'तमस' भीष्म साहनी: संक्षिप्त परिचय
'तमस' भीष्म साहनी का सबसे प्रसिद्ध उपन्यास है। इसका प्रकाशन 1973 में हुआ था। तमस को 1975 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया था। इस पर 1986 में गोविंद निहलानी ने दूरदर्शन पर धारावाहिक व एक फ़िल्म भी बनाई थी।
तमस का सामाजिक अर्थ अंधकार, अज्ञान, होता है। 'तमस' की कथा परिधि में अप्रैल 1947 के समय में पंजाब के जिले को परिवेश के रूप में लिखा गया है। 'तमस' कुल पांच दिनों की कहानी को लेकर बुना गया उपन्यास है। परंतु कथा में जो प्रसंग-संदर्भ उभरे हैं। उसमें यह पांच दिनों की कथा न होकर। बीसवीं सदी के हिन्दुस्तान के अब तक के 100 वर्षों की कथा हो जाती है।
संपूर्ण कथावस्तु दो खंडों में विभक्त है। पहले खंड में कुल 13 प्रकरण है। दूसरा खंड गाँव पर केंद्रित है। भाषा हिंदी, उर्दू, अंग्रेजी के मिश्रित रूप वाली है। कथ्य के अनुरूप वर्णनात्मक, मनोविश्लेषणात्मक व विश्लेषणात्मक शैली का प्रयोग किया गया है।
भीष्म साहनी ने 'तमस' में सांप्रदायिकता की समस्या को उठाया है। भारत की आजादी के ठीक पहले सांप्रदायिकता की बैसाखियाँ लगाकर पाशविकता का जो नंगा नाच इस देश में नाचा गया उसका अंतरंग चित्रण भीष्म साहनी ने इस उपन्यास में किया है। आजादी से पहले विदेशी शासकों ने यहाँ की जमीन पर अपने पाँव मजबूत करने के लिए इस समस्या को हथकंडा बनाया था और आजादी के बाद हमारे देश के कुछ राजनीतिक दल इसका घृणित उपयोग कर रहे हैं। और इस सारी प्रक्रिया में जो तबाही हुई है उसका शिकार बनते रहे हैं वे निर्दोष और गरीब लोग जो न हिन्दू हैं, न मुसलमान बल्कि सिर्फ इन्सान हैं और हैं भारतीय नागरिक।
सांप्रदायिकता एक सामाजिक व्यवस्था के तहत रची गई मानसिकता से उत्पन्न होती है। उपन्यासकार के अनुसार शहर में सब काम बटे हुए थे। कपड़े व अनाज का काम हिंदूओं के पास था, जबकि जूतों, मोटरों लारियों का काम मुसलमानों के हाथों में था।
कथासार / कथावस्तु
उपन्यास का आरंभ नत्थू के साथ होता है। मुरादअली ने नत्थू को सलोत्तरी साहब को डाक्टरी के लिए एक सुअर मारकर उपलब्ध कराने के लिए कहा है और इसके लिए नथू को पांच रुपये का नोट परश्रीमक के रूप में दिया जाता है। नत्थू जब सूअर मारकर घर लौट रहा था तब सांप्रदायिकता की आग सर्वत्र भड़की हुई थी। सांप्रदायिकता की इस आग को बुझाने का दायित्व वहाँ के डिप्टी कमिश्नर रिचर्ड पर था। उसकी अपनी पत्नी से हमेशा कटुता बनी रहती थी।
उधर कांग्रेसियों से प्रभात-फेरी के साथ-साथ गली मोहल्ले की सफाई शुरू कर दी। इनमें बख्शीजी मेहता जी, कश्मीरीलाल व शंकर आदि थे। तभी मालूम हुआ की मस्जिद की सीढ़ियों पर कोई आदमी सूअर मार कर फेंक गया है। धर्मार्थ मुसलमान बदला लेने पर उत्सुक थे।
