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Wednesday, September 8, 2021

मैला आंचल” आंचलिक उपन्यास

 “मैला आंचल”   आंचलिक उपन्यास

आर.पी. मिश्रा

सन् 1954 में प्रकाशित रेणु का "मैला आंचल”  हिंदी साहित्य में आंचलिक उपन्यास की परंपरा को स्थापित करने का प्रथम व सफल प्रयास है। "मैला आंचल” वस्तु और शिल्प दोनो ही स्तरों पर अपने पूर्ववर्ती उपन्यासों से अलग इसलिए है कि उसमें पहले से चली आ रही परंपरा को छोड़ कर एक नए शिल्प में ग्रामीण जीवन को प्रस्तुत किया है। उपन्यासों में नायकत्व की जिस परंपरा को निभाया जा रहा था उसमें बदलाव लाया अर्थात् व्यक्ति के स्थान पर समूचे अंचल विशेष को ही नायकत्व प्रदान किया। इसी के साथ दूसरा महत्वपूर्ण परिवर्तन यह किया कि उस अंचल विशेष की भाषा का अधिक से अधिक प्रयोग किया ताकि उस जन समुदाय की इच्छा-आकांक्षा रीति-रिवाज, पर्व-त्यौहार सोच-विचार को ज्यादा प्रामाणिक रूप में चित्रित किया जा सके। मैला आँचल के पहले संस्करण की भूमिका में स्वयं रेणु ने उसे "आंचलिक उपन्यास" कहा है। जिसकी कथा के केंद्र में है बिहार का पूर्णिया जिला, जो अपने पिछड़ेपन के लिए कुख्यात रहा है। रेणु के शब्दों में, “इसमें फूल भी है शूल भी, धूल भी  गुलाल भी- मैं किसी से भी दामन बचाकर निकल नहीं पाया।” यही वह विशिष्ट जीवन संदर्भ है जो रेणु के उपन्यास का यथार्थ है। इन्हीं दो बिंदुओं को चिन्हित करते हुए हम आंचलिक उपन्यास से उन उपन्यासों को अलग करते हैं जो गाँव की पृष्ठभूमि को आधार बनाकर लिखे गए हैं। इस तरह इनको दो श्रेणियों में रखा जा सकता है। पहली श्रेणी में आते हैं प्रेमचंद के "प्रेमाश्रम" "रंगभूमि" और "गोदान" के अतिरिक्त शिवपूजन सहाय का "देहाती दुनिया" शिवप्रसाद रुद्र का "बहती गंगा", भैरवप्रसाद गुप्त का "सती मैया का चौरा" और नागार्जुन का "बलचनमा"। इन सबकी पृष्ठभूमि में गाँव की संवेदना रची बसी है। "गोदान से लेकर आज तक न जाने कितने ही उपन्यास लिखे गए हैं जिनकी पृष्ठभूमि में गाँव का जीवन अपनी अच्छाई-बुराई के साथ निहित है। लेकिन ये उपन्यास किसी अंचल विशेष की समूची तस्वीर पेश नहीं करते बल्कि इनकी रुचि आम भारतीय गाँवों में हो रहे बदलाव को चित्रित करने में ज्यादा है। "मेरीगंज" गाँव का जीवंत चित्र उसमें रह रहे व्यक्तियों की विनोदप्रियता, परस्पर वैमनस्य, प्रेम, घृणा, तिरस्कार, द्वेष, जलन, समर्पण, अमानवीय शोषण, मानवीय संबंध, संवेदना, करूणा आदि मानवीय गुणों-अवगुणों के समस्त उतार-चढ़ावों के साथ रेणु ने उपस्थित किया है। इस उपन्यास में उपस्थित किए गए बाह्य नैतिकता के प्रति तिरस्कार का भाव भी उभरकर आता है तो आंतरिक नैतिकता के लिए छटपटाहट भी दिखाई देती है। परस्पर विरोधी मान्यताओं के बावजूद "मैला आचल” के केंद्र में जीवन के प्रति गहरी आस्था का भाव निहित है। इसमें बैलों के गले में पड़ी घंटियों की रुनझुन एक संगीत का सृजन करती है। एक लय समूचे उपन्यास में व्याप्त है। यही लय जीवन के प्रति आस्था का संचार करती है। मैला आचल जिस प्रकार आंचलिक परिवेश को जीवंत बनाने में सक्षम है उसी प्रकार उसमें अपने समय का बोध भी परिलक्षित होता है। मेरीगंज जैसे पिछड़े ग्रामांचल में मलेरिया केंद्र खुल जाने से जन-जीवन में एक तरह की हलचल पैदा हो जाती है। मार्टिन द्वारा की गई कोशिश लगभग पैंतीस वर्षों के बाद मलेरिया केंद्र के खुलने से साकार होना विज्ञान और आधुनिकता को अपनाने की रफ्तार को खुद ही बयान करती है। भूत-प्रेतो और जीनों डाकिनियों के अस्तित्व में विश्वास करने वाली और उनकी प्रसन्नता अप्रसन्नता की चिंता से निरंतर ग्रस्त रहने वाली जनता के अंधविश्वासी मन की भयानक परिणति गनेश की नानी की हत्या में होती है।

जातिव्यवस्था का कट्टर रूप भी यहाँ दिखाई देता है। गाँव के हर एक व्यक्ति के मन में डॉ. प्रशांत की जाति मालूम करने की प्रबल इच्छा है। ब्राह्मण, क्षत्रिय राजपूत यादव, दलितों के अलग-अलग टोले हैं, दलितों के टोले में सवर्ण लोग तभी प्रवेश करते हैं, जब कोई निहायत ही स्वार्थ हो । राजपूतों को जब मजदूरी के लिए दलितों को बुलाना होता है तभी वे दलितों की बस्ती में जाते हैं, अन्यथा छुआछूत का पूरा माहौल है। मठ के महंत द्वारा पूरे गाँव को दिए गए भंडारे में हर जाति के लोग अलग पंक्ति में बैठकर खाना खाते हैं लेकिन किसी को इसमें आपत्ति महसूस नहीं होती।

रेणु राजनीति को संपूर्ण जीवन का पर्याय तो नहीं मानते और न ही उसे मानव नियति की मात्र नियामक शक्ति, किंतु वे उसे जीवन को गहरे प्रभावित करने वाली शक्ति के रूप में जरुर देखते हैं। इसी राजनीति ने आजादी के बाद गाँव की संरचना में काफी उलट-फेर किया और धर्म, नैतिकता, आदर्श तथा मानवीय संबंधों के अर्थ बदल कर रख दिया। आजादी के बाद पैदा हुई राजनीतिक क्षुद्रताओं को बहुत गहराई से देखा गया है और इस नए वर्ग की अवसरवादिता और स्वार्थी वृत्ति को उजागर किया है। गांधीवाद की खोल ओढ़े भ्रष्ट राजनेताओं ने भ्रष्टाचार को फैलाने में जो साथ दिया उसके परिणाम आज सबके सामने मौजूद है। आजादी की लड़ाई का उद्देश्य और उस संघर्ष में अंतर्भूत चेतना का आज कहीं अता-पता नहीं है। रेणु ने इसे जगह-जगह उभारने की कोशिश की है और उसके भयंकर परिणामों को संकेतों के माध्यम से भविष्य का चित्र प्रस्तुत किया है। आजादी के बाद स्थिति में सुधार आने के स्थान पर वह पहले से बदतर होती गई। नए कांग्रेसियों की वजह से कांग्रेस के दफ्तरों में एक नयी तरह की संस्कृति ने जन्म लिया। गांधीवाद के प्रति अपनी आस्था के बावजूद उसके नाम में रेणु ने कोई संकोच नहीं किया। राजनीति, समाज, धर्म, जाति सभी तरह की विसंगतियों पर रेणु ने "मैला आंचल" के द्वारा प्रहार किया है। सामाजिक बदलाव की गति के मंद होने के लिए धर्म, जाति, बिरादरी जैसी सामाजिक जकड़न का बहुत बड़ा हाथ रहा है। मनुष्य की योग्यता के निर्धारण में जाति की अब भी निर्णायक भूमिका बनी हुई है।

 आंचलिक संदर्भ 

‘मैला आंचल’ के प्रकाशन से हिंदी में आंचलिक प्रयास की धारा का प्रारंभ माना जाता । अपने प्रकाशन के चार दशक से ज्यादा समय बीत जाने पर भी ‘मैला आंचल’ आज भी हिंदी में आंचलिक उपन्यास के अप्रतिम उदाहरण के रूप में स्थिर है।

 ‘मैला आंचल’ का महत्व केवल एक आंचलिक उपन्यास होने तक ही सीमित नहीं है, यह हिन्दी का व भारतीय उपन्यास साहित्य का एक अत्यंत श्रेष्ठ उपन्यास भी माना जाता है । इस अर्थ में ‘मैला आंचल’ का दर्जा क्लासिक रचना का है ‘गोदान’ के बाद हिंदी के जो कुछ सर्वश्रेष्ठ उपन्यास माने जाते हैं, ‘मैला आंचल’ उनमें से एक है ।

‘मैला आंचल’ व अपने अन्य उपन्यासों में रेणु ने बिहार के मिथिला अंचल को आधार बनाकर अपने अंचल के दुख सुख वहाँ के सहन सांस्कृतिक लोक जीवन को अत्यंत कुशलता और कलात्मकता से औपन्यासिक स्वरूप प्रदान किया है। अपने अंचल को अपनी रचनाओं के केंद्र में रखकर प्रस्तुत करने के कारण फणीश्वरनाथ रेणु हिंदी में आंचलिक उपन्यास की परंपरा के प्रवर्तक के रूप में प्रतिष्ठित हुए। 

‘मैला आंचल’ में रेणु ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण तकनीक का प्रयोग किया है, जिसके द्वारा आंचलिक परिवेश के सौंदर्य उसकी सजीवता और मानवीय संवेदनाओं को उजागर  किया है। दृश्यों को चित्रित करने के लिए लेखक ने गीत, लय-ताल वाद्य मनार, खंजड़ी नृत्य, लोकनाटक जैसे उपकरणों का भी बखूबी इस्तेमाल किया है। ध्वनि का जैसा सर्जनात्मक उपयोग ‘मैला आंचल’ में हुआ है, उतना शायद ही हिंदी के किसी अन्य उपन्यास में हुआ हो। ‘ढाक ढिन्ना’, ताक ढिन्ना’ ‘डा डिगा’! रि-रित्ता धिन-ता’ आदि की अनुगूंज सारे उपन्यास में सुनाई देती है। ध्वनियों के द्वारा लेखक ने पूरे परिवेश को वाणी दी है।लोकगीतों की कड़ियां स्थान-स्थान पर लेखक की मनोभावना व विचार को ही अभिव्यक्ति करती है।

