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Sunday, December 19, 2021

These Electric Scooters are likely to enter the Indian market in 2022

 The demand for electric scooters is increasing rapidly in India. For this reason, two-wheeler companies are launching electric scooters one after the other with cool features. Because of this, many EV vehicles are coming in 2022, and companies are coming with many new features, including electric scooters from Hero MotoCorp, Okinawa, Komaki and Imflux One. These electric scooters can offer more range with a top speed. Here is information about some electrics, which will give you more range in the budget.


 Hero MotoCorp Vida Electric Scooter Hero MotoCorp, India's largest two-wheeler manufacturer is entering the electric two-wheeler segment in 2022 with an all-new electric scooter. The company has already registered with the name Vida, which is expected to be a new vertical for electric mobility and Hero MotoCorp's EV range. There may be an option of swapping batteries in this. It is expected that this electric scooter will compete with scooters like Ola, TVS and Bajaj. It is likely to have a range of over 100 km. 



Suzuki Burgman Street ElectricThe electric scooter from Suzuki Burgman Street Scooter is almost ready to be launched.  As of now, no information has been given on the performance and features of the Suzuki Burgman Street Electric, but it is expected to be a feature-packed electric scooter with a top speed of around 80 kmph and a range of over 75 kmph.  This scooter is likely to be launched in early 2022.



Komaki Venice Electric Scooter Delhi-based electric vehicle manufacturer Komaki Electric Vehicles is about to launch its new electric scooter.  The Komaki Venice will be a high-speed electric scooter and may come in 10 different colors and can be had at an affordable price.  It will come with new-age features like regenerative braking, a repair switch, as well as mobile connectivity


Okinawa Oki90 Electric Scooter may be launched in early 2022.  It will be one of the few products to arrive first in 2022.  Like the Oki100, it could be a high-speed EV with a top speed of 90 kmph and a range of 175-200 kph.

Friday, December 17, 2021

Especially or specially?

 Especially or specially? 


Especially and specially are adverbs.


Especially means ‘particularly’ or ‘above all’:


  • She loves flowers, especially roses.


  • I am especially grateful to all my family and friends who supported me.


Not: Especially I am …


You use especially to show that what you are saying applies more to one thing or situation than to others.

  • He was kind to his staff, especially those who were sick or in trouble.

  • Double ovens are a good idea, especially if you are cooking several meals at once.

  • These changes are especially important to small businesses.


When especially relates to the subject of a sentence, you put it immediately after the subject.


  • Young babies, especially, are vulnerable to colds.


You can also use especially in front of an adjective to emphasize a characteristic or quality.


  • I found her laugh especially annoying.



We use specially to talk about the specific purpose of something:


  • This kitchen was specially designed to make it easy for a disabled person to use.


  • He has his shirts made specially for him by a tailor in London.

  • They'd come down specially to see us.

  • She wore a specially designed costume.

  • The school is specially for children whose schooling h


Note : 

Especially can also be used to mean ‘for a particular purpose’:

  • I bought these (e)specially for you.

Thursday, December 16, 2021

अमूर्त सांस्कृतिक विरासत' (Intangible Cultural Heritage) क्या है?

 UNESCO.ORG के अनुसार, "सांस्कृतिक विरासत स्मारकों और वस्तुओं के संग्रह पर समाप्त नहीं होती है। इसमें परंपराएं या जीवित अभिव्यक्तियां भी शामिल हैं जो हमारे पूर्वजों से विरासत में मिली हैं और हमारे वंशजों को दी गई हैं, जैसे कि मौखिक परंपराएं, प्रदर्शन कला, सामाजिक प्रथाएं, अनुष्ठान,  उत्सव की घटनाएं, प्रकृति और ब्रह्मांड से संबंधित ज्ञान और प्रथाएं या पारंपरिक शिल्प का उत्पादन करने के लिए ज्ञान और कौशल।"


मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में वर्तमान में 492 तत्व हैं।  दुर्गा पूजा को शामिल करने के साथ, भारत के कुल 13 अमूर्त सांस्कृतिक विरासत तत्वों को अब यूनेस्को की प्रतिनिधि सूची में अंकित किया गया है।


 भारत के अन्य तत्व जो सूची में शामिल हैं:


 कूडियाट्टम: केरल का एक संस्कृत थिएटर;  मुदियेट: केरल का एक अनुष्ठानिक रंगमंच और नृत्य नाटक;  वैदिक मंत्रोच्चार: पवित्र हिंदू का पाठ;  रामलीला: रामायण का पारंपरिक प्रदर्शन;  राममन: गढ़वाल, उत्तराखंड का एक धार्मिक त्योहार और अनुष्ठान थियेटर;  कालबेलिया: राजस्थान के लोक गीत और नृत्य;  छऊ नृत्य: ओडिशा और पश्चिम बंगाल का शास्त्रीय नृत्य;  लद्दाख बौद्ध मंत्र: लद्दाख में पवित्र बौद्ध ग्रंथों का पाठ;  मणिपुरी संकीर्तन: मणिपुर का एक अनुष्ठान गायन, ढोल-नगाड़ा और नृत्य;  जंडियाला गुरु, पंजाब के ठठेरों के बीच बर्तन बनाने का पारंपरिक पीतल और तांबे का शिल्प;  योग: प्राचीन भारत में उत्पन्न प्राचीन भारतीय शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक अभ्यास;  कुंभ मेला: उत्तराखंड के हरिद्वार, महाराष्ट्र के नासिक, उत्तर प्रदेश के प्रयागराज और मध्य प्रदेश के उज्जैन में आयोजित सामूहिक हिंदू तीर्थयात्रा।

Sunday, December 12, 2021

प्रगतिवाद , हिंदी साहित्य

 'प्रगतिवाद' केवल काव्य प्रवृत्ति नहीं, व्यापक काव्यान्दोलन या साहित्यिक आंदोलन है। उसके पीछे मार्क्सवादी विचारधारा है जो राजनीतिक दृष्टि से आगे विश्वदृष्टि के रूप में भी महत्वपूर्ण है। प्रगतिवाद या प्रगतिशील साहित्य शब्द का प्रयोग 1936 के आसपास हुआ जब प्रगतिशील लेखक संघ स्थापित हो चुका था पर साहित्य में 1930 के बाद ही यह रूझान प्रकट होने लगा था जिसके पीछे बदली हुई राजनीतिक, सामाजिक वास्तविकता थी। प्रगतिवाद एक अर्थ में छायावाद का विकास है दूसरे अर्थ में छायावाद के विरुद्ध विकसित काव्यप्रवृत्ति। अन्तर्वस्तु की दृष्टि से प्रगतिवाद में ऐतिहासिक चेतना सामाजिक यथार्थ दृष्टि, परिवेश या प्रकृति के प्रति लगाव, जीवन के प्रति स्वीकृति का भाव, मानवीय संबंधों में समानता का आग्रह और भविष्योन्मुखी दृष्टि का महत्व है। रचनाविधान की दृष्टि से प्रगतिवाद में यथार्थबोध के अनुरूप नये रूपों की खोज, जीवन की हलचल से भरी भाषा, यथार्थ ज्ञान से प्रेरित ऐतिहासिक मूर्त्तता, लोकरूपों या छन्दों का आवश्यकतानुसार उपयोग, सहजता का शिल्प आदि महत्वपूर्ण हैं। प्रगतिवाद प्रयोगवाद या अन्य आधुनिकतावादी प्रवृत्ति के उभार के कारण कभी बीच में केन्द्र में न रह गया हो किंतु विकास उसका कभी स्थगित नहीं हुआ। यही कारण है कि आज भी जो नयी कविता लिखी जा रही है उसे प्रगतिवाद का ही विकास कहा जाएगा। प्रगतिवाद के प्रमुख कवि हैं : नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, शमशेर, मुक्तिबोध और त्रिलोचन। बाद के कवियों में केदारनाथ सिंह, धूमिल, कुमार विकल, अरुण कमल के नाम लिये जा सकते हैं। यों, ऐसे नामों की सूची बड़ी हो सकती है क्योंकि यह प्रवृत्ति आज पुनः केन्द्रीयता प्राप्त कर चुकी है।

ऐतिहासिक महत्व

प्रगतिवादी का एक काव्य प्रवृत्ति के रूप में और व्यापक साहित्यिक आंदोलन के रूप में ऐतिहासिक महत्व है। जिस समय अतिशय सूक्ष्मता और अति-कल्पनाशीलता के नाम पर हिन्दी कविता गूढ रहस्योन्मुख होती जा रही थी, प्रगतिवाद ने कविता को अपने समय के यथार्थ से, यथार्थ-बोध के अनेक रूपों से जोड़ा और कविता और राजनीति के बीच ऐसा घनिष्ठ संबंध विकसित किया जिससे आगे की कविता भी लाभान्वित हुई। प्रगतिवाद ने कविता संबंधी अवधारणा बदली और अपने समय के तीखे सवालों की गूंज कविता में पैदा की। प्रगतिवाद ने एक नये ही संदर्भ में ‘कविता किसके लिए'- जैसा सवाल उठाया। प्रगतिवाद अपनी ऐतिहासिक भूमिका के लिए साहित्य में स्थायी महत्व का विषय हो गया है।

साहित्यिक महत्व

प्रगतिवादी कविता उदाहरण है कि उसने साहित्य भूमि का विस्तार किया। कविता का संसार

अधिक यथार्थ, प्रामाणिक, व्यापक और विश्वसनीय लगने लगा। कविता की अंतर्वस्तु और रचनाविधान में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए। उपेक्षित जान पड़ने वाले विषयों, चरित्रों को काव्यात्मक प्रतिष्ठा मिली। कविता ने प्रत्यक्ष जीवन, लोकरूपों, लोक प्रचलित छन्दों का नया उपयोग किया और नयी संभावनाएँ खोजी।

प्रगतिवाद : सीमा और व्याप्ति

प्रगतिवाद का विरोध करने वाले ही उसकी सीमा यह बताते रहे हैं कि वह मार्क्सवाद का साहित्यिक रूपांतर मात्र है। पर यह सब जानते हैं कि यदि प्रगतिवाद नाम से परिचित काव्य प्रवृत्ति के महत्वपूर्ण कवियों में नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, शमशेर बहादुर सिंह, गजानन माधव मुक्तिबोध और त्रिलोचन जैसे बड़े कवि हैं तो उनका काम केवल मार्क्सवाद के सिद्धांत विवेक के जरिए नहीं चल सकता। मार्क्सवाद में उनकी आस्था जहाँ व्यापक जीवन ज्ञान में और गहरी जीवनासक्ति में सहायक हुई वहीं वे प्रगतिवाद को समर्थ काव्य प्रवृत्ति के रूप में विकसित करने के लिये, यथार्थ के नये रूपों की समझ के अनुरूप, नयी काव्य शैली का विकास करते रहे हैं। वैसे एक साहित्यिक आंदोलन के रूप में प्रगतिवाद का इतिहास मोटे तौर पर 1936 ई. से शुरू होने के बाद के लगभग बीस वर्षों का इतिहास है किन्तु यह ‘साहित्य में स्वस्थ सामाजिकता, व्यापक भावभूमि और उच्च विचार के निरंतर विकास का इतिहास है, जो न केवल राजनीतिक जागरण से आरंभ होकर क्रमशः जीवन की व्यापक समस्याओं की ओर, आदर्शवाद से आरंभ होकर क्रमशः यथार्थवाद की ओर और यथार्थवाद से आरंभ होकर क्रमशः स्वस्थ सामाजिक यथार्थवाद की ओर अग्रसर होता जा रहा है"। अतः व्यापक अर्थों में प्रगतिवाद न स्थिर मतवाद है न स्थिर काव्य रूप। उसमें निरंतर विकास हुआ है। आज प्रगतिशीलता के व्यापक अर्थ में ऐतिहासिक चेतना, जीवन विवेक, जीवनानुभवों के विस्तार, यथार्थ के मूल रूपों की समझ, जीवनधर्मी सौन्दर्यबोध, प्रकृतिबोध का उल्लेख किया जाता है, फिर भी जीवन को देखने की यथार्थवादी दृष्टि विशेष अर्थ में मार्क्सवादी दृष्टि को यहां प्रमुखता प्राप्त है। प्रगतिवाद के विकास में अपना योगदान देने वाले परवर्ती कवियों में केदारनाथ सिंह, धूमिल, कुमार विमल, अरुण कमल, राजेश जोशी के नाम उल्लेखनीय हैं।

प्रगतिवाद के प्रमुख कवि

नागार्जुन

प्रगतिवादी काव्यधारा के महत्वपूर्ण कवियों में प्रमख नागार्जुन के बारे में आज यह बात सहज ही कही जा सकती है कि समकालीन हिन्दी काव्य परिदृश्य में भी उन्हें केन्द्रीयता प्राप्त है। मैथिली काव्य रचनाओं के लिए साहित्य अकादमी द्वारा सम्मानित नागार्जुन खड़ी बोली हिन्दी कविताओं में भी मूल काव्य ऊर्जा, गहरी आंचलिकता, ठेठपन, तदभवता, व्यंग्यपूर्ण आक्रामकता और गहरी जीवनासक्ति का प्रमाण देते हैं। राजनीतिक कविताएं नागार्जुन के यहाँ बड़ी संख्या में हैं। उनमें जो सपाट तात्कालिक या इकहरी नहीं हैं, नागार्जुन की बड़ी कवि-प्रतिभा का प्रमाण देती हैं। कविता के लिए जो विषय अकल्पनीय या असंभव माने जाते हैं उनपर भी नागार्जुन ने कविताएँ लिखी हैं और असाधारण सफलता प्राप्त की है। जीवन के प्रति प्रगाढ़ राग की कविताएँ भी उनके यहाँ कम नहीं हैं। पर उनकी कविता का एक रंग वह है जहाँ नफरत, प्यार, विक्षोभ, जिज्ञासा घुलमिल जाते हैं उनमें फर्क करना मुश्किल हो जाता है। नागार्जुन का कविता की अंतर्वस्तु, रूप और भाषा पर अनोखा नियंत्रण दिखाई देता है। एक उदाहरण, उनकी समग्र काव्य क्षमता देखने के लिए प्रकृति से शुरू होकर एक दम सरल विन्यास वाली कविता कैसे राजनीतिक कविता हो जाती है, यह देखने के लिए शीर्षक है

