Followers

Saturday, November 27, 2021

मैथिलीशरण गुप्त:प्रबंधकाव्य

 द्विवेदीजी की कविताओं का संग्रह 'काव्यमंजूषा' नाम की पुस्तक में हुआ है। उनकी कविताओं के दूसरे संग्रह का नाम 'सुमन' है।



द्विवेदीजी के प्रभाव और प्रोत्साहन से हिन्दी के कई अच्छे अच्छे कवि निकले जिनमें बाबू मैथिलीशरण गुप्त, पं. रामचरित उपाधयाय और पं. लोचनप्रसाद पांडेय मुख्य हैं।

बाबू मैथिलीशरण गुप्त संवत् 1966 में उनका 'रंग में भंग' नामक एक छोटा सा प्रबंधकाव्य प्रकाशित हुआ जिसकी रचना चित्तौड़ और बूँदी के राजघरानों से संबंध रखनेवाली राजपूती आन की एक कथा को लेकर हुई थी। तब से गुप्तजी का ध्यान प्रबंधकाव्यों की ओर बराबर रहा और वे बीच बीच में छोटे या बड़े प्रबंधकाव्य लिखते रहे। गुप्तजी की ओर पहले पहल हिन्दी प्रेमियों का सबसेअधिक ध्यान खींचनेवाली उनकी 'भारत भारती' निकली। इसमें 'मुसद्दस हाली' के ढंग पर भारतीयों की या हिंदुओं की भूत और वर्तमान दशाओं की विषमता दिखाई गई है; भविष्यनिरूपण का प्रयत्न नहीं है।

मार्मिक तथ्यों का समावेश बहुत साफ और सीधी सादी भाषा में होने से यह पुस्तक स्वदेश की ममता से पूर्ण नवयुवकों को बहुत प्रिय हुई।


इसी ढंग पर बहुत दिनों पीछे इन्होंने 'हिंदू' लिखा। 'केशों की कथा', 'स्वर्गसहोदर' इत्यादिबहुत सी फुटकल रचनाएँ इनकी 'सरस्वती' में निकली हैं, जो 'मंगल घट' में संगृहीतहैं।

छोटे बड़े प्रबंधकाव्य लिख  हैं जिनके नाम हैं :रंग में भंग, जयद्रथ वधा, विकट भट, प्लासी का युद्ध , गुरुकुल, किसान, पंचवटी, सिद्ध राज, साकेत, यशोधारा। अंतिम दो बड़े काव्य हैं। '

तृतीय उत्थान में 'छायावाद' के नाम से रहस्यात्मक कविताओं का कलरव सुन इन्होंने भी कुछ गीत रहस्यवादियों के स्वर में गाए जो 'झंकार' में संगृहीत हैं।

'साकेत' और 'यशोधारा' इनके दो बड़े प्रबंध हैं। दोनों में उनके काव्यत्व का तो पूरा विकास दिखाई पड़ता है, पर प्रबंधत्व की कमी है।

गुप्तजी ने 'अनघ', 'तिलोत्तामा', 'चंद्रहास' नामक तीन और छोटे छोटे पद्यबद्ध रूपक भी लिखे हैं।

गुप्तजी की प्रतिभा की सबसे बड़ी विशेषता है कालानुसरण की क्षमता अर्थात् उत्तरोत्तर बदलती हुई भावनाओं और काव्य प्रणालियों को ग्रहण करते चलने की शक्ति। इस दृष्टि से हिन्दीभाषी जनता के प्रतिनिधि कवि ये निस्संदेह कहे जा सकते हैं।

'भारतेंदु' के समय से स्वदेश प्रेम की भावना जिस रूप में चली आ रही थी उसका विकास 'भारतभारती' में मिलता है।

राजनीतिक आंदोलनों ने जो रूप धारण किया उसका पूरा आभास पिछली रचनाओं में मिलता है। सत्याग्रह,अहिंसा, मनुष्यत्ववाद, विश्वप्रेम, किसानों और श्रमजीवियों के प्रति प्रेम और सम्मान, सबकी झलक हम पाते हैं।

गुप्तजी की रचनाओं के भीतर तीन अवस्थाएँ लक्षित होती हैं। प्रथम अवस्था भाषा की सफाई की है।'भारतभारती' और 'वैतालिक' के बीच की रचनाएँ इस दूसरी अवस्था के उदाहरण में ली जा सकती हैं। उसके उपरांत 'छायावाद' कहीं जानेवाली कविताओं का चलन होता है और गुप्तजी का कुछ झुकाव प्रगीत मुक्तकों (लिरिक्स) और अभिव्यंजना के लाक्षणिक वैचित्रय की ओर भी हो जाता है। इस झुकाव का आभास 'साकेत' और 'यशोधारा' में भी पाया जाता है। यह तीसरी अवस्था है।

No comments:

Post a Comment

असम के जननायक ज़ुबीन गर्ग: एक कलाकार जो सिर्फ़ आवाज़ नहीं, असम की पहचान थे#

 #असम के जननायक ज़ुबीन गर्ग: एक कलाकार जो सिर्फ़ आवाज़ नहीं, असम की पहचान थे# असम के प्रिय गायक, संगीतकार और सामाजिक कार्यकर्ता ज़ुबीन गर्ग ...