हिन्दू और मुसलमान दोनों एक दूसरे के शत्रु हो चुके थे। अंततः कुछ प्रतिष्ठित लोग डिप्टी कमिश्नर से मिलने के लिए रवाना हो गए। नगर के हिंदु युवकों को सैनिक प्रशिक्षण देने का काम मास्टर देवव्रत की देख-रेख में चल रहा था। प्रधान जी लाला लक्ष्मीनारायण इसमें आर्थिक सहयोग दे रहे थे।
युवकों ने मास्टर जी के मार्गदर्शन में अच्छा खासा शस्त्रागार जुटा लिया था। किसी प्रकार उन्हें कड़वा तेल तो मिल गया या परंतु ऐसी कड़ाही नहीं मिल पाई थी जिसमें पूरा एक कनस्तर तेल उबाला जा सके।
कुछ समय के लिए नगर की स्थिति में कुछ सुधार हो गया था। नगर के शिवालय के बाज़ार में पुनः चहल पहल दिखने लगी थी। कुबड़े हलवाई के यहाँ भी भीड़ जुट गई थी।
नगर में सर्वत्र अशांति फैली हुई थी। भोले-भाले नागरिक अत्यंत भय से त्रस्त थे। सभी अपनी-अपनी सुरक्षा के लिए चिंतित थे। अबकी बार सांप्रदायिकता की आग की लपटें बहुत ऊँची उठ रही थी।
नत्थू अलग परेशान था। उसके मन में तरह-तरह की शंकाएँ उत्पन्न हो रही थी। कोई भी उसके घर आता तो उसका मन किसी अनिष्ट से काँप उठता। उसने सुअर मारने का रहस्य किसी से नहीं खोला था।
गुरुद्वारे में सिक्खों का जमघट लगा हुआ था। गुरुद्वारे में जहाँ गुरु ग्रंथ साहब का पाठ हो रहा था वहीं शत्रुओं से निपटने के लिए असलहा भी इकट्ठा किया जा रहा था छत पर दो विहंग भाले लिए हुए पहरा दे रहे थे।
सिखों और मुसलमानों में दो दिन तक युद्ध चलता रहा। गुरुद्वारे में अनेक लाशें बिछ गई। कस्बे में भी इधर उधर बहुत लाशें बिखरी हुई पड़ी थी, जो कि साम्प्रदायिकता के नाम पर मनुष्य के द्वारा मनुष्य पर किए गए अत्याचारों की क्रूर कथा कह रही थी। स्वार्थी लोग इस दंगे-फसाद में भी स्वार्थ साधन में लगे हुए थे। अमन कमेटी की बैठकों में जहाँ शरणार्थियों को राहत पहुँचाने की उपायों पर विचार होता था, वहीं मकानों जमीनों के सौदा भी तय होते थे।
अनेक बुद्धिमान लोग इस सत्य को पहचान गए थे कि साम्प्रदायिक दंगों के पीछे न तो हिंदू थे न मुसलमान, बल्कि अंग्रेज शासकों की शरारत थी। अंग्रेज शासक हिंदु और मुसलमानों की एकता में दरार डालकर दोनों को परस्पर भिड़वान चाहते थे।
तमस की तात्विक समीक्षा
(i) कथानक के आधार पर
'तमस' उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषता है कि यह घटना प्रधान है और इसमें स्पष्टतः किसी व्यक्ति को मुख्य पात्र नहीं कहा जा सकता। इसमें सभी पात्र सांप्रदायिक तनाव से किसी न किसी रूप जुड़े हुए हैं।
तनाव का सूत्रपात करने वाला नत्थू मुख्यतः इस कथा में जुड़ा हुआ है। सुअर व गाय को मरा देखकर हिंदु मुस्लिम दंगे नूरपुर तहसील में प्रारंभ हो जाते हैं। नगर के कांग्रेस कार्यकर्ता जो अब तक तमीरी का काम कर रहे थे, दंगा रुकवाने का प्रयास करते हैं। नत्थू सांप्रदायिक तनाव देखकर घोर प्रायश्चित में डूब जाता है और अंततः उसका पश्चताप ही उसकी मृत्यु का कारण बनता है। ग्राम ढोक इलाही बख्श में मुसलमान आबादी के मध्य एक मात्र घर सरदार हरनाम सिंह