छायावाद के प्रमुख कवि
आर.पी. मिश्रा
"छायावाद" अपने आप में कविता का एक ऐसा युग है जिसका सम्बन्ध भाव-जगत से है, हृदय की भूमि से है। भावलोक की तो सत्ता ही अनुभव विषय है, हृदय से जानने, समझने और महसूस करने की वस्तु है। उसी छायावाद में समय-समय पर अनेक रचनाकारों और कवियों का समावेश होता रहा। कभी वहाँ "बृहतत्रयी' के रूप में “प्रसाद", “निराला” और “पन्त” की चर्चा की जाती रही तो कभी बृहच्चतुष्ट्य के रूप में इन तीनों कवियों के साथ “महादेवी" का नाम जोड़कर देखा जाता रहा। कुल मिलाकर छायावाद प्रमुख कवियों या आधार-स्तम्भों में इन चारों महाकवियों की चर्चा, किसी न किसी रूप में चलती ही रही। यह अलग बात है कि इन चार कवियों के साथ-साथ छायावाद के अन्य कवियों में, उत्तरछायावादी कवि या गौण छायावाद कवि कहकर माखनलाल चतुर्वेदी, डॉ. रामकुमार वर्मा, जानकीबल्लभ शास्त्री, हरिकृष्ण प्रेमी, जनार्दन झा “द्विज", लक्ष्मी नारायण मिश्र, इलाचन्द्र जोशी, डॉ. नगेन्द्र, चन्द्र प्रकाश सिंह, विद्यावती कोकिल, तारा पाण्डेय, मुकुटधर पाण्डेय, उदय शंकर भट्ट तथा नरेन्द्र शर्मा आदि कवियों को भी इसमें समाविष्ट किया जाता रहा। छायावाद के चार प्रमुख कवियों से इतर इन सभी कवियों के काव्य और उनकी प्रवृत्तियों को लेकर विवाद भी चलते रहे परन्तु इन्हें छायावाद के प्रमुख कवियों में सर्वमान्यता से शामिल नहीं किया जा सका। तो आईये चारों प्रमुख कवियों के संदर्भ में चर्चा करतें है।
प्रवर्तक कवि जयशंकर प्रसाद
छायावाद के अग्रदूत या प्रवर्तक के रूप में हमारे सामने केवल जयशंकर प्रसाद का ही नाम उभर कर आता है। केवल भाषा या विषय-वस्तु ही नहीं, प्रसाद ने जीवन दृष्टि भी नवीन बना डाली। 20वीं शताब्दी को अपने व्यक्तित्व और कृतित्व से सर्वाधिक प्रभावित और प्रेरित करने वाले इस “बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न” कलाकार ने कविता के साथ-साथ नाटक, उपन्यास, कहानी, निबन्ध तथा समीक्षा आदि विभिन्न गद्य-पद्य विधाओं में अपनी ऐतिहासिक तथा महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। सन् 1889 ई. में वाराणसी के एक प्रतिष्ठित परिवार में जन्मे “प्रसाद" का जीवन परिस्थितियों से संघर्ष करते हुए प्रारम्भ हुआ। घर में ही शिक्षार्जन तथा पारिवारिक व्यवसाय का दायित्व निभाते हुए भी सरस्वती के इस लाडले पुत्र ने अपनी अप्रतिम प्रतिभा का परिचय दिया और कई काव्य-कृतियों की रचना कर डाली। प्रारम्भ में “कलाधर के नाम से कतिपय ब्रजभाषा-छन्द भी प्रसाद ने लिखे जो आगे चलकर "चित्राधार' में संकलित किए गए। खड़ी बोली को परिष्कृत, परिमार्जित और अपनी काव्य कृतियों से पुरस्कृत करने वाले इस महाकवि की प्रारम्भिक काव्य कृतियाँ हैं “प्रेम पथिक”, “करूणालय", "कानन-कुसुम” तथा “महाराणा का महत्व । सन् 1918 ई. में "झरना" लिखी और कवि प्रसाद छायावाद के प्रवर्तन की ओर अग्रसर होने लगे। इसके बाद सन् 1925 ई. में "आंसू”, सन् 1933 ई. में “लहर तथा सन् 1935 ई. में “कामायनी' का सृजन हुआ और प्रसाद काव्य-साधना के उच्चतम शिखर पर पहुंच गए। आधुनिक कविता के इतिहास में एक तरफ प्रेम, सौन्दर्य तथा आनन्द और दूसरी तरफ भाव, विचार तथा आनन्द का अद्भूत सामंजस्य देने वाला यह कवि मानव-मूल्यों के बहुत व्यापक फलक का कवि है। केवल 48 वर्ष की अवस्था में यक्षमा से पीड़ित इस महाकवि का 15 नवम्बर सन् 1937 को स्वर्गवास हो गया। किन्तु महाकवि जयशंकर प्रसाद सभी काव्य प्रेमियों और रसिकों को काव्य का ऐसा अद्भूत और अनुपम आस्वाद प्रदान कर गए, जो सदैव ही अतुलनीय तथा अमर बना रहेगा।
सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला
छायावाद के प्रवर्तक कवि प्रसाद के बाद महत्वपूर्ण स्थान रखने वाले कवि हैं महाप्राण “निराला”। अपने प्रचण्ड विद्रोह, उदग्र सौन्दर्य तथा उदात्त एवं आदर्श-जीवन दर्शन के इस कवि को हिंदी काव्य का शलाका पुरुष कहा जाता है। सन् 1896 ई. में बंगाल के मेदिनीपुर महिषादल में जन्में इस महाकवि के जीने का अंदाज़ भी उपमान की तरह “निराला” ही था। जीवन की विषम परिस्थितियों से जूझते और संघर्ष करते हुए भी साहित्य की महान् सेवा करने वाले इस आधार स्तम्भ ने “परिमल", "अनामिका", "तुलसीदास", "गीतगुन्ज", "कुकुरमुत्ता", "गीतिका", "अणिमा", "बेला", "नये पत्ते", "सांध्य-काकली", "अर्चना" तथा "आराधना" जैसी महानतम कृतियाँ प्रदान की। छायावादी काव्य को अनुपम तथा नवीनतम गति देने वाले इस विद्रोही कवि ने भाव, भाषा और छंद आदि क्षेत्रों में युगान्तकारी परिवर्तन उपस्थित कर डाला । वेदान्त दर्शन के गहन अध्येता महाकवि निराला ने भी प्रसाद की तरह ही अपनी प्रतिभा के बल पर दर्शन और काव्य में अद्भुत समन्वय स्थापित किया। छायावाद ही नहीं हिंदी साहित्य के इतिहास में महाप्राण निराला को उनकी भाषा तथा मुक्त-छंद के संदर्भ में युगों-युगों तक याद किया जाता रहेगा। काव्य के अतिरिक्त कहानी, उपन्यास, निबन्ध तथा पत्रकारिता के क्षेत्र में भी निराला जी की विशिष्ट रुचि एवं देन रही। अक्तूबर, 1961 में भौतिक अस्तित्व को तज देने वाले इस चिरन्तन "कवि-व्यक्तित्व" के अमर-प्रतीक पर सभी साहित्य- प्रेमियों को गर्व है।
सुमित्रानन्दन पन्त
