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Sunday, December 19, 2021

These Electric Scooters are likely to enter the Indian market in 2022

 The demand for electric scooters is increasing rapidly in India. For this reason, two-wheeler companies are launching electric scooters one after the other with cool features. Because of this, many EV vehicles are coming in 2022, and companies are coming with many new features, including electric scooters from Hero MotoCorp, Okinawa, Komaki and Imflux One. These electric scooters can offer more range with a top speed. Here is information about some electrics, which will give you more range in the budget.


 Hero MotoCorp Vida Electric Scooter Hero MotoCorp, India's largest two-wheeler manufacturer is entering the electric two-wheeler segment in 2022 with an all-new electric scooter. The company has already registered with the name Vida, which is expected to be a new vertical for electric mobility and Hero MotoCorp's EV range. There may be an option of swapping batteries in this. It is expected that this electric scooter will compete with scooters like Ola, TVS and Bajaj. It is likely to have a range of over 100 km. 



Suzuki Burgman Street ElectricThe electric scooter from Suzuki Burgman Street Scooter is almost ready to be launched.  As of now, no information has been given on the performance and features of the Suzuki Burgman Street Electric, but it is expected to be a feature-packed electric scooter with a top speed of around 80 kmph and a range of over 75 kmph.  This scooter is likely to be launched in early 2022.



Komaki Venice Electric Scooter Delhi-based electric vehicle manufacturer Komaki Electric Vehicles is about to launch its new electric scooter.  The Komaki Venice will be a high-speed electric scooter and may come in 10 different colors and can be had at an affordable price.  It will come with new-age features like regenerative braking, a repair switch, as well as mobile connectivity


Okinawa Oki90 Electric Scooter may be launched in early 2022.  It will be one of the few products to arrive first in 2022.  Like the Oki100, it could be a high-speed EV with a top speed of 90 kmph and a range of 175-200 kph.

Friday, December 17, 2021

Especially or specially?

 Especially or specially? 


Especially and specially are adverbs.


Especially means ‘particularly’ or ‘above all’:


  • She loves flowers, especially roses.


  • I am especially grateful to all my family and friends who supported me.


Not: Especially I am …


You use especially to show that what you are saying applies more to one thing or situation than to others.

  • He was kind to his staff, especially those who were sick or in trouble.

  • Double ovens are a good idea, especially if you are cooking several meals at once.

  • These changes are especially important to small businesses.


When especially relates to the subject of a sentence, you put it immediately after the subject.


  • Young babies, especially, are vulnerable to colds.


You can also use especially in front of an adjective to emphasize a characteristic or quality.


  • I found her laugh especially annoying.



We use specially to talk about the specific purpose of something:


  • This kitchen was specially designed to make it easy for a disabled person to use.


  • He has his shirts made specially for him by a tailor in London.

  • They'd come down specially to see us.

  • She wore a specially designed costume.

  • The school is specially for children whose schooling h


Note : 

Especially can also be used to mean ‘for a particular purpose’:

  • I bought these (e)specially for you.

Thursday, December 16, 2021

अमूर्त सांस्कृतिक विरासत' (Intangible Cultural Heritage) क्या है?

 UNESCO.ORG के अनुसार, "सांस्कृतिक विरासत स्मारकों और वस्तुओं के संग्रह पर समाप्त नहीं होती है। इसमें परंपराएं या जीवित अभिव्यक्तियां भी शामिल हैं जो हमारे पूर्वजों से विरासत में मिली हैं और हमारे वंशजों को दी गई हैं, जैसे कि मौखिक परंपराएं, प्रदर्शन कला, सामाजिक प्रथाएं, अनुष्ठान,  उत्सव की घटनाएं, प्रकृति और ब्रह्मांड से संबंधित ज्ञान और प्रथाएं या पारंपरिक शिल्प का उत्पादन करने के लिए ज्ञान और कौशल।"


मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में वर्तमान में 492 तत्व हैं।  दुर्गा पूजा को शामिल करने के साथ, भारत के कुल 13 अमूर्त सांस्कृतिक विरासत तत्वों को अब यूनेस्को की प्रतिनिधि सूची में अंकित किया गया है।


 भारत के अन्य तत्व जो सूची में शामिल हैं:


 कूडियाट्टम: केरल का एक संस्कृत थिएटर;  मुदियेट: केरल का एक अनुष्ठानिक रंगमंच और नृत्य नाटक;  वैदिक मंत्रोच्चार: पवित्र हिंदू का पाठ;  रामलीला: रामायण का पारंपरिक प्रदर्शन;  राममन: गढ़वाल, उत्तराखंड का एक धार्मिक त्योहार और अनुष्ठान थियेटर;  कालबेलिया: राजस्थान के लोक गीत और नृत्य;  छऊ नृत्य: ओडिशा और पश्चिम बंगाल का शास्त्रीय नृत्य;  लद्दाख बौद्ध मंत्र: लद्दाख में पवित्र बौद्ध ग्रंथों का पाठ;  मणिपुरी संकीर्तन: मणिपुर का एक अनुष्ठान गायन, ढोल-नगाड़ा और नृत्य;  जंडियाला गुरु, पंजाब के ठठेरों के बीच बर्तन बनाने का पारंपरिक पीतल और तांबे का शिल्प;  योग: प्राचीन भारत में उत्पन्न प्राचीन भारतीय शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक अभ्यास;  कुंभ मेला: उत्तराखंड के हरिद्वार, महाराष्ट्र के नासिक, उत्तर प्रदेश के प्रयागराज और मध्य प्रदेश के उज्जैन में आयोजित सामूहिक हिंदू तीर्थयात्रा।

Sunday, December 12, 2021

प्रगतिवाद , हिंदी साहित्य

 'प्रगतिवाद' केवल काव्य प्रवृत्ति नहीं, व्यापक काव्यान्दोलन या साहित्यिक आंदोलन है। उसके पीछे मार्क्सवादी विचारधारा है जो राजनीतिक दृष्टि से आगे विश्वदृष्टि के रूप में भी महत्वपूर्ण है। प्रगतिवाद या प्रगतिशील साहित्य शब्द का प्रयोग 1936 के आसपास हुआ जब प्रगतिशील लेखक संघ स्थापित हो चुका था पर साहित्य में 1930 के बाद ही यह रूझान प्रकट होने लगा था जिसके पीछे बदली हुई राजनीतिक, सामाजिक वास्तविकता थी। प्रगतिवाद एक अर्थ में छायावाद का विकास है दूसरे अर्थ में छायावाद के विरुद्ध विकसित काव्यप्रवृत्ति। अन्तर्वस्तु की दृष्टि से प्रगतिवाद में ऐतिहासिक चेतना सामाजिक यथार्थ दृष्टि, परिवेश या प्रकृति के प्रति लगाव, जीवन के प्रति स्वीकृति का भाव, मानवीय संबंधों में समानता का आग्रह और भविष्योन्मुखी दृष्टि का महत्व है। रचनाविधान की दृष्टि से प्रगतिवाद में यथार्थबोध के अनुरूप नये रूपों की खोज, जीवन की हलचल से भरी भाषा, यथार्थ ज्ञान से प्रेरित ऐतिहासिक मूर्त्तता, लोकरूपों या छन्दों का आवश्यकतानुसार उपयोग, सहजता का शिल्प आदि महत्वपूर्ण हैं। प्रगतिवाद प्रयोगवाद या अन्य आधुनिकतावादी प्रवृत्ति के उभार के कारण कभी बीच में केन्द्र में न रह गया हो किंतु विकास उसका कभी स्थगित नहीं हुआ। यही कारण है कि आज भी जो नयी कविता लिखी जा रही है उसे प्रगतिवाद का ही विकास कहा जाएगा। प्रगतिवाद के प्रमुख कवि हैं : नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, शमशेर, मुक्तिबोध और त्रिलोचन। बाद के कवियों में केदारनाथ सिंह, धूमिल, कुमार विकल, अरुण कमल के नाम लिये जा सकते हैं। यों, ऐसे नामों की सूची बड़ी हो सकती है क्योंकि यह प्रवृत्ति आज पुनः केन्द्रीयता प्राप्त कर चुकी है।

