करती है। कनक अपेक्षाकृत अधिक सहज और सरल है। भारी कठिन और विपरीत स्थितियों के बीच भी वह अपनी निष्ठा और आस्था को बचाए रखती है। उर्मिला शुरू में एक किशोरी है जो सिर्फ अपनी धमनियों में बहते रक्त के प्रति ही सच्ची है। लेकिन बाद में यह गलत समझौतों से ऊपर उठकर अपने पैरों पर खड़ी हो अपने जीवन और भाग्य का निर्माण करने वाली स्त्री में बदल जाती है। इनके अलावा भी सैकड़ों छोटे-बड़े पात्र है जो पंजाब की धरती की बू-वास लिए है, जो संघर्ष करते हैं और जीवन की बेहतरी के लिए हर मुमकिन कोशिश करते हैं।


उपन्यास का पहला खंड 'वतन और देश' मुख्य रूप से लाहौर पर केन्द्रित है। पंजाबी जीवन का लोक रस, उसके रीति-रिवाज, आचार-व्यवहार, बोलियाँ, फेरी वालों की आवाजें और गीत आदि उसे गहरी स्थानीय रंगत देते हैं। लेकिन इसमें आचलिकता का कहीं कोई आग्रह नहीं है। उपन्यास का आरंभ ही रामज्वाया और रामलुभाया की माँ की मृत्यु पर स्यापे से होता है। यह वह सूत्र है जो उपन्यास के भावी विकास की दिशा का संकेत देता है। लाहौर की गलियाँ और बाजार, अनारकली, मालरोड, ग्वालमंडी, मजंग, नीला गुबंद, शाहमली, भाटी दरवाजा, भोला पांधे की गली आदि लगता है जैसे समूचा लाहौर मूर्तरूप से सामने खड़ा है। स्यापे में कौला नाहन उलाहना देती है "बोल मेरिए राणिए रामजीदा नाम .. फेरी वाले चिल्लाते हैं, "लै लौ जी जीकेल्ले  हरी छाल दे..... मरूद अलाहाबादी, नार काबल कंधार देजे.......” भागवंती गाली देती है..... "ये झूठे चुगली लगाने वाले बच्चे-पिट्टे, एंडीचड्णे मरैं, इनकी सात पीढ़ियों औन्तर रहे।"....... ये सारी चीजें उपन्यास की प्रामाणिक स्थानीयता की दृष्टि से उल्लेखनीय है। कदाचित पहली बार यशपाल 'झूठा सच’ में पंजाब के जनजीवन के बहाव में इतना तन्मय होकर बहे हैं।


भाषिक प्रयोग की दृष्टि से भी ‘झूठा सच' एक श्रेष्ठ, सफल और जन-जीवन की भाषा का प्रतिनिधि उपन्यास है। संतुलन, अनुपात और स्थान का ध्यान रखते हुए लेखक ने उपन्यास की भाषा को पंजाबी रंगत दी है, जिसमें भाषा की अपनी स्थानीय गंध सी बसी है। उसमें कितने ही पंजाबी शब्द-अमरू, भाया, कुड़माई, भाइया, सिरसड़े, झाई-नालदा आदि अपने मूल रूप में उपस्थित हैं। पढ़े-लिखे मध्यवर्गीय पात्र बोलचाल में अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग भी करते हैं-अपने खास पंजाबी उच्चारण के साथ। भोला पांधे की गली का निम्न मध्य वर्ग जो भाषा बोलता है, उससे उसकी मिट्टी का आत्मीय और अन्तरंग संबंध है। उपन्यास के प्रथम खण्ड में कितने ही मुस्लिम पात्र है जो उर्दू बोलते हैं। लेकिन इन पात्रों की उर्दू का भी अपना-अपना रंग और स्तर है। गौस मुहम्मद की भाषा ठीक वैसी ही नहीं है जैसी हाफिज जी की है। उपन्यास में ब्यौरों और वृत्तांत वाला रचना-विधान ठीक वैसा ही है जैसा किसी विशाल जनजीवन का चित्रण करने वाले किसी बड़े फलक के उपन्यास का होना चाहिए। उसका शिल्प ‘बूँद और समुद्र', 'भूले बिसरे चित्र' और प्रेमचंद के अधिकांश बड़े फलक वाले उपन्यासों वाला शिल्प है।


भाषा की दृष्टि से विचार करें तो ‘झूठा सच' के शब्द या वाक्यांश प्रयोग में एक बात खटकती है। लगता है, यशपाल रेणु के उपन्यासों की भाषा की अत्यधिक आंचलिकता, जो प्रायः पठनीयता में बाधक बनी है, से उबरने के प्रति काफी सावधान दिखाई देते हैं। इसलिए वे ठेठ पंजाबी शब्दों और वाक्यांशों का हिन्दी रूपान्तर कोष्ठकों में देते चलते हैं। जैसे-उलाहनी (विलाप के बोल), डिट्ठे पलंगा बालिए (भरे पूरे घर वाली), हुँदया हुक्म चालिए (जिसका हुक्म चलता हो), लग्गे बागा वालिए (अनेक बागों की मालकन) इसके साथ ही विशिष्ट पात्रों द्वारा बोले गए अंग्रेजी शब्दों, वाक्यांशों का कोष्ठकों में हिन्दी रूपान्तर भी देते चलते हैं। वस्तुतः भाषा प्रयोग की यह पद्धति उपन्यास के पाठ-प्रवाह में बाधक बनी है।


'झूठा सच' के दूसरे खण्ड देश का भविष्य में यशपाल उस समूची प्रक्रिया को बहुत विश्वसनीय रूप में अंकित करते हैं कि कैसे रातों-रात कांग्रेसियों और उनके हिमायतियों की एक पूरी की पूरी फौज खड़ी हो जाती है। सूद जी, अवस्थी जी, ठाकुर साहब और मिसेज़ अगरवाला जैसे लोग अपनी उपस्थिति में अकेले नहीं हैं। देश की आजादी के साथ जन्मे वे एक पूरे वर्ग के रूप में उभरे हैं। अंग्रेजों के जमाने में यही मिसेज अगरवला ब्रिटिश निटिंग क्लब की मेंबर थीं और किराए पर स्वेटर बुनवाकर ब्रिटिश जवानों को भिजवाती थीं। अब वे खद्दर पहनने लगी हैं- जो, उन्हीं के अनुसार, उनके पेट पर मूँज की तरह गड़ता है। गांधी जी की हत्या वाली रात में शराब के बीच कांग्रेसी नेताओं की बहसों के प्रसंग कहीं-कहीं अतिरंजनापूर्ण लग सकते हैं, लेकिन फिर लेखक जल्दी ही पाठक का विश्वास पा लेता है।


'झूठा सच' जैसे बड़े फलक और आकार वाले उपन्यासों पर 'बाह्य विस्तार का आरोप जब-तब लगाया जाता रहा है। उसका पहला खण्ड अपेक्षाकृत अधिक संश्लिष्ट और सुगठित है। लेकिन उसमें भी अंत तक पहुँचते-पहुँचते इस विस्तार का मोह सचमुच बढ़ा है। बंतो, अमरो, सतवंत और दुर्गा आदि की अलग-अलग कहानियों का भी सार एक ही है। वे सब अमानुषिकता और नृशंसता के ही बयान हैं। उपन्यास का दूसरा खण्ड ढीला-ढाला सा है। उसमें जनता के संघर्ष और नेताओं के व्यापक भ्रष्टाचार का संतुलन भी डगमगाया है। लेकिन इन सारी सीमाओं के बावजूद 'झूठा सच' यशपाल का सर्वश्रेष्ठ उपन्यास तो है ही, वह हिन्दी के कुछ उल्लेखनीय उपन्यासों में से भी एक है। प्रेमचंद की जनवादी परम्परा का विकसित, परिष्कृत और समयानुकूल परिवर्तित रूप उसमें देखा जा सकता है। अपने 'विशाल फलक, बहुविध समस्याओं और व्यापक जीवन चित्रों के कारण यह उनके अन्य उपन्यासों से विशिष्ट और श्रेष्ठ है।



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