मठ के वातावरण को चित्रित करने के लिए प्रातःकाल का कीर्तन बीजक पाठक साहेब बन्दगी’, का अभिवादन और ‘सतगुरु हो! सतगुरु को बार-बार दोहराने का उपयोग सफलता से किया गया है।

राजनीतिक पार्टियों की गतिविधियों की सरगर्मी को दिखाने के लिए तरह-तरह के नारी सहायता ली गई है। कहीं ‘किसान राज कायम हो’। ‘मजदूर राज कायम हो’। ‘गरीबों की पार्टी सोशलिस्ट पार्टी, सोशलिस्ट पार्टी जिंदाबाद की ध्वनि है तो कहीं की ‘जै हो गन्ही महतमा की गूंज सुनाई पड़ती है। जलसे जुलूस और मीटिंगों में भी ध्वनि और भाषणों का योगदान है। नारों को कहीं-कहीं गीतों में डालने का उपक्रम भी है।


‘मैला आंचल’ में आंचलिक पहलू उभारने के लिए लेखक ने अंचल के भौगोलिक परिस्थितियों के चित्रण से लेकर सामाजिक-सांस्कृतिक पर्यावरण के चित्रण तक बढ़ी गहराई लगाव से प्रस्तुत किया है।  ‘मैला आंचल’ में मौजूद मेरीगंज गांव भौगोलिक, सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अन्य किसी गांव से भिन्न है।  मेरीगंज में मनाए जाने वाले तीज-त्यौहारों गांव में मनाए जाने वाले ऋतपर्वों, लोक-व्यवहार के विविध रूपों व मानवीय संबंधों के विशिष्ट रुपों के वर्णन के माध्यम से रेणु ने "मैला आंचल” में अपने प्रिय अंचल का इतना गहरा व व्यापक चित्र खींचा है कि सचमुच है उपन्यास हिंदी में आंचलिक औपन्यासिक परंपरा की सर्वश्रेष्ठ कृति बन गया है।


 सामाजिक और राजनीतिक संदर्भ

राजनीतिक संदर्भ में रेणु ने 1946 में उपनिवेशवादी शासन की छत्रछाया में कांग्रेसी मंत्री मंडलों के कार्यकलापों और 1948 में अंग्रेजों के चले जाने के बाद उसी शासन को बिना किसी परिवर्तन के चलाए जाने को बड़ी गहराई से चित्रित किया है । भारतीय राजनीति के सभी पहलू कांग्रेसी आंदोलन, समाजवादी आंदोलन, क्रांतिकारी आंदोलन, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की हिंदू राज्य की पताका लहराने की कोशिश देश का विभाजन सांप्रदायिक दंगों आदि तो उपन्यास में चित्रित हुए ही हैं, शासन व्यवस्था के औपनिवेशिक स्वरूप को भी लेखक ने उद्घाटित किया है, जो स्वतंत्रता पूर्व व स्वातंत्र्योत्तर काल में बिना किसी परिवर्तन के चलता रहता है। शोषक वर्गों व शोषित वर्गों दोनों की ही स्थिति स्वतंत्रता के पहले और बाद एक ही तरह की बनी रहती है। भारतीय समाज के इस कटु राजनीति के यथार्थ को रेणु ने मैला आंचल में ईमानदारी से अंकित कर दिया है। 

उसी प्रकार बिहार के सुदूर क्षेत्र के विशेषत: मिथिला अंचल के सामाजिक मानचित्र को भी रेणु ने मैला आंचल में पूरी विविधता से उकेरा है । गांव का जाति-विभाजन शिक्षा चिकित्सा सुविधाओं का अभाव मानसिक पिछड़ापन गांव में मनाए जाते पर्व-त्यौहार लोकगीत संगीत स्त्री-पुरुष संबंध सामाजिक जीवन के विभिन्न पहलुओं को जिन्होंने बड़ी सजीवता से उपन्यास में अंकित किया है। गांव के जीवन में बलदेव, बावन दास, कालीचरण और डॉक्टर प्रशांत कुमार की मौजूदगी और प्रयत्नों से होने वाले सामाजिक परिवर्तनों का अंकन भी रेणु ने इस परिवर्तन के अंतर्विरोधों के साथ किया है। बिहार के मिथिला अंचल के राजनीतिक, सामाजिक व सांस्कृतिक जीवन का एक प्रामाणिक रूप जानने समझने के लिए ‘मैला आंचल’ एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक कृति का दर्जा रखती है।


Tuesday, September 7, 2021

THE HINDU VOCABULARY 7/09/2021

 THE HINDU VOCABULARY 7/09/2021


1. UMPTEEN

ˌअम्‍प्‌ˈटीन्‌

pronoun , determiner

very many; a lot


बहुत बार; बहुत सारे, बहुतेरे, बहुत-से


very many; a lot (of):

Ex:

  • We've been there umpteen times and she still can't remember the way.


2. LITTORAL

‍ˈलिटरल्‌

noun

the part of a country that is near the coast

किसी देश का समुद्रतट के निकट का भाग, समुद्रतटवर्ती


  • the littoral state of Goa

adjective

तटवर्तीय

the part of a river, lake, or sea close to the land:


The littoral zone covers the region between high and low tide.


RESURGENCE

रिˈसजन्‍स्‌

noun

the return and growth of an activity that had stopped

(किसी मृतप्राय गतिविधि का) पुनरुज्‍जीवन

Ex:


  • a resurgence of interest in the artist’s work


a new increase of activity or interest in a particular subject or idea that had been forgotten for some time:


Ex:


  • The creation of independent states has led to a resurgence of nationalism.


