रामनवमी
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इस पावन पर्व पर शुभकामनाएं भर देना पर्याप्त नहीं। उत्सव मनाना और मंदिरों का पर्यटन ही काफ़ी नहीं। यह सब तो पारंपरिक है। उपवास, पूजा-पाठ भी चित्त की शुद्धि के लिए जरूरी है। सब ठीक है। लेकिन इन सबसे ज़्यादा जरूरी है, राम के आदर्श और कर्तव्य को अपने जीवन में उतारने का प्रयास। यह जितना आध्यात्मिक होगा उतना ही कर्तव्य परायणता का उद्बोधक भी होगा। राम का पूरा जीवन कर्तव्य पालन का अनुपम उदाहरण है। वे हर जगह अपना वचन निभाते हैं। पिता की आज्ञा मान वन-गमन करते हैं और चौदह वर्ष तक ऋषि मुनी का जीवन व्यतीत करते हैं। उनका जीवन कर्तव्यनिष्ठा और कर्तव्य पालन का दृष्टांत बन जाता है जब वे न सिर्फ अपने माता-पिता वरन लोक कल्याण हेतु कठोर कर्तव्य का पालन करते हैं।
लोकहित में अपना कर्तव्य निभाना एक बहुत बड़े साहस और त्याग की मांग करता है। जहां कर्तव्य प्रधान होता है, वहां दुनिया की तमाम सुख संपदा छोटी और तुच्छ हो जाती है। कर्तव्य किसी प्रकार की माया - ममता या भावुकता से ऊपर होता है। यह एक जरूरी नैतिक अवधारणा है। यह किसी भी तरह के स्वार्थ या लेन-देन से परे होता है। इसीलिये यह एक हद तक कठोर भी होता है। भगवान् राम वैसा बन पाये तो मर्यादा पुरुषोत्तम बने।
और तुलसी 'रामायण' लिखने बैठे तो उन्हें पूरी की पूरी सृष्टि ही सियाराममय लगी। "सिया राममय सब जग जानी, करहुं प्रणाम जोर जुग पाणि। '' और वे स्वयं राममय बन गये। तुलसी की इस 'रामायण' में सबकुछ तो है! संयुक्त परिवार है, टूटता परिवार है, परस्पर प्रेम है, ईर्ष्या है, द्वेष है, युद्ध है, शांति है, राज्याभिषेक है, वन-गमन है, भ्राता प्रेम है, भक्त की भक्ति है, दुश्मनी है, दोस्ती है, षडयंत्र है, धोखा है,राजनीति है और है एक आदर्श और समष्टिगत चेतना।
राम अपने आदर्श में महान हैं और कर्तव्य में महानतम। वे पिता की आज्ञा से घर छोड़कर वन-गमन करते हैं और लौट कर फिर से राजकाज ठुकराते हैं। दोनों जगह कर्तव्य जीतता है। कर्तव्य पहले आता है, आदर्श उसके पीछे हो लेता है। और तब हमें लगता है, हमारे मर्यादा पुरुषोत्तम राम सचमुच कितने महान हैं और हम उनके आदर्शों को जरा-सा भी अपने जीवन में उतार लें तो कितने धन्य बन जायें !
आप सबको रामनवमी पर आत्मीय शुभकामनाएं और बधाई !
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