का था। उसे घर छोड़कर भागना पड़ा और किसी प्रकार बचते-बचाते वह अपनी बूढ़ी पत्नी के साथ नगर के शरणार्थी शिविर तक पहुँचता है। उसका घर लूट लिया जाता है और मकान को आग लगा दी जाती है। उस का लड़का इकबाल सिंह विवशतः मुसलमान बन जाता है। दूसरे गाँव सैयदपुर में तो सिक्खों व मुसलमान में इतना भीषण संघर्ष होता है कि असंख्य व्यक्ति मारे जाते है और 27 महिलाएं बच्चों सहित कुएँ में डुबकर जान दे देती है। चार दिन तक पूरे जिले में मारकाट मची रहती है। तब जाकर डिप्टी कमिश्नर रिचर्ड कर्फ्यू लगाकर और अन्य तरीकों से दंगा-फसाद रुकवाता है स्पष्टतया यही मूल कथा भाग है और इसका किसी व्यक्ति विशेष से कोई महत्त्वपूर्ण सबंध नहीं है। 'तमस' में घटनाएँ जुड़ती चली जाती है।
(ii)पात्र योजना एवं चरित्र चित्रण के आधार पर
'तमस' में पात्र योजना व चरित्र चित्रण अपने ढंग का है व बड़ा ही महत्त्वपूर्ण है। यह एक बृहदाकार उपन्यास है इसलिए जिस प्रकार कथा प्रसंगों की विविधता है उसी प्रकार पात्र योजना में भी विविधता है।
पात्रों का वर्गीकरण
i) मुख्य और गौण पात्र
ii) पुरुष और नारी पात्र
मुख्य और गौण पात्र
पुरुष पात्रों में मुख्य पात्र नत्थू, रिचर्ड हयातबख्श, बख्शी, जरनैल, लक्ष्मीनारायण व रणवीर है।
पुरुष और नारी पात्र
पुरुष पात्र
नत्थू-उपन्यास का नायक निर्धन व मेहनतकश चर्मकार हीन भावनाओं का शिकार, पत्नी प्रेमी धर्मभीरु।
मुरादअली-सांप्रदायिक तनाव बढ़ाने वाला, स्वार्थी व कुटिल चरित्र संपन्न व्यक्ति।
रिचर्ड-अंग्रेजी शासन का नुमाइंदा, इतिहास का अध्येता किंतु चुस्त स्वार्थी और आंग्ल नीतियों का पोषक, प्रशासक पत्नी प्रेमी किंतु प्रेस के प्रति रूखा व्यक्ति, व्यवहार-कुशल।
लाला लक्ष्मीनारायण-हिंदू महासभा का कार्यकर्ता, सांप्रदायिक भावनाओं से युक्त स्वार्थी एवं कुटिल व्यक्ति।
रणवीर-लक्ष्मीनारायण का पुत्र सांप्रदायिक तनाव बढ़ाने वाले युवक संघ का प्रमुख कार्यकर्ता, मन से कोमल, सच्चरित्र किंतु दृढव्रती परिस्थितिवश हिंसा पर उतारू।
हरनाम सिंह-ग्रामीण सिक्ख, उदार सच्चरित्र किंतु परिस्थितियों व सांप्रदायिकता का शिकार।
हयातबख्श-सांप्रदायिक व्यक्ति और मुस्लिमलीग का कार्यकर्ता, पाकिस्तान का पक्षधर।
शाहनवाज-सच्चा मित्र उदारमना किंतु धार्मिक रूप से मुस्लिम सम्प्रदाय के प्रति सहानुभूतिशील।
देवदत-सच्चा साम्यवादी सभी सम्प्रदायों में सौहार्द बनाने को प्रयत्नशील और निःस्वार्थ व्यक्ति।
रघुनाथ-हिंदु मुस्लिम संप्रदायों में एकता पक्षधर शाहनवाज का मित्र किंतु साम्प्रदायिकता का शिकार, एक अध्ययनशील बुद्धिजीवी।
जरनैल-बाह्य रूप से सनकी कांग्रेसी किंतु सच्ची यथार्थ बात कहने वाला।
मेहता-भ्रष्ट और स्वार्थी कांग्रेसी कार्यकर्ता ।
बख्शी-राजनीति को अपने व्यक्तित्व को संवारने में अपनाने वाला स्वार्थी और महत्त्वाकांक्षी कांग्रेसी कार्यकर्ता, सांप्रदायिक सौहार्द भाव का पोषक व एकता का पक्षधर।
शंकरलाल-युवा कांग्रेसी, बेलाग बात कहने वाला मुँहफट कार्यकर्ता।
किशन सिंह-सिक्ख सम्प्रदायवादियों का नेता, उतेजक व हिंसा में विश्वास रखने वाला व्यक्ति।
अन्य पत्रों व नाम:
फजलदीन, नानबाई, रोशनलाल, कश्मीरीलाल, अजीज, मास्टर रामदास, पुण्यात्मका, वानप्रस्थी, देवव्रत, बोधराज, धर्मदेव, हरबर्ट मौलादाद, मीरदाद, हकीम अब्दुलगनी, सरदार बिशनासिंह, खुदा बख्श, करीमखान, एहशान अली, रमजान, इकबाल सिंह।
स्त्रीपात्र
लीजा-अंग्रेजी अधिकारी, रिचर्ड की पत्नी हीन भावनाओं व अकेलेपन की शिकार तरुणी।
नत्थू की पत्नी-पति को अत्यंत करने वाली सुशीला नारी, उदार व कर्तव्य-परायण।
बंतो-सरदार हरनाम सिंह की पत्नी, सांप्रदायिक तनाव की शिकार ग्रामीण महिला।
जसबीर कौर-हरनाम सिंह की अभागिन पुत्री, साम्प्रदायिक दंगे की शिकार।
लक्ष्मीनारयण की पत्नी-पतिपरायणा पुत्र स्नेह व धर्म भीरु महिला, सांप्रदायिक दंगे भयग्रस्त, उदारमना व ममतामयी नारी।
रघुनाथ की पत्नी-उदार हृदया पतिपरायणा व सीधी सादी नारी।
अकरा-रमजान की बहू, सांप्रदायिक भावना से ग्रस्त तरुणी।
रजो-अंकरा की सास व रमजान की माँ उदार हृदया दयाशील मुस्लिम नारी।
उपन्यास की वर्तमान प्रासंगिकता उपन्यास की वर्तमान प्रासंगिकता यह है कि वह आजादी के पूर्व अंग्रेज हाकिमों की फूट पैदा करने वाली और इस आधार पर शांति व्यवस्था के नाम पर अपने अस्तित्व को महसूस कराने वाली नीति सम्बन्धी दोगली चालों की ओर संकेत करता हुआ साम्राज्यवादी ताकतों की मौजूदा भूमिका पर प्रश्न चिन्ह लगाता है। अंग्रेज हाकिम आज नहीं हैं तो क्या, साम्राज्यवादी ताकतें और उनके अभिकर्ता तो हैं। अंग्रेज हाकिम और उसके मुरादअली जैसे पिट्ठू की भूमिका के निर्वाह का दायित्व अब साम्राज्यवादी प्रतिगामी तत्वों ने अपने कन्धों पर ले लिया है। देश के भीतर और बाहर उनके हिमायतियों की कमी नहीं है।
दूरदर्शन धारावाहिक तमस में दिए गए वक्तव्य में भीष्म जी ने कहा है कि "स्वतंत्रता के इतने साल बाद भी हम अपने समाज में से साम्प्रदायिक तत्वों को खतम नहीं कर पाए हैं। आज भी धार्मिक और जातीय दुर्भावना फैलाने वाले तत्व हमारे बीच सक्रिय हैं। 'तमस’ का मकसद है -इन संकीर्ण साम्प्रदायिक तत्वों को समझना, इनकी साजिश को समझना. इन्हें बेनकाब करना। विभाजन जैसी त्रासद ऐतिहासिक घटना को भीष्म जी ने नजदीक से देखा ही नहीं, भोगा भी है। इसलिए जिस परिवेश का ओर जिन स्थितियों का चित्रण किया है उनका निजी और निकट का परिचय है। इस कारण इस उपन्यास में एक आत्मीय और विश्वसनीयता भी मिलती है। लेखक के वर्णन इतने जीवंत हैं कि स्थितियां सजीव हो जाती हैं चाहे वह प्राकृतिक परिवेश का वर्णन हो या व्यक्ति की भीतरी हलचलों का । परिवेश की दृष्टि से 'तमस' एक प्रभावोत्पादक कृति बन पड़ी है।
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