  • [ C usually sing ] There’s been a resurgence of criticism of the president.


4. FALTER

‍ˈफ़ॉल्‌ट(र्‌)

verb

1.to become weak or move in a way that is not steady

अशक्त होना या अस्थिर होना; लड़खड़ाना


Ex:


  • The engine faltered and stopped.

2. to lose confidence and determination

विश्‍वास और दृढ़ता खो देना; डगमगाना

Ex:


  • Sampras faltered and missed the ball


to lose strength or purpose and stop, or almost stop:

Ex:


  • The dinner party conversation faltered for a moment.


  • Her friends never faltered in their belief in her.


  • Nickie's voice faltered and he stopped speaking.


verb [I] (ALMOST FALL)


to move awkwardly as if you might fall:

Ex:


  • The nurse saw him falter and made him lean on her.


5. AMENABLE

अˈमीनब्‌ल्‌

adjective

happy to accept something; willing to be influenced by somebody/something


ख़ुशी से स्‍वीकार करने वाला; स्‍वेच्‍छा से प्रभावित होने वाला

Ex:


  • I’m amenable to any suggestions you may have.


willing to accept or be influenced by a suggestion:


She might be more amenable to the idea if you explained how much money it would save.

Ex:


  • Do you think the new manager will prove more amenable to our proposals?


Monday, September 6, 2021

जिन्दगीनामा': संक्षिप्त परिचय

 'जिन्दगीनामा': संक्षिप्त परिचय 

आर0पी0 मिश्रा                                           

'जिन्दगीनामा' कृष्णा सोबती का सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपन्यास है, यह उपन्यास बीसवीं सदी के हिन्दी उपन्यास साहित्य की भी बड़ी उपलब्धि है। 'जिन्दगीनामा' में विभाजनपूर्व पंजाब के जन-जीवन और संस्कृति का ऐसा अद्भुत पुनः सृजन किया गया है, जिसे पढ़ते हुए पाठक अभिभूत हो जाता है। 


‘जिन्दगीनामा’  उपन्यास दसवें व अंतिम सिख गुरु गुरु गोविन्द सिंह के सुप्रसिद्ध फारसी क चूँ कार अज हमां हीलते दरगुज़श्त। हलालस्त बुर्दन ब- शमशीर दस्त’ (जब दूसरे सब रास्ते कारगर न हो सके तो जुल्म के खिलाफ तलवार उठा लेना ज़ायज़  है) को समर्पित है। उपन्यास का अंत भी उपन्यास के प्रमुख चरित्र शाह जी द्वारा इन्हीं पक्तियों के उद्धरण से होता है। उपन्यास के आरंभ व अंत दोनों जगह गुरु गोविन्द सिंह के संदेश का सन्दर्भ लेखिका और रचना के पंजाबी संस्कृति से गहरे जुड़ाव का प्रमाण है।

कृष्ण सोबती ने ‘जिन्दगीनामा’ की संकल्पना पंजाब के सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहास के रूप में की है। इतिहास की व्याख्या दस्तावेजों के रूप में न करके जन-सामान्य की सांस्कृतिक गतिविधियों द्वारा की है। कृष्णा सोबती का अपनी मातृभूति व संस्कृति से ऐसा गहरा लगाव है, जो उसके आरंभ में कविता बनकर फूट पड़ा है। उपन्यास के आरंभिक अट्ठाईस पृष्ठ कथा से अलग पंजाब का अत्यंत उदात्त और काव्यात्मक रेखाचित्र प्रस्तुत करते हैं।


उपन्यास में लेखिका के जन्मस्थान अविभाजित पंजाब के अब पाकिस्तान में रह गए जिला गुजरात की कमान की गई है। उपन्यास में कथा तो कम है, दृश्यों का एक सतत् क्रम है।। लेखिका ने डेरा जटा गाँव की यादों को एक संश्लिष्ट दृश्य में बाँधकर प्रस्तुत किया है।


उपन्यास का आरंभ शरद् पूर्णिमा की रात के खूबसूरत चित्रण में होता है। उसके बाद तो पंजाबी गांवों में बसे तीनों समुदायों हिंदू, मुसलमान व सिखों की घी-खिचड़ी जिन्दगी के अनेक चित्र सांस्कृतिक बिम्बों द्वारा प्रस्तुत हुए हैं, जिनमें ‘त्रिंजन भी है, लोहड़ी भी, प्रेम कथाएँ भी ईद और दशहरा भी और पंजाबी का विशेष त्यौहार ‘बैसाखी’ भी शाह जी के परिवार को कथा के केन्द्र में रखकर लेखिका अनेकानेक अन्य कहानियों भी उपन्यास के कलेवर में सँजो दी है।


जिन्दगीनामा उपन्यास में डेरा जट्टा गाँव के जीवन का हर पहलू जीवंत रूप में चित्रित है। उपन्यास के अंत तक देश के स्वतंत्रता संग्राम की गूँज भी सुनाई देने लगती है। भगत सिंह के चाचा अजीत सिंह, क्रांतिकारी कवि लालचंद ‘फलक’ और गदर (1914) के चर्चे उपन्यास के अंत तक शुरू हो जाते हैं। जिन्दगीनामा उपन्यास में वर्णित जीवन का  कालखंड 1910 से 1915 का जान पड़ता है।