छायावाद के चार आधार स्तम्भों में सुमित्रानन्दन पन्त तीसरे प्रमुख स्तंभ हैं जिनका नाम सदैव अमर रहेगा। व्यक्तित्व के अनुरूप ही काव्य को कोमलता, सरसता और सुन्दरता प्रदान करने वाले इस प्रकृति-पुत्र का जन्म 20 मई, सन् 1900 ई. में “कोसानी" में हुआ था। अनन्य प्रकृति प्रेमी तथा विदग्ध-विचारक कवि पन्त ने बाल्यावस्था से ही काव्य-सृजन प्रारम्भ कर दिया था। कवि रूप में स्थापित इस महान व्यक्तित्व ने काव्य से इतर नाटक, कहानी, उपन्यास, निबन्ध संस्मरण तथा समीक्षा के क्षेत्र में भी अपनी प्रतिभा का परिचय दिया, किन्तु मूलतः वे कवि ही थे और अपनी विशिष्ट पहचान भी इसी क्षेत्र में बना सके। समय-समय पर गांधी, मार्क्स तथा अरविन्द आदि से प्रभावित और प्रेरित होने वाले इस प्रकृति-प्रेमी कवि की आरम्भिक रचनाएँ “वीणा” में संकलित हैं। इसके अतिरिक्त अन्य काव्य कृतियों में
“ग्रन्थि", “पल्लव", "गुंजन", “युगान्त”, “ज्योत्सना", "अंतिमा","ग्राम्या”,“युगवाणी”,“युगान्तर","स्वर्ण-किरण”, “स्वर्ण-धूलि", "उत्तरा","रजत-शिखर", "शिल्पी", "लोकायतन", "कला और बूढ़ा चाँद", "किरण", "पौ घटने से पहले", "गीतहंस”, “समाधिता", "आस्था” तथा “सत्यकाम” आदि चिरस्मरणीय हैं। प्रकृति चित्रण का हृदयग्राही चित्रण और उसमें भी कोमल पक्ष विशेष रूप से कवि की रूचि का वैशिष्ट्य है। परिमार्जित, सरस एवं मधुर भाषा से समृद्ध कविता-कामिनी का यह सृजक कवि 31 दिसम्बर, सन् 1977 ई. को दिवंगत हो गया, किन्तु उनका साहित्य सदैव ही अमर रहेगा।
महादेवी वर्मा
छायावादी काव्य को संवारने-निखारने वाली गीति-लेखिका महादेवी वर्मा का नाम छायावाद के कवियों में अत्यन्त आदर से लिया जाता है। रहस्य, वेदना और गीतात्मकता की अमर-सृजक महादेवी का जन्म सन् 1907 ई. में फरूखाबाद में हुआ था। विधिवत् शिक्षा प्राप्त कर आजीवन प्रयाग-महिला विद्यापीठ की सेवा करने वाली महादेवी हृदय की अनुभूतियों और सूक्ष्मतम भावनाओं को सफलतम अभिव्यक्ति देती हैं और यह उनके कृतित्य का बेजोड़ पक्ष है। काव्य ही नहीं, रेखाचित्र, संस्मरण, निबन्ध तथा पत्रकारिता के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान देने वाले महादेवी वर्मा के बहुमुखी प्रतिभा-सम्पन्न व्यक्तित्व ने “वेदना" के मर्म से जो तादाकार किया और कराया है वह निश्चित ही उनका अपना वैशिष्ट्य है। सन् 1930 ई. में उन्होंने "नीहार' नामक काव्य संकलन प्रदान किया और उनकी प्रतिभा की धूम पूरे भारत में मच गई। इसके बाद लगातार सन् 1934 ई. में "नीरजा, सन् 1936 में “सांध्यगीत तथा सन् 1940 ई. में “दीपशिखा” जैसी कृतियों में गीतों के माध्यम से आध्यात्मिक-वेदना और रहस्या-चेतना को मुखर बना दिया। दुखानुभूति को लेकर अज्ञात सत्ता की ओर उन्मुख होने वाली वेदना की महागायिका महादेवी वर्मा ने 11 सिंतबर, सन् 1987 को निर्वाण प्राप्त किया। भाव और कला की यह सबल और समृद्ध "प्रतिभा' भारतीय साहित्य-जगत के लिए चिरस्मरणीय है।
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