तुम माँ हो।
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हर रोज कुछ सहेजने की कोशिश करता हूं
कुछ लिखने की कोशिश करता हूं
तुम्हारी असीम अतलता में उतरने की कोशिश करता हूं।
तुम्हारा एहसास अब भी मेरे साथ है
वे बीते वक्त के साए अब भी मेरे साथ हैं
यादों की खुशबू अब भी मेरे साथ है।
कठिन है निराकार को आकार देना
निःशब्द को शब्द देना ।
सामर्थ्य नहीं मेरा कि तुम्हें शब्दों में कैद कर दूँ
असीमित को मैं सीमित कर दूँ
स्वार्थ के लिए रचनाओं में उपमित कर दूँ
तुम असीम हो
तुम उपमा रहित हो
तुम आराध्य हो
हारती है एक लेखनी हर रोज
जाया होती है एक कोशिश हर रोज
मगर बढ़ता है दुआओं का असर हर रोज।
तुम असीम हो, निराकार हो , तुम माँ हो।
अशोक मिश्र
वाराणसी
9547608041
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