दलबदल कानून क्या है (What is the anti defection law)
1985 में 52वें संविधान संशोधन के माध्यम से देश में ‘दलबदल विरोधी कानून’ पारित किया गया और इसे संविधान की दसवीं अनुसूची में जोड़ा गया. दरअसल विधायकों के एक पार्टी को छोड़ दूसरी पार्टी में शामिल होने को लेकर राजनीति को लेकर कई सवाल उठने लगे थे. इस कानून का मुख्य उद्देश्य भारतीय राजनीति में दलबदल की कