रहस्य
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यहां आते ही
अब तक
तय की गयी तमाम दूरियां
पैरों में सिमट आती हैं
तमाम गिले-शिकवे
विलीन होते हैं एक रहस्य में
उस रहस्य को न जाना मैंने
यह जरूर जाना
कि जब-जब यहां आया
मैं एक रहस्य में खो जाता हूं
वह क्या है मैं नहीं जानता !
नहीं जानता, मैं कैसे कहां पहुंचता हूं
नहीं जानता उस अदृश्य अनाम को
रहता जो साथ मेरे
दिखता नहीं दूर दिगंत तक
नहीं जानता कहां-कहां चलते
कहां पहुंचता हूं..
और यहां आते ही वहां होता हूं
जहां से अल्सुबह
रोज़ आती रहती हैं सदाएं
दुआओं में उठे हाथ
बंद आंखों में जो साक्षात दिखते हैं
की जा रही वो मौन प्रार्थनाएं
आती रहती मुझ तक
एक रहस्य को भेदते
भरती ऊर्जा मेरे तन-मन में
फिर से यात्राएं करते
फिर से थकते हुए आता जब
यहां तक !
फिर एक रहस्य होता है सामने
खुली आंखों से कुछ नहीं दिखता
बंद आंखों में दिखती हैं
आ रही अनगिनत सहस्त्र किरणें
वो अनजान दुआएं
मौन प्रार्थनाएं
एक रहस्य को भेदते
दूसरे में विलीन होते
और न जानते
उस एक रहस्य को
मन की अतल गहराई में
महसूस करते...
जीवन के ये रहस्य
हम कहां जान पाते कभी
जिंदगी से जुड़ा हमारा सफ़र
एक रहस्य ही होता है
यही जाना जब-जब आया यहां
लौटते हुए उसे महसूस किया
शायद हर आदमी की दुनिया एक रहस्य है
एक की दुनिया
दूसरे से जुदा है
जब-जब आया यहां
बस इतना ही जाना !
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अमरेंद्र मिश्र
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