‘जिन्दगीमामा’ उपन्यास एक सांस्कृतिक ऐतिहासिक औपन्यासिक रचना है। इसमें व्यक्ति कथा कम, संस्कृति-कथा अधिक चित्रित हुई है। हालांकि इस संस्कृति कथा को बयान करने में लेखिका ने पंजाबी प्रभाव युक्त जिस भाषा का प्रयोग किया है, उससे रेणु के 'मैला आँचल’ की भाषा की तरह कुछ पाठकों के लिए संप्रेषण बाधा आई है, लेकिन सांस्कृतिक परिवेश की रचना की भाषा इसी रूप में सौन्दर्य सृजित कर सकती थी।


 




Saturday, September 4, 2021

The Hindu Vocabulary 4/09/2021

 The Hindu Vocabulary 

4/09/2021

1. STOICALLY
‍ˈस्‍टोइक्‌लि
adverb
विरक्त भाव से
without complaining or showing your feelings, especially when something bad happens to you:

• She listened stoically as the guilty verdict was read out.

• Stoically, and with great determination, the people began rebuilding the village.

  2 . SWOOP
स्‍वूप्‌
verb
1.to fly or move down suddenly
झपट्टा मारना (एकाएक नीचे की ओर उड़ कर आना या गति करना)
The bird swooped down on its prey.The bird swooped down on its prey.
2. (used especially about the police or the army) to visit or capture somebody/something without warning
(विशेषतः पुलिस या सेना का) किसी पर झपटना (बिना चेतावनी दिए किसी के पास पहुँचना या उसे पकड़ लेना)

• Police swooped at dawn and arrested the man.
noun
झपट्टा

3. SAGACIOUS
सˈगेशस्
adjective
having or showing good judgement and understanding
सही निर्णय क्षमता या समझ वाला; बुद्धिमान, दूरदर्शी, विवेकशील
  
having or showing understanding and the ability to make good judgments:

• a sagacious person/comment/choice

4. BOTCH
बॉच्‌
verb
to do something badly; to make a mess of something
काम बिगाड़ देना; लापरवाही से काम करना

• I’ve completely botched up this typing, I’m afraid.I’ve completely botched up this typing, I’m afraid.

having or showing understanding and the ability to make good judgments:

5. SECOND
‍ˈसे᠎̮कन्‍ड्‌
verb
to support somebody’s suggestion or idea at a meeting so that it can then be discussed and voted on
बैठक में किसी सुझाव या विचार का अनुमोदन करना (चर्चा एवं मतदान हेतु)

to make a formal statement of support for a suggestion made by someone else during a meeting so that there can be a discussion or vote:

• The motion was proposed by the club's chairwoman and seconded by the secretary.

to send an employee to work somewhere else temporarily, either to increase the number of workers or to replace other workers, or to exchange experience or skills:

• During the dispute, many police officers were seconded from traffic duty to the prison service.


Ashok Mishra

झूठा सच: यशपाल (सारांश एवं परिचय)


 'झूठा सच' यशपाल (सारांश एवं परिचय)


झूठा सच निर्विवाद रूप से यशपाल का सर्वश्रेष्ठ उपन्यास है। इसका पहला खंड सन् 1958 और दूसरा सन् 1960 में प्रकाशित हुआ इन्द्रनाथ मदान ने रंगों के रूपक द्वारा इसे लाल से गुलाबी की ओर यशपाल के   संचरण के रूप में देखा है। अर्थात् अपने पूर्ववर्ती उपन्यासों में कम्युनिस्ट पार्टी की विचारधारा और नीतियों के समर्थक जैसे नायकों की रचना यशपाल करते रहे थे, यहाँ वे उससे थोड़ा हटे हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि कम्युनिस्ट विचारधारा के प्रति वे उदासीन हो गए हैं। 'दादा कामरेड', 'पार्टी कामरेड', 'देशद्रोही' आदि उपन्यासों का सामाजिक फलक बहुत छोटा है। इनमें पार्टी नीतियाँ प्रमुख होकर आई है जबकि लाहौर को केन्द्र बनाकर लिखा गया 'झूठा सच' का पहला खण्ड पंजाब और पंजाबियत को समग्रता के साथ अपने में समाए हुए है। विभाजन की त्रासदी उस पर एक आघात बनकर आती है। इस खण्ड में भी असद, गिल जैसे कम्युनिस्ट पात्र है, लेकिन विभाजन की त्रासद पृष्ठभूमि में उनकी किसी क्रांतिकारी भूमिका का उल्लेख सम्भव नहीं था। जबकि उपन्यास के दूसरे खण्ड 'देश का भविष्य में यशपाल ने कम्युनिस्ट पात्रों और उनकी गतिविधियों का समुचित उल्लेख किया है। पी.सी. जोशी और बी.टी. रणदिवे की पोलिटिकल लाइन पर खुलकर चर्चा हुई है। लेकिन इसका सम्बन्ध देश के वर्तमान से न होकर देश के भविष्य से अधिक है।


