शब्द-महिमा
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वे लोग पता नहीं कहां हैं जिन्होंने नये-नये शब्द गढ़े और उनका यह शाब्दिक अभियान आज भी जारी है।परंपरागत संज्ञा संबोधन अपने स्वरूप और अपनी गरिमा खोते जा रहे हैं जिससे आपसी रिश्तों की महत्ता उपहास का पात्र बनती जा रही है।कुछ बानगी देखिये और ऐसे और शब्दों की तलाश कीजिये।
आपके लिये ऐसे कुछ शब्द प्रस्तुत हैं-
(1) मां-ममी,मोम(2) पिता-पापा,पा,पोप,डैडी,डैड (बाबूजी आज़ कोई भी नहीं कहता) (3)चाचा-अंकल,चाचू,चा (4)जीजा-जीजू(5)दादाजी-दादू,ग्रैंडप्पा,(6) दीदी-दी (7) ओके-के,(8) बाबूजी-ज्यादातर बेचारगी के लिए प्रयुक्त होता है-सब्जी वाले, कबाड़ी, पॉकेट मार इसका प्रयोग ज़्यादातर करते हैं। इत्यादि।
आधुनिक हिंदी सिनेमा ने तो आदर सूचक शब्दों के साथ खूब ज्यादती की है-
(1) भाई-ज्यादातर गुंडे के लिये (2) गुरु-गुंडे के सरदार के लिये (3) उस्ताद-जो बदमाशियां सिखाये (4) बाप-अनादर का प्रतीक (5) बहन-गाली के लिये (तेरी बहन (भैन) लगती है क्या ? (6) अम्मा-हिकारत और गुस्से में प्रयोग-अब चुप हो जा मेरी अम्मा (मां)(7) डॉक्टर-डॉक
हिंदी का प्रशंसक शब्द तो अंग्रेजी के 'फैन' के आगे लापता ही हो गया है।
टेलिविजन सीरियल ने तो यहां तक कहना शुरू कर दिया कि -"रावण ने सीता का किडनैप किया था..,
ऐसे कितने ही उदाहरण होंगे जिनसे हमें रोज दो-चार होना पड़ता है।नये-नये शोधार्थी अगर इन पर काम करें तो आनेवाले लोग शब्द की इयत्ता और महत्ता को समझें और फिर जानें कि शब्द को हमारे यहां 'ब्रह्म' क्यों कहा गया !
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