ऐतिहासिक महत्व

प्रगतिवादी का एक काव्य प्रवृत्ति के रूप में और व्यापक साहित्यिक आंदोलन के रूप में ऐतिहासिक महत्व है। जिस समय अतिशय सूक्ष्मता और अति-कल्पनाशीलता के नाम पर हिन्दी कविता गूढ रहस्योन्मुख होती जा रही थी, प्रगतिवाद ने कविता को अपने समय के यथार्थ से, यथार्थ-बोध के अनेक रूपों से जोड़ा और कविता और राजनीति के बीच ऐसा घनिष्ठ संबंध विकसित किया जिससे आगे की कविता भी लाभान्वित हुई। प्रगतिवाद ने कविता संबंधी अवधारणा बदली और अपने समय के तीखे सवालों की गूंज कविता में पैदा की। प्रगतिवाद ने एक नये ही संदर्भ में ‘कविता किसके लिए'- जैसा सवाल उठाया। प्रगतिवाद अपनी ऐतिहासिक भूमिका के लिए साहित्य में स्थायी महत्व का विषय हो गया है।

साहित्यिक महत्व

प्रगतिवादी कविता उदाहरण है कि उसने साहित्य भूमि का विस्तार किया। कविता का संसार

अधिक यथार्थ, प्रामाणिक, व्यापक और विश्वसनीय लगने लगा। कविता की अंतर्वस्तु और रचनाविधान में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए। उपेक्षित जान पड़ने वाले विषयों, चरित्रों को काव्यात्मक प्रतिष्ठा मिली। कविता ने प्रत्यक्ष जीवन, लोकरूपों, लोक प्रचलित छन्दों का नया उपयोग किया और नयी संभावनाएँ खोजी।

प्रगतिवाद : सीमा और व्याप्ति

प्रगतिवाद का विरोध करने वाले ही उसकी सीमा यह बताते रहे हैं कि वह मार्क्सवाद का साहित्यिक रूपांतर मात्र है। पर यह सब जानते हैं कि यदि प्रगतिवाद नाम से परिचित काव्य प्रवृत्ति के महत्वपूर्ण कवियों में नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, शमशेर बहादुर सिंह, गजानन माधव मुक्तिबोध और त्रिलोचन जैसे बड़े कवि हैं तो उनका काम केवल मार्क्सवाद के सिद्धांत विवेक के जरिए नहीं चल सकता। मार्क्सवाद में उनकी आस्था जहाँ व्यापक जीवन ज्ञान में और गहरी जीवनासक्ति में सहायक हुई वहीं वे प्रगतिवाद को समर्थ काव्य प्रवृत्ति के रूप में विकसित करने के लिये, यथार्थ के नये रूपों की समझ के अनुरूप, नयी काव्य शैली का विकास करते रहे हैं। वैसे एक साहित्यिक आंदोलन के रूप में प्रगतिवाद का इतिहास मोटे तौर पर 1936 ई. से शुरू होने के बाद के लगभग बीस वर्षों का इतिहास है किन्तु यह ‘साहित्य में स्वस्थ सामाजिकता, व्यापक भावभूमि और उच्च विचार के निरंतर विकास का इतिहास है, जो न केवल राजनीतिक जागरण से आरंभ होकर क्रमशः जीवन की व्यापक समस्याओं की ओर, आदर्शवाद से आरंभ होकर क्रमशः यथार्थवाद की ओर और यथार्थवाद से आरंभ होकर क्रमशः स्वस्थ सामाजिक यथार्थवाद की ओर अग्रसर होता जा रहा है"। अतः व्यापक अर्थों में प्रगतिवाद न स्थिर मतवाद है न स्थिर काव्य रूप। उसमें निरंतर विकास हुआ है। आज प्रगतिशीलता के व्यापक अर्थ में ऐतिहासिक चेतना, जीवन विवेक, जीवनानुभवों के विस्तार, यथार्थ के मूल रूपों की समझ, जीवनधर्मी सौन्दर्यबोध, प्रकृतिबोध का उल्लेख किया जाता है, फिर भी जीवन को देखने की यथार्थवादी दृष्टि विशेष अर्थ में मार्क्सवादी दृष्टि को यहां प्रमुखता प्राप्त है। प्रगतिवाद के विकास में अपना योगदान देने वाले परवर्ती कवियों में केदारनाथ सिंह, धूमिल, कुमार विमल, अरुण कमल, राजेश जोशी के नाम उल्लेखनीय हैं।

प्रगतिवाद के प्रमुख कवि

नागार्जुन

प्रगतिवादी काव्यधारा के महत्वपूर्ण कवियों में प्रमख नागार्जुन के बारे में आज यह बात सहज ही कही जा सकती है कि समकालीन हिन्दी काव्य परिदृश्य में भी उन्हें केन्द्रीयता प्राप्त है। मैथिली काव्य रचनाओं के लिए साहित्य अकादमी द्वारा सम्मानित नागार्जुन खड़ी बोली हिन्दी कविताओं में भी मूल काव्य ऊर्जा, गहरी आंचलिकता, ठेठपन, तदभवता, व्यंग्यपूर्ण आक्रामकता और गहरी जीवनासक्ति का प्रमाण देते हैं। राजनीतिक कविताएं नागार्जुन के यहाँ बड़ी संख्या में हैं। उनमें जो सपाट तात्कालिक या इकहरी नहीं हैं, नागार्जुन की बड़ी कवि-प्रतिभा का प्रमाण देती हैं। कविता के लिए जो विषय अकल्पनीय या असंभव माने जाते हैं उनपर भी नागार्जुन ने कविताएँ लिखी हैं और असाधारण सफलता प्राप्त की है। जीवन के प्रति प्रगाढ़ राग की कविताएँ भी उनके यहाँ कम नहीं हैं। पर उनकी कविता का एक रंग वह है जहाँ नफरत, प्यार, विक्षोभ, जिज्ञासा घुलमिल जाते हैं उनमें फर्क करना मुश्किल हो जाता है। नागार्जुन का कविता की अंतर्वस्तु, रूप और भाषा पर अनोखा नियंत्रण दिखाई देता है। एक उदाहरण, उनकी समग्र काव्य क्षमता देखने के लिए प्रकृति से शुरू होकर एक दम सरल विन्यास वाली कविता कैसे राजनीतिक कविता हो जाती है, यह देखने के लिए शीर्षक है

"काले काले"

काले काले ऋतु रंग

काली काली घन घटा

काले काले गिरि श्रृंग

काली काली छवि घटा

काले काले परिवेश

काली काली करतूत

काली काली करतूत

काले काले परिवेश

काली काली महँगाई

काले काले अध्यादेश।

वाक्य क्रम के बदलाव में एक संयुक्त पद “काले काले” की आवृत्ति में कला भी अपना काम कर रही है और वर्ग संघर्ष या व्यवस्था से संघर्ष का ऐतिहासिक विवेक भी। नागार्जुन को आधुनिक कबीर कहा गया है, वह उनके फक्कड़ क्रांतिकारी व्यक्तित्व को देखते हुए उनकी कला में भी यही व्यक्तित्व समाया है।

 केदारनाथ अग्रवाल

केदारनाथ अग्रवाल प्रगतिवादी काव्यधारा के प्रतिनिधि तथा महत्वपूर्ण कवि हैं। रूमानी आदर्शवाद से यथार्थवाद तक, रूपासक्ति से जीवनासक्ति तक और कोमल रागात्मकता से खुरदुरे वस्तुचित्रण तक केदार की कविता के अनेक रंग हैं। भावुकता केदार के यहाँ आत्मीयता का पर्याय है। पत्नी प्रेम पर जैसी अकुण्ठ कविताएं केदारनाथ अग्रवाल ने लिखी हैं, किसी ने नहीं लिखीं। प्रेम, सौन्दर्य प्रकृति के गहरे लगाव के साथ केदार संघर्षशील जनता के कठोर जीवन, कठिन श्रम और दृढ़ आस्था की ओर बराबर सजग रहे हैं। 'चन्द्रगहना से लौटती बेर' तथा 'बसंती हवा' से केदार की खास पहचान बनी। यह सहजता, यह स्वाभाविकता सच्ची जीवनासक्ति से ही पैदा होती है।

एक बीते के बराबर

यह हरा ठिगना चना

बाँधे मुरैठा शीश पर

छोटे गुलाबी फूल का

सजकर खड़ा है।

और सरसों की न पूछो

हो गयी सबसे सयानी

हाथ पीले कर लिये हैं।

केदारनाथ अग्रवाल स्वीकार करते हैं कि मार्क्सवादी विचारधारा के कारण ही उन्हें नयी जीवन दृष्टि और नयी काव्यदृष्टि मिली। 'देवली के नरसंहार' जैसी तात्कालिक घटनाओं पर भी केदार ने कविताएँ लिखी हैं और अपनी वर्ग चेतना का प्रमाण दिया है।

शमशेर बहादुर सिंह

शमशेर बहादुर सिंह को प्रगतिवादी काव्यधारा से सम्बद्ध करने में उन्हें कठिनाई होती है जो

प्रगतिवाद को स्थिर मतवाद ही मानते हैं, उसकी काव्यात्मक संभावनाओं को महत्व नहीं देते।

शमशेर को रूपवादी या प्रयोगशील मानकर अलग कर दिया जाता है। शमशेर विचारधारा की दृ

ष्टि से मार्क्सवादी हैं और मार्क्सवाद को विशेष महत्व देते । जनता के प्रति उनकी सहानभूति

किसी से कम नहीं है। पर कविता को वे उसकी मुक्त संभावनाओं में देखते हैं। रूप और शिल्प

उन्हें जीवन की प्रकट सच्चाइयों की तरह ही जरूरी जान पड़ते हैं। ‘लेकर सीधा नारा' शमशेर

की वह महत्वपूर्ण कविता है जो प्रगतिवादी आंदोलन के दौर में विशेष चर्चित हुई।

लेकर सीधा नारा

कौन पुकारा

अंतिम आशाओं की सन्ध्याओं से

मैं समाज तो नहीं, न मैं कुल

जीवन

कण समूह में हूँ मैं केवल

एक कण

कौन सहारा।

शमशेर मानते रहे हैं कि उनकी असली जमीन रोमानी ही थी पर 'अमन का राग', 'यह शाम है

जैसी कविताएँ वे अपनी आस्था के अनुरूप लिखते रहे हैं। सांप्रदायिक दंगों पर उन्होंने बाद में

जो कविताएँ लिखी हैं वे प्रगतिशील विचारधारा, जीवन दृष्टि के बगैर असंभव है।

 गजानन माधव मुक्तिबोध

मुक्तिबोध की कविता का प्रगतिशील यथार्थवादी काव्यधारा से सहज संबंध बिठाने में डॉ.रामविलास शर्मा तक को कठिनाई होती है। अब शायद यह बात अधिक स्पष्टतापूर्वक कही जा रही है कि प्रगतिशील यथार्थवादी कविता की ही कम से कम दो परंपराएँ हैं -एक में नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल आते हैं, दूसरी में शमशेर, मुक्तिबोध । मुक्तिबोध ने सीधे-सीधे स्वीकार किया है कि एक कला सिद्धांत के पीछे विशेष जीवन दृष्टि होती है, उसके पीछे एक जीवन दर्शन होता है और उसके पीछे एक राजनैतिक दृष्टि भी होती है। मुक्तिबोध की महत्वपूर्ण लम्बी कविताएँ राजनैतिक दृष्टि से वंचित नहीं हैं। यह राजनीतिक दृष्टि मार्क्सवाद ही है जो व्यापक अर्थ में विश्वदृष्टि भी है। 'अन्तःकरण का आयतन' कविता में मुक्तिबोध अपना पक्ष स्पष्ट करते

पृथ्वी के प्रसारों पर

जहाँ भी स्नेह या संगर

वहाँ पर एक मेरी छटपटाहट है

वहाँ है जोर गहरा एक मेरा भी

सतत मेरी उपस्थिति

नित्य सन्निधि है।

मुक्तिबोध ने यथार्थ चित्रण के लिए फैन्टेसी का भी उपयोग किया और इस प्रकार एकरस जान पड़ने वाले काव्यरूप में विविधता, नाटकीयता, गति पैदा की। अँधेरी दुनिया के रहस्यों को भेदते हुए मुक्तिबोध के जो विचार स्फुलिंग सामने आते हैं वे एक निश्चित विचारधारा या जीवन दृष्टि का प्रमाण देते हैं। वे सत्ता को किस तरह बेनकाब करते हैं इसका सटीक उदाहरण है

'भूलगलती' नाम कविता जिसमें भूलगलती सिंहासन पर बैठी है और 'सच' नाम का पात्र गिरफ्तार करके लाया जाता है। अँधेरे में' मुक्तिबोध की सबसे महत्वपूर्ण कविता है – आधुनिक कविता की विशिष्ट उपलब्धियों में एक।


 त्रिलोचन

त्रिलोचन की एक अलग पहचान है। परम्परा में ही उन्हें रखना हो तो वे तुलसी और निराला की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले कवि हैं। उन्होंने राजनीतिक विषयों पर कविताएं नहीं लिखी हैं कि उनकी विचारधारा तक सीधे पहुंचना आसान हो। पर साधारण विषयों पर, जीवन के बहुत मामूली प्रसंगों पर लिखते हुए भी वे अपनी दृष्टि का प्रमाण देते हैं। सानेट त्रिलोचन का अपना आविष्कार है। सानेटों में जितनी सहजता से वे आत्मकथा या सामाजिक संदेश बिखेरते चलते हैं, उसी से उनकी साफ दृष्टि और असाधारण काव्यक्षमता का पता चलता है। त्रिलोचन की कविताएँ सीधे जीवन को पकड़ती हैं। त्रिलोचन के सानेटों में आत्मभर्त्सना के जो अंकुठ संकेत हैं उनसे उनकी जीवनशक्ति प्रकटहोती है। "भीख मांगते उसी त्रिलोचन को देखा कल/जिसको समझे था है तो है यह फौलादी", 'नगई महरा' जैसे इतिवृत्त में उनका ढंग दूसरा है बतकही वाला ढंग। कृत्रिमता, बनावटीपन से मुक्त यह सहज आत्मीयता त्रिलोचन का काव्यवैशिष्ट्य है- शब्दकार इन शब्दों में जीवन होता है।





Friday, December 10, 2021

right to choose a life partner

Under Article 21 (right to life) of the Indian Constitution, adults have the right to choose a life partner of their choice.  Interfering in this right is against the Constitution. When two adults choose each other as life partners, it is an expression of their choice, which is recognized under Article 19 (1)(a) of the Constitution. Apart from this, the Supreme Court has also described inter-caste marriage as an important part of a person's choice, his basic rights and self-respect. According to the court, 'Crushing one's choice in the name of false pride is tantamount to physical torture, which causes the society to shudder.

असम के जननायक ज़ुबीन गर्ग: एक कलाकार जो सिर्फ़ आवाज़ नहीं, असम की पहचान थे#

 #असम के जननायक ज़ुबीन गर्ग: एक कलाकार जो सिर्फ़ आवाज़ नहीं, असम की पहचान थे# असम के प्रिय गायक, संगीतकार और सामाजिक कार्यकर्ता ज़ुबीन गर्ग ...