"काले काले"

काले काले ऋतु रंग

काली काली घन घटा

काले काले गिरि श्रृंग

काली काली छवि घटा

काले काले परिवेश

काली काली करतूत

काली काली करतूत

काले काले परिवेश

काली काली महँगाई

काले काले अध्यादेश।

वाक्य क्रम के बदलाव में एक संयुक्त पद “काले काले” की आवृत्ति में कला भी अपना काम कर रही है और वर्ग संघर्ष या व्यवस्था से संघर्ष का ऐतिहासिक विवेक भी। नागार्जुन को आधुनिक कबीर कहा गया है, वह उनके फक्कड़ क्रांतिकारी व्यक्तित्व को देखते हुए उनकी कला में भी यही व्यक्तित्व समाया है।

 केदारनाथ अग्रवाल

केदारनाथ अग्रवाल प्रगतिवादी काव्यधारा के प्रतिनिधि तथा महत्वपूर्ण कवि हैं। रूमानी आदर्शवाद से यथार्थवाद तक, रूपासक्ति से जीवनासक्ति तक और कोमल रागात्मकता से खुरदुरे वस्तुचित्रण तक केदार की कविता के अनेक रंग हैं। भावुकता केदार के यहाँ आत्मीयता का पर्याय है। पत्नी प्रेम पर जैसी अकुण्ठ कविताएं केदारनाथ अग्रवाल ने लिखी हैं, किसी ने नहीं लिखीं। प्रेम, सौन्दर्य प्रकृति के गहरे लगाव के साथ केदार संघर्षशील जनता के कठोर जीवन, कठिन श्रम और दृढ़ आस्था की ओर बराबर सजग रहे हैं। 'चन्द्रगहना से लौटती बेर' तथा 'बसंती हवा' से केदार की खास पहचान बनी। यह सहजता, यह स्वाभाविकता सच्ची जीवनासक्ति से ही पैदा होती है।

एक बीते के बराबर

यह हरा ठिगना चना

बाँधे मुरैठा शीश पर

छोटे गुलाबी फूल का

सजकर खड़ा है।

और सरसों की न पूछो

हो गयी सबसे सयानी

हाथ पीले कर लिये हैं।

केदारनाथ अग्रवाल स्वीकार करते हैं कि मार्क्सवादी विचारधारा के कारण ही उन्हें नयी जीवन दृष्टि और नयी काव्यदृष्टि मिली। 'देवली के नरसंहार' जैसी तात्कालिक घटनाओं पर भी केदार ने कविताएँ लिखी हैं और अपनी वर्ग चेतना का प्रमाण दिया है।

शमशेर बहादुर सिंह

शमशेर बहादुर सिंह को प्रगतिवादी काव्यधारा से सम्बद्ध करने में उन्हें कठिनाई होती है जो

प्रगतिवाद को स्थिर मतवाद ही मानते हैं, उसकी काव्यात्मक संभावनाओं को महत्व नहीं देते।

शमशेर को रूपवादी या प्रयोगशील मानकर अलग कर दिया जाता है। शमशेर विचारधारा की दृ

ष्टि से मार्क्सवादी हैं और मार्क्सवाद को विशेष महत्व देते । जनता के प्रति उनकी सहानभूति

किसी से कम नहीं है। पर कविता को वे उसकी मुक्त संभावनाओं में देखते हैं। रूप और शिल्प

उन्हें जीवन की प्रकट सच्चाइयों की तरह ही जरूरी जान पड़ते हैं। ‘लेकर सीधा नारा' शमशेर

की वह महत्वपूर्ण कविता है जो प्रगतिवादी आंदोलन के दौर में विशेष चर्चित हुई।

लेकर सीधा नारा

कौन पुकारा

अंतिम आशाओं की सन्ध्याओं से

मैं समाज तो नहीं, न मैं कुल

जीवन

कण समूह में हूँ मैं केवल

एक कण

कौन सहारा।

शमशेर मानते रहे हैं कि उनकी असली जमीन रोमानी ही थी पर 'अमन का राग', 'यह शाम है

जैसी कविताएँ वे अपनी आस्था के अनुरूप लिखते रहे हैं। सांप्रदायिक दंगों पर उन्होंने बाद में

