कभी भारतीय राजनीति में एक से बढ़कर एक दिग्गज प्रगतिशील ईमानदार नेता हुआ करते थे। वे राजनीति करने के साथ-साथ राजनीति को समझते भी थे। विदेश नीति और कूटनीति में माहिर होने के साथ-साथ एक अर्थव्यवस्था कैसे कार्य करती है का समग्र ज्ञान रखते थे। एक राजनेता जनता का प्रतिनिधि होता है और उसके द्वारा दिए गए किसी भी बयान से जनता प्रभावित होती है। एक गलत बयान से लाखों करोड़ों लोगों के दिमाग में गलत अवधारणा बनती है। गलत बयान देकर जाति और धर्म के आधार पर लोगों को बांटना कतई किसी राष्ट्र के हित में नहीं है।
यदि बिहार के परिप्रेक्ष्य में इसको देखें तो वहां की जनता आज विकल्पहीन हो गई है। एक भी ऐसा चेहरा नहीं है जिसे कहा जा सके कि वह सही मायने में राजनेता है और राजनीति का सही ज्ञान रखता है। यदि आपको कहा जाए कि कई अच्छे लोगों में से एक अच्छा व्यक्ति को चुने तो यह आपके लिए बहुत कठिन कार्य नहीं होगा। लेकिन जब आपसे कहा जाए कई बुरे लोगों में से एक कम बुरा व्यक्ति को चुने तो यह निश्चित रूप से चुनौती पूर्ण ही नहीं, बल्कि आपके के लिए किंकर्तव्यविमूढ़ वाली स्थिति होगी।
अनाप-शनाप बयान देकर, काल्पनिक बातें करके जनता को बरगलाना भ्रमित करना कतई ठीक नहीं है। चुनावी लाभ के लिए जैसा कि भारतीय राजनीति में होता आय है जनता के समक्ष एक ऐसा एजेंडा प्रस्तुत करना जिसका कार्यान्वयन संभव नहीं हो नैतिक रूप से गलत है।
एक पार्टी कहती है, यदि हमारी सरकार बनी तो हम 10 लाख रोजगार का सृजन करेंगे उस पर दूसरी पार्टी का बयान आता है “पैसावा कहां से लाएंगे”। उसके तुरंत बाद उन्हें लगता है उस बयान का राजनीतिक लाभ विपक्ष को मिल रहा है तो वे तुरंत अपने बयान से पलट जाते हैं और उससे कहीं अधिक रोजगार सृजन का भ्रामक आंकड़ा प्रस्तुत कर युवाओं को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन जब उनके पास पर्याप्त अवसर था अपने पुराने वादों को पूरा करने का तब उन्होंने इसकी तरफ ध्यान नहीं दिया। आज फिर एक बार जनता को अपनी कल्पित बातों से बहलाने की कोशिश कर रहे हैं। इस स्थिति के लिए पार्टी स्वयं जिम्मेदार है। या तो आप अपने किए वादे को पूरा कीजिए या जनता के सामने सच्चाई रखिए।
वैसे लोग जिन्हें अर्थव्यवस्था का ज्ञान नहीं है, जब जनता के समक्ष अपना आर्थिक ज्ञान बघारते हैं तब वे राजनेता कम विदूषक ज्यादा लगते हैं। लोकतंत्र में जनता की आवाज सुनी जानी चाहिए। जनता का क्या दुख दर्द हैं उनको समझा जाना चाहिए, न की अपनी ही बात जनता को सुनाते रहना चाहिए। भारतीय राजनीति में एक ट्रेंड जोर पकड़ता जा रहा है कि बस अपनी ही बात सुनाया जाए जनता की बात न सुना जाए। इस प्रकार का एकतरफा संवाद एक प्रजातांत्रिक व्यवस्था के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। बिहार में फरवरी 2019 से बेरोजगारी की दर 10 फीसदी है युवाओं में यह 55 फीसदी है। नियोजित लोगों में 87 फ़ीसदी के पास नियमित वेतन वाली नौकरी नहीं है। मनरेगा के तहत दो करोड़ परिवारों ने पंजीयन करवाया है, मगर सिर्फ 36.5 फीसदी को काम मिला। बिहार के लाखों युवा, मजदूर राज्य में रोजगार की व्यवस्था न हो पाने के कारण पलायन करने के लिए मजबूर है ।इस पलायन पर वर्षों से राजनीति होती आई है लेकिन किसी न किसी बहाने इस बात को टाल दिया जाता है और अन्य मुद्दों को आगे करके एक भ्रम की स्थिति पैदा की जाती है ताकि लोग असल मुद्दे को भूल जाए। लाख दावों के बावजूद बिहार की शिक्षा व्यवस्था अभी भी लचर है। अस्पतालों की स्थिति ठीक नहीं है ।डॉक्टरों की संख्या निर्धारित संख्या से बहुत ही कम है ।कुछ इलाकों को छोड़कर सड़कों की स्थिति भी कुछ अच्छी नहीं है।किसान बदहाल स्थिति में है बिहार में कृषि के लिए अपने कुल खर्च का महज 3.5 फीसदी आवंटित किया है जो कि देश में सबसे न्यूनतम है और सभी राज्यों का औसत 7.1 है । 42.5 फीसद कृषक परिवार कर्जदार है।
यदि हम उम्मीद करते हैं कि इसके जाने के बाद और उसके आने के बाद स्थिति बदलेगी तो यह सरासर गलत है ।स्थिति यथावत रहने वाली है और हो सके तो इस से भी बदतर स्थिति का सामना करने के लिए हमें तैयार रहना चाहिए। तथ्य और सच्चाई ना कोई पार्टी सामने रख रही है और ना ही जनता समझने की कोशिश कर रही है बिहार का वोट जातीय समीकरणों पर आधारित है। राष्ट्रीय और विकास के मुद्दे हमेशा गौड़ हो जाते हैं जातीय समीकरणों के समक्ष ।
कुछ भी हो इस तरह की विकल्प हीनता की स्थिति किसी की व्यवस्था के लिए ठीक नहीं है और आने वाला समय हमारे लिए और कठिन होने वाला है।
Y
ReplyDelete