'झूठा सच' में भी कम्युनिस्ट पात्र है लेकिन उसमें पार्टी और उसकी विचारधारा के बाहर का एक खुला और भरा-पूरा संसार भी है और वही उपन्यास में अधिक महत्वपूर्ण है। उपन्यास का आरंभ लाहौर की एक गली में मास्टर राम लुभाया की माँ की मृत्यु से होता है। लाहौर का शांत और आपसी सद्भाव वाला यह जीवन देखते-देखते नेताओं के राजनैतिक स्वार्थों की भेंट चढ़ जाता है। इन्हीं आर्यसमाजी मास्टर राम लुभाया का बेटा जयदेवपुरी और बेटी तारा 'झूठा सच' के केन्द्रीय पात्रों के रूप में विकसित होते हैं। जयदेव पत्रकार हैं। साम्प्रदायिक दंगों में मारे गए दौलू मामा की मृत्यु पर लिखी गई उसकी टिप्पणी का एक अंश है, "तुम्हारे कत्ल के लिए उत्तेजना दिलाने की जिम्मेदारी उन नेताओं पर है जो तुम्हारे जैसे इंसानों को शासन के सिंहासन पर पहुँच सकने का जीना बनाने के लिए जनता को ईंट गारे की तरह प्रयोग करना चाहते हैं। क्या हम सर्वसाधारण स्वार्थों में अंधे और क्रूर लोगों के सपनों के महलों में पहुंचने के लिए जीने बनते रहेंगे? क्या सर्वसाधारण अपने नेताओं को मानवता की कसौटी पर जाँचकर नहीं परखेंगे? क्या अपने स्वार्थों के लिए सर्वसाधारण को अंधा बना देना ही धर्म की रक्षा, प्रजातन्त्र और जनवाद है?...........” (झूठा सच. पृ. 137) जयदेव पूरी की इस टिप्पणी में पत्रकारोचित  आवेश के बावजूद राजनीति और नेताओं के प्रति हताशा का स्वर बहुत स्पष्ट है।‘झूठा सच' के समर्पण में यशपाल इन दो पक्षों को ही आमने-सामने रखकर उपन्यास के नामकरण की ओर संकेत करते हैं। एक ओर जनसमुदाय है जो सदा झूठ से ठगा गया है और दूसरी ओर झूठ का वव्साय करने वाले नेता है, जिनके द्वारा झूठ से छली जाकर भी जनता सच के प्रति अपनी निष्ठा और उसकी और बढ़ने का साहस नहीं छोड़ती। 

उपन्यास के दूसरे खंड ‘देश का भविष्य’ में यशपाल कांग्रेस की जनविरोधी  राजनीति और उसके दूरगामी परिणामों की ओर संकेत करके उससे मुक्ति का आह्वाहन करते हुए देश का भविष्य देश की जनता के ही हाथ में होने की घोषणा करते हैं। ‘झूठा सच’ के रूसी अनुवाद की भूमिका लिखते हुए चेलेशेव  इस सवाल को उठाते हैं, "ये कौन लोग हैं जिनके काम में भारत का भविष्य है? ये बहुत से लोग हैं, सूद जी जैसे लोगों से कही अधिक। ये वे भूखे लोग हैं जो अपनी रोटी का आखिरी टुकड़ा भी शरणार्थियों को देते है। ये साहसी नवयुवक और नवयुवतियों है जो धार्मिक कट्टरता की आग को बुझाने के लिए कृतसंकल्प है। ये वोट डालने वाली साधारण जनता है जो सूदजी तथा उन जैसे लोगों का विरोध करती है। उपन्यास के अंत में डॉ0 नाथ का स्वगत कथन पूरी तरह से प्रतीकात्मक है। इससे विश्वास होता है कि जनता निर्जीव नहीं है और वह सदा मूक भी नहीं रहती.. ..." (यशपाल के पत्र, मधुरेश, पृ. 128)

यशपाल मूलत: एक मध्यवर्गीय समाज के लेखक है। मध्यवर्ग के चित्रण और प्रतिनिधित्व की दृष्टि से ‘झूठा सच’ एक बड़ा और सार्थक प्रयास है। राम ज्वाया, रामलुभाया, जयदेव, तारा, पंडित गिरधारी लाल, कनक, नैयर, डॉ० प्राणनाथ और पंजाब के असंख्य परिवार मध्यम वर्ग के विभिन्न स्तरों का प्रतिनिधित्व करते हैं। पारिवारिक स्वार्थों का तनाव और सम्मिलित परिवारों का विघटन, आर्थिक संकट और साधनहीन श्रेणी की विरासत, संघर्ष लिए तैयार युवा पीढ़ी आदि 'झूठा सच' के पलक को एक प्रीतिकर विस्तार देते हैं। प्रेम, विवाह, शिक्षा और रोजगार की समस्याएँ एवं अर्थाभाव और हीन सामाजिक स्थिति से उत्पन्न कुठाओ और हीनभाव के विभिन्न रूप जयदेव और तारा के चरित्रों में मिलते हैं। इस समाज में विवाह की समस्या सबसे बड़ी और जटिल है। तारा और कनक के माध्यम से लेखक इसके विविध पक्षों पर विचार करता है। गिरधारी लाल इन दो ध्रुवों  के बीच जैसे सामजस्य और संतुलन स्थापित करते हैं। विवाह को एक सामाजिक-आर्थिक समझौते के रूप में स्वीकृति देकर वे विश्वास करते हैं कि सामाजिक-आर्थिक चौखटे के बाहर जाकर वह बिखर जाएगा। शीलो और रतन का प्रसंग इसी समस्या का एक और पक्ष है। भले ही समाज की दृष्टि में यह तारा पर व्यभिचार को प्रश्रय देने का उदाहरण हो, लेकिन तारा ने शीलो को रतन से मिलाकर सामाजिक क्रांति विशेषतः नारी मुक्ति की दिशा में एक सही कदम उठाया है। उपन्यास के अधिकांश महत्वपूर्ण पात्र मध्यवर्गीय समाज से संबद्ध है और वे अपने समाज और परिवेश के प्रति सच्चे और ईमानदार है। पात्रों के इस वैविध्य के कारण ही 'झूठा सच’ वस्तुतः सामाजिक जीवन का महाकाव्य बन सका है। यह लेखक की एक बड़ी सफलता है कि वह प्रमुख और गौण दोनों प्रकार के पात्रों पर समान रूप से ध्यान केन्द्रित कर सकता है। तारा, पुरी और कनक जैसे मुख्य पात्रों के साथ गिरधारी लाल, नैयर, गिल, असद, मर्सी, दत्ता, उर्मिला के अतिरिक्त शीलो, रतन, भगवती, पूरणदेई, सीता, मेलादेई, कतारो, खुशालसिंह आदि जैसे ढेरों पात्रों को लेखक ने गहरी आत्मीयता और संयम के साथ गढ़ा है।