जो कविताएँ लिखी हैं वे प्रगतिशील विचारधारा, जीवन दृष्टि के बगैर असंभव है।

 गजानन माधव मुक्तिबोध

मुक्तिबोध की कविता का प्रगतिशील यथार्थवादी काव्यधारा से सहज संबंध बिठाने में डॉ.रामविलास शर्मा तक को कठिनाई होती है। अब शायद यह बात अधिक स्पष्टतापूर्वक कही जा रही है कि प्रगतिशील यथार्थवादी कविता की ही कम से कम दो परंपराएँ हैं -एक में नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल आते हैं, दूसरी में शमशेर, मुक्तिबोध । मुक्तिबोध ने सीधे-सीधे स्वीकार किया है कि एक कला सिद्धांत के पीछे विशेष जीवन दृष्टि होती है, उसके पीछे एक जीवन दर्शन होता है और उसके पीछे एक राजनैतिक दृष्टि भी होती है। मुक्तिबोध की महत्वपूर्ण लम्बी कविताएँ राजनैतिक दृष्टि से वंचित नहीं हैं। यह राजनीतिक दृष्टि मार्क्सवाद ही है जो व्यापक अर्थ में विश्वदृष्टि भी है। 'अन्तःकरण का आयतन' कविता में मुक्तिबोध अपना पक्ष स्पष्ट करते

पृथ्वी के प्रसारों पर

जहाँ भी स्नेह या संगर

वहाँ पर एक मेरी छटपटाहट है

वहाँ है जोर गहरा एक मेरा भी

सतत मेरी उपस्थिति

नित्य सन्निधि है।

मुक्तिबोध ने यथार्थ चित्रण के लिए फैन्टेसी का भी उपयोग किया और इस प्रकार एकरस जान पड़ने वाले काव्यरूप में विविधता, नाटकीयता, गति पैदा की। अँधेरी दुनिया के रहस्यों को भेदते हुए मुक्तिबोध के जो विचार स्फुलिंग सामने आते हैं वे एक निश्चित विचारधारा या जीवन दृष्टि का प्रमाण देते हैं। वे सत्ता को किस तरह बेनकाब करते हैं इसका सटीक उदाहरण है

'भूलगलती' नाम कविता जिसमें भूलगलती सिंहासन पर बैठी है और 'सच' नाम का पात्र गिरफ्तार करके लाया जाता है। अँधेरे में' मुक्तिबोध की सबसे महत्वपूर्ण कविता है – आधुनिक कविता की विशिष्ट उपलब्धियों में एक।


 त्रिलोचन

त्रिलोचन की एक अलग पहचान है। परम्परा में ही उन्हें रखना हो तो वे तुलसी और निराला की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले कवि हैं। उन्होंने राजनीतिक विषयों पर कविताएं नहीं लिखी हैं कि उनकी विचारधारा तक सीधे पहुंचना आसान हो। पर साधारण विषयों पर, जीवन के बहुत मामूली प्रसंगों पर लिखते हुए भी वे अपनी दृष्टि का प्रमाण देते हैं। सानेट त्रिलोचन का अपना आविष्कार है। सानेटों में जितनी सहजता से वे आत्मकथा या सामाजिक संदेश बिखेरते चलते हैं, उसी से उनकी साफ दृष्टि और असाधारण काव्यक्षमता का पता चलता है। त्रिलोचन की कविताएँ सीधे जीवन को पकड़ती हैं। त्रिलोचन के सानेटों में आत्मभर्त्सना के जो अंकुठ संकेत हैं उनसे उनकी जीवनशक्ति प्रकटहोती है। "भीख मांगते उसी त्रिलोचन को देखा कल/जिसको समझे था है तो है यह फौलादी", 'नगई महरा' जैसे इतिवृत्त में उनका ढंग दूसरा है बतकही वाला ढंग। कृत्रिमता, बनावटीपन से मुक्त यह सहज आत्मीयता त्रिलोचन का काव्यवैशिष्ट्य है- शब्दकार इन शब्दों में जीवन होता है।





Friday, December 10, 2021

right to choose a life partner

Under Article 21 (right to life) of the Indian Constitution, adults have the right to choose a life partner of their choice.  Interfering in this right is against the Constitution. When two adults choose each other as life partners, it is an expression of their choice, which is recognized under Article 19 (1)(a) of the Constitution. Apart from this, the Supreme Court has also described inter-caste marriage as an important part of a person's choice, his basic rights and self-respect. According to the court, 'Crushing one's choice in the name of false pride is tantamount to physical torture, which causes the society to shudder.

Wednesday, December 8, 2021

डिजी यात्रा योजना क्या है?

 डिजी यात्रा योजना क्या है?

डिजी यात्रा योजना हवाई यात्रा को आसान और पेपर-लेस बनाने की योजना है। डिजी यात्रा के तहत हवाई अड्डों पर उच्च तकनीक वाले बॉडी स्कैनर, फेशियल रिकग्निशन तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा। इससे यात्री कम समय में सुरक्षा जांच के कई स्तरों से गुजर सकेंगे। इसमें यात्रियों का एक सेंट्रलाइज सिस्टम के जरिए रजिस्ट्रेशन किया जाएगा।रजिस्ट्रेशन के बाद उन्हें एक डिजी यात्रा आईडी दी जाएगी। एक बार रजिस्ट्रेशन हो जाने के बाद आपका डेटा इस सिस्टम में स्टोर हो जाएगा। इसके बाद आप जब भी टिकट बुक कराएंगे, उस समय आपको इसी आईडी का इस्तेमाल करना होगा।


फेशियल रिकग्निशन तकनीक क्या है?


फेशियल रिकग्निशन का सीधा-सीधा मतलब किसी व्यक्ति की पहचान उसके चेहरे से करना। फोटो, वीडियो या रियल टाइम में लोगों की पहचान करने के लिए फेशियल रिकग्निशन  तकनीक का सहारा लिया जाता है।  इस तकनीक द्वारा किसी व्यक्ति के फोटो को उसके चेहरे के फीचर्स के हिसाब से डिजिटल डेटाबेस में बदला जाता है।

Friday, December 3, 2021

What is DRE Technology

What is DRE Technology

This is a technology that converts the internal storage of the phone into virtual RAM.  Virtual RAM actually uses the phone's internal storage as temporary RAM.  Its main job is to improve memory management.  It helps to keep more apps in memory as compared to physical RAM. This is known Virtual Ram Expansion. RAM does many things in our phone.  It stores data, helps in multitasking and also increases the speed of the phone.  But the Android phone we have has limited RAM.  In such a situation, considering the needs of multitasking in the phone, physical RAM is not enough today.  In order to extend the capabilities of the smartphone and for better multitasking, Virtual RAM or DRE helps to increase the RAM by using some of the storage as RAM, to store more active apps.

Virtual RAM manages all those apps which have no dynamic function in background and will keep such apps in memory for a long time.  The Android system will take care and prioritize which apps should be stored in virtual memory and which should not.  Virtual RAM will be used only when physical RAM is going beyond its limits to handle the process.  By using the virtual memory feature, more apps can stay in the background for a longer period of time.

Thursday, December 2, 2021

छायावाद के प्रमुख कवि

छायावाद के प्रमुख कवि
                                                   आर.पी. मिश्रा

"छायावाद" अपने आप में कविता का एक ऐसा युग है जिसका सम्बन्ध भाव-जगत से है, हृदय की भूमि से है। भावलोक की तो सत्ता ही अनुभव विषय है, हृदय से जानने, समझने और महसूस करने की वस्तु है। उसी छायावाद में समय-समय पर अनेक रचनाकारों और कवियों का समावेश होता रहा। कभी वहाँ "बृहतत्रयी' के रूप में “प्रसाद", “निराला” और “पन्त” की चर्चा की जाती रही तो कभी बृहच्चतुष्ट्य के रूप में इन तीनों कवियों के साथ “महादेवी" का नाम जोड़कर देखा जाता रहा। कुल मिलाकर छायावाद प्रमुख कवियों या आधार-स्तम्भों में इन चारों महाकवियों की चर्चा, किसी न किसी रूप में चलती ही रही। यह अलग बात है कि इन चार कवियों के साथ-साथ छायावाद के अन्य कवियों में, उत्तरछायावादी कवि या गौण छायावाद कवि कहकर माखनलाल चतुर्वेदी, डॉ. रामकुमार वर्मा, जानकीबल्लभ शास्त्री, हरिकृष्ण प्रेमी, जनार्दन झा “द्विज", लक्ष्मी नारायण मिश्र, इलाचन्द्र जोशी, डॉ. नगेन्द्र, चन्द्र प्रकाश सिंह, विद्यावती कोकिल, तारा पाण्डेय, मुकुटधर पाण्डेय, उदय शंकर भट्ट तथा नरेन्द्र शर्मा आदि कवियों को भी इसमें समाविष्ट किया जाता रहा। छायावाद के चार प्रमुख कवियों से इतर इन सभी कवियों के काव्य और उनकी प्रवृत्तियों को लेकर विवाद भी चलते रहे परन्तु इन्हें छायावाद के प्रमुख कवियों में सर्वमान्यता से शामिल नहीं किया जा सका। तो आईये चारों प्रमुख कवियों के संदर्भ में चर्चा करतें है। 
प्रवर्तक कवि जयशंकर प्रसाद
छायावाद के अग्रदूत या प्रवर्तक के रूप में हमारे सामने केवल जयशंकर प्रसाद का ही नाम उभर कर आता है। केवल भाषा या विषय-वस्तु ही नहीं, प्रसाद ने जीवन दृष्टि भी नवीन बना डाली। 20वीं शताब्दी को अपने व्यक्तित्व और कृतित्व से सर्वाधिक प्रभावित और प्रेरित करने वाले इस “बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न” कलाकार ने कविता के साथ-साथ नाटक, उपन्यास, कहानी, निबन्ध तथा समीक्षा आदि विभिन्न गद्य-पद्य विधाओं में अपनी ऐतिहासिक तथा महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। सन् 1889 ई. में वाराणसी के एक प्रतिष्ठित परिवार में जन्मे “प्रसाद" का जीवन परिस्थितियों से संघर्ष करते हुए प्रारम्भ हुआ। घर में ही शिक्षार्जन तथा पारिवारिक व्यवसाय का दायित्व निभाते हुए भी सरस्वती के इस लाडले पुत्र ने अपनी अप्रतिम प्रतिभा का परिचय दिया और कई काव्य-कृतियों की रचना कर डाली। प्रारम्भ में “कलाधर के नाम से कतिपय ब्रजभाषा-छन्द भी प्रसाद ने लिखे जो आगे चलकर "चित्राधार' में संकलित किए गए। खड़ी बोली को परिष्कृत, परिमार्जित और अपनी काव्य कृतियों से पुरस्कृत करने वाले इस महाकवि की प्रारम्भिक काव्य कृतियाँ हैं “प्रेम पथिक”, “करूणालय", "कानन-कुसुम” तथा “महाराणा का महत्व । सन् 1918 ई. में "झरना" लिखी और कवि प्रसाद छायावाद के प्रवर्तन की ओर अग्रसर होने लगे। इसके बाद सन् 1925 ई. में "आंसू”, सन् 1933 ई. में “लहर तथा सन् 1935 ई. में “कामायनी' का सृजन हुआ और प्रसाद काव्य-साधना के उच्चतम शिखर पर पहुंच गए। आधुनिक कविता के इतिहास में एक तरफ प्रेम, सौन्दर्य तथा आनन्द और दूसरी तरफ भाव, विचार तथा आनन्द का अद्भूत सामंजस्य देने वाला यह कवि मानव-मूल्यों के बहुत व्यापक फलक का कवि है। केवल 48 वर्ष की अवस्था में यक्षमा से पीड़ित इस महाकवि का 15 नवम्बर सन् 1937 को स्वर्गवास हो गया। किन्तु महाकवि जयशंकर प्रसाद सभी काव्य प्रेमियों और रसिकों को काव्य का ऐसा अद्भूत और अनुपम आस्वाद प्रदान कर गए, जो सदैव ही अतुलनीय तथा अमर बना रहेगा।
 सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला
छायावाद के प्रवर्तक कवि प्रसाद के बाद महत्वपूर्ण स्थान रखने वाले कवि हैं महाप्राण “निराला”। अपने प्रचण्ड विद्रोह, उदग्र सौन्दर्य तथा उदात्त एवं आदर्श-जीवन दर्शन के इस कवि को हिंदी काव्य का शलाका पुरुष कहा जाता है। सन् 1896 ई. में बंगाल के मेदिनीपुर महिषादल में जन्में इस महाकवि के जीने का अंदाज़ भी उपमान की तरह “निराला” ही था। जीवन की विषम परिस्थितियों से जूझते और संघर्ष करते हुए भी साहित्य की महान् सेवा करने वाले इस आधार स्तम्भ ने “परिमल", "अनामिका", "तुलसीदास", "गीतगुन्ज", "कुकुरमुत्ता", "गीतिका", "अणिमा", "बेला", "नये पत्ते", "सांध्य-काकली", "अर्चना" तथा "आराधना" जैसी महानतम कृतियाँ प्रदान की। छायावादी काव्य को अनुपम तथा नवीनतम गति देने वाले इस विद्रोही कवि ने भाव, भाषा और छंद आदि क्षेत्रों में युगान्तकारी परिवर्तन उपस्थित कर डाला । वेदान्त दर्शन के गहन अध्येता महाकवि निराला ने भी प्रसाद की तरह ही अपनी प्रतिभा के बल पर दर्शन और काव्य में अद्भुत समन्वय स्थापित किया। छायावाद ही नहीं हिंदी साहित्य के इतिहास में महाप्राण निराला को उनकी भाषा तथा मुक्त-छंद के संदर्भ में युगों-युगों तक याद किया जाता रहेगा। काव्य के अतिरिक्त कहानी, उपन्यास, निबन्ध तथा पत्रकारिता के क्षेत्र में भी निराला जी की विशिष्ट रुचि एवं देन रही। अक्तूबर, 1961 में भौतिक अस्तित्व को तज देने वाले इस चिरन्तन "कवि-व्यक्तित्व" के अमर-प्रतीक पर सभी साहित्य- प्रेमियों को गर्व है।
सुमित्रानन्दन पन्त
छायावाद के चार आधार स्तम्भों में सुमित्रानन्दन पन्त तीसरे प्रमुख स्तंभ हैं जिनका नाम सदैव अमर रहेगा। व्यक्तित्व के अनुरूप ही काव्य को कोमलता, सरसता और सुन्दरता प्रदान करने वाले इस प्रकृति-पुत्र का जन्म 20 मई, सन् 1900 ई. में “कोसानी" में हुआ था। अनन्य प्रकृति प्रेमी तथा विदग्ध-विचारक कवि पन्त ने बाल्यावस्था से ही काव्य-सृजन प्रारम्भ कर दिया था। कवि रूप में स्थापित इस महान व्यक्तित्व ने काव्य से इतर नाटक, कहानी, उपन्यास, निबन्ध संस्मरण तथा समीक्षा के क्षेत्र में भी अपनी प्रतिभा का परिचय दिया, किन्तु मूलतः वे कवि ही थे और अपनी विशिष्ट पहचान भी इसी क्षेत्र में बना सके। समय-समय पर गांधी, मार्क्स तथा अरविन्द आदि से प्रभावित और प्रेरित होने वाले इस प्रकृति-प्रेमी कवि की आरम्भिक रचनाएँ “वीणा” में संकलित हैं। इसके अतिरिक्त अन्य काव्य कृतियों में
 “ग्रन्थि", “पल्लव", "गुंजन", “युगान्त”, “ज्योत्सना", "अंतिमा","ग्राम्या”,“युगवाणी”,“युगान्तर","स्वर्ण-किरण”, “स्वर्ण-धूलि", "उत्तरा","रजत-शिखर", "शिल्पी", "लोकायतन", "कला और बूढ़ा चाँद", "किरण", "पौ घटने से पहले", "गीतहंस”, “समाधिता", "आस्था” तथा “सत्यकाम” आदि चिरस्मरणीय हैं। प्रकृति चित्रण का हृदयग्राही चित्रण और उसमें भी कोमल पक्ष विशेष रूप से कवि की रूचि का वैशिष्ट्य है। परिमार्जित, सरस एवं मधुर भाषा से समृद्ध कविता-कामिनी का यह सृजक कवि 31 दिसम्बर, सन् 1977 ई. को दिवंगत हो गया, किन्तु उनका साहित्य सदैव ही अमर रहेगा।
महादेवी वर्मा
छायावादी काव्य को संवारने-निखारने वाली गीति-लेखिका महादेवी वर्मा का नाम छायावाद के कवियों में अत्यन्त आदर से लिया जाता है। रहस्य, वेदना और गीतात्मकता की अमर-सृजक महादेवी का जन्म सन् 1907 ई. में फरूखाबाद में हुआ था। विधिवत् शिक्षा प्राप्त कर आजीवन प्रयाग-महिला विद्यापीठ की सेवा करने वाली महादेवी हृदय की अनुभूतियों और सूक्ष्मतम भावनाओं को सफलतम अभिव्यक्ति देती हैं और यह उनके कृतित्य का बेजोड़ पक्ष है। काव्य ही नहीं, रेखाचित्र, संस्मरण, निबन्ध तथा पत्रकारिता के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान देने वाले महादेवी वर्मा के बहुमुखी प्रतिभा-सम्पन्न व्यक्तित्व ने “वेदना" के मर्म से जो तादाकार किया और कराया है वह निश्चित ही उनका अपना वैशिष्ट्य है। सन् 1930 ई. में उन्होंने "नीहार' नामक काव्य संकलन प्रदान किया और उनकी प्रतिभा की धूम पूरे भारत में मच गई। इसके बाद लगातार सन् 1934 ई. में "नीरजा, सन् 1936 में “सांध्यगीत तथा सन् 1940 ई. में “दीपशिखा” जैसी कृतियों में गीतों के माध्यम से आध्यात्मिक-वेदना और रहस्या-चेतना को मुखर बना दिया। दुखानुभूति को लेकर अज्ञात सत्ता की ओर उन्मुख होने वाली वेदना की महागायिका महादेवी वर्मा ने 11 सिंतबर, सन् 1987 को निर्वाण प्राप्त किया। भाव और कला की यह सबल और समृद्ध "प्रतिभा' भारतीय साहित्य-जगत के लिए चिरस्मरणीय है।

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