ईश्वर
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बड़ा आसान है ईश्वर की
पूजा करना
बड़ा कठिन है उसके सामने
सच्चे मन से खड़ा होना
जो सच्चे नहीं, ईमानदार नहीं
निष्कलंक और निर्दोष नहीं
पता नहीं वो ईश्वर के दर
क्या मांगते हैं ?
और क्या मिलता है उन्हें
और क्या देते हैं वे
आनेवाली नस्ल को
बड़ा मुश्किल है खुद को
खुद के खिलाफ खड़ा करना
बनना निर्मम खुद के लिए खुद से
और तपना आग में उनके लिए
जो हमारे लिए सच बोलते
चलते रहे, हमारे साथ अदृश्य
हमें कुछ पता नहीं उनका
जो ईश्वर के दर नहीं गये कभी
पर ईश्वर के साथ बने रहे
सच बोलते रहे
मांगा कुछ नहीं
वक़्त नहीं मिला कुछ मांगने का
ज़रूरत भी नहीं महसूस की
उनका ईश्वर उनके साथ था
या था अनुपस्थित
कुछ सोचा नहीं इस पर भी
पर लगा मानो ईश्वर ने कहा
मैं तुम्हारे साथ ही चलता रहा हूं
था कुछ अदृश्य-सा
जैसे सच प्रकाश में भी अदृश्य
होता हमारे भीतर है
मेरी अंतरयात्रा सच से सच तक
उद्धार से संहार तक
चलते हुए उस विराट शून्य पर
समापन लेती है
जहां से बार-बार हम नया
बनते रहते हैं...
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अमरेंद्र मिश्र
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