जयदेवपुरी उपन्यास का नायक और मुख्यपात्र है। वह अपनी सारी दुर्बलताओं, शक्ति और संभावनाओं के साथ उपन्यास में उपस्थित है। उसके आदर्शों पर धीरे-धीरे मध्यवर्गीय जीवन का यथार्थ और उसकी वास्तविकताएँ हावी होती जाती है। सारे जद्दोजहद के बाद, परिस्थितियों से समझौता करके, वह एक वामपंथी कांग्रेसी और फिर अवसरवादी नेता बन जाता है। यदि लेखक चाहता तो अपने पूर्व उपन्यासों की परम्परा में उसे आसानी से कम्युनिस्ट हीरो बनाया जा सकता था। लेकिन यह काम वह उससे न लेकर गिल जैसे बहुत से दूसरे पात्रों से लेता है। पुरी मध्यवर्गीय आकांक्षाओं और विडम्बनाओं का एक प्रतिनिधि चरित्र है, जिसमें विकास के स्थान पर लगातार हास लक्षित किया जा सकता है।


उपन्यास के स्त्री-पात्रों में तारा और कनक दोनों ही समान रूप से महत्वपूर्ण है। अपने-अपने ढंग से वे दोनों ही मध्यवर्ग के दो भिन्न स्तरों का प्रतिनिधित्व करती हैं।

तारा आरंभ में एक साधारण लड़की के रूप में सामने आती है जो अपने परिवेश की विद्रूपताओं से लड़ने के लिए अपनी सारी सीमाओं के बीच, हर मुमकिन कोशिश करती है।  उसकी त्रासदी किन्हीं अर्थों में समूचे मध्यवर्ग की त्रासदी है। घटना के बहाव में सोमा की तरह बहती नहीं है, बल्कि बहाव को काटकर मनचाही दिशा में बढ़ने के लिए संघर्ष  करती है। कनक अपेक्षाकृत अधिक सहज और सरल है। भारी कठिन और विपरीत स्थितियों के बीच भी वह अपनी निष्ठा और आस्था को बचाए रखती है। उर्मिला शुरू में एक किशोरी है जो सिर्फ अपनी धमनियों में बहते रक्त के प्रति ही सच्ची है। लेकिन बाद में यह गलत समझौतों से ऊपर उठकर अपने पैरों पर खड़ी हो अपने जीवन और भाग्य का निर्माण करने वाली स्त्री में बदल जाती है। इनके अलावा भी सैकड़ों छोटे-बड़े पात्र है जो पंजाब की धरती की बू-वास लिए है, जो संघर्ष करते हैं और जीवन की बेहतरी के लिए हर मुमकिन कोशिश करते हैं।


उपन्यास का पहला खंड 'वतन और देश' मुख्य रूप से लाहौर पर केन्द्रित है। पंजाबी जीवन का लोक रस, उसके रीति-रिवाज, आचार-व्यवहार, बोलियाँ, फेरी वालों की आवाजें और गीत आदि उसे गहरी स्थानीय रंगत देते हैं। लेकिन इसमें आचलिकता का कहीं कोई आग्रह नहीं है। उपन्यास का आरंभ ही रामज्वाया और रामलुभाया की माँ की मृत्यु पर स्यापे से होता है। यह वह सूत्र है जो उपन्यास के भावी विकास की दिशा का संकेत देता है। लाहौर की गलियाँ और बाजार, अनारकली, मालरोड, ग्वालमंडी, मजंग, नीला गुबंद, शाहमली, भाटी दरवाजा, भोला पांधे की गली आदि लगता है जैसे समूचा लाहौर मूर्तरूप से सामने खड़ा है। स्यापे में कौला नाहन उलाहना देती है "बोल मेरिए राणिए रामजीदा नाम .. फेरी वाले चिल्लाते हैं, "लै लौ जी जीकेल्ले  हरी छाल दे..... मरूद अलाहाबादी, नार काबल कंधार देजे.......” भागवंती गाली देती है..... "ये झूठे चुगली लगाने वाले बच्चे-पिट्टे, एंडीचड्णे मरैं, इनकी सात पीढ़ियों औन्तर रहे।"....... ये सारी चीजें उपन्यास की प्रामाणिक स्थानीयता की दृष्टि से उल्लेखनीय है। कदाचित पहली बार यशपाल 'झूठा सच’ में पंजाब के जनजीवन के बहाव में इतना तन्मय होकर बहे हैं।


भाषिक प्रयोग की दृष्टि से भी ‘झूठा सच' एक श्रेष्ठ, सफल और जन-जीवन की भाषा का प्रतिनिधि उपन्यास है। संतुलन, अनुपात और स्थान का ध्यान रखते हुए लेखक ने उपन्यास की भाषा को पंजाबी रंगत दी है, जिसमें भाषा की अपनी स्थानीय गंध सी बसी है। उसमें कितने ही पंजाबी शब्द-अमरू, भाया, कुड़माई, भाइया, सिरसड़े, झाई-नालदा आदि अपने मूल रूप में उपस्थित हैं। पढ़े-लिखे मध्यवर्गीय पात्र बोलचाल में अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग भी करते हैं-अपने खास पंजाबी उच्चारण के साथ। भोला पांधे की गली का निम्न मध्य वर्ग जो भाषा बोलता है, उससे उसकी मिट्टी का आत्मीय और अन्तरंग संबंध है। उपन्यास के प्रथम खण्ड में कितने ही मुस्लिम पात्र है जो उर्दू बोलते हैं। लेकिन इन पात्रों की उर्दू का भी अपना-अपना रंग और स्तर है। गौस मुहम्मद की भाषा ठीक वैसी ही नहीं है जैसी हाफिज जी की है। उपन्यास में ब्यौरों और वृत्तांत वाला रचना-विधान ठीक वैसा ही है जैसा किसी विशाल जनजीवन का चित्रण करने वाले किसी बड़े फलक के उपन्यास का होना चाहिए। उसका शिल्प ‘बूँद और समुद्र', 'भूले बिसरे चित्र' और प्रेमचंद के अधिकांश बड़े फलक वाले उपन्यासों वाला शिल्प है।


भाषा की दृष्टि से विचार करें तो ‘झूठा सच' के शब्द या वाक्यांश प्रयोग में एक बात खटकती है। लगता है, यशपाल रेणु के उपन्यासों की भाषा की अत्यधिक आंचलिकता, जो प्रायः पठनीयता में बाधक बनी है, से उबरने के प्रति काफी सावधान दिखाई देते हैं। इसलिए वे ठेठ पंजाबी शब्दों और वाक्यांशों का हिन्दी रूपान्तर कोष्ठकों में देते चलते हैं। जैसे-उलाहनी (विलाप के बोल), डिट्ठे पलंगा बालिए (भरे पूरे घर वाली), हुँदया हुक्म चालिए (जिसका हुक्म चलता हो), लग्गे बागा वालिए (अनेक बागों की मालकन) इसके साथ ही विशिष्ट पात्रों द्वारा बोले गए अंग्रेजी शब्दों, वाक्यांशों का कोष्ठकों में हिन्दी रूपान्तर भी देते चलते हैं। वस्तुतः भाषा प्रयोग की यह पद्धति उपन्यास के पाठ-प्रवाह में बाधक बनी है।


'झूठा सच' के दूसरे खण्ड देश का भविष्य में यशपाल उस समूची प्रक्रिया को बहुत विश्वसनीय रूप में अंकित करते हैं कि कैसे रातों-रात कांग्रेसियों और उनके हिमायतियों की एक पूरी की पूरी फौज खड़ी हो जाती है। सूद जी, अवस्थी जी, ठाकुर साहब और मिसेज़ अगरवाला जैसे लोग अपनी उपस्थिति में अकेले नहीं हैं। देश की आजादी के साथ जन्मे वे एक पूरे वर्ग के रूप में उभरे हैं। अंग्रेजों के जमाने में यही मिसेज अगरवला ब्रिटिश निटिंग क्लब की मेंबर थीं और किराए पर स्वेटर बुनवाकर ब्रिटिश जवानों को भिजवाती थीं। अब वे खद्दर पहनने लगी हैं- जो, उन्हीं के अनुसार, उनके पेट पर मूँज की तरह गड़ता है। गांधी जी की हत्या वाली रात में शराब के बीच कांग्रेसी नेताओं की बहसों के प्रसंग कहीं-कहीं अतिरंजनापूर्ण लग सकते हैं, लेकिन फिर लेखक जल्दी ही पाठक का विश्वास पा लेता है।


'झूठा सच' जैसे बड़े फलक और आकार वाले उपन्यासों पर 'बाह्य विस्तार का आरोप जब-तब लगाया जाता रहा है। उसका पहला खण्ड अपेक्षाकृत अधिक संश्लिष्ट और सुगठित है। लेकिन उसमें भी अंत तक पहुँचते-पहुँचते इस विस्तार का मोह सचमुच बढ़ा है। बंतो, अमरो, सतवंत और दुर्गा आदि की अलग-अलग कहानियों का भी सार एक ही है। वे सब अमानुषिकता और नृशंसता के ही बयान हैं। उपन्यास का दूसरा खण्ड ढीला-ढाला सा है। उसमें जनता के संघर्ष और नेताओं के व्यापक भ्रष्टाचार का संतुलन भी डगमगाया है। लेकिन इन सारी सीमाओं के बावजूद 'झूठा सच' यशपाल का सर्वश्रेष्ठ उपन्यास तो है ही, वह हिन्दी के कुछ उल्लेखनीय उपन्यासों में से भी एक है। प्रेमचंद की जनवादी परम्परा का विकसित, परिष्कृत और समयानुकूल परिवर्तित रूप उसमें देखा जा सकता है। अपने 'विशाल फलक, बहुविध समस्याओं और व्यापक जीवन चित्रों के कारण यह उनके अन्य उपन्यासों से विशिष्ट और श्रेष्ठ है।



असम के जननायक ज़ुबीन गर्ग: एक कलाकार जो सिर्फ़ आवाज़ नहीं, असम की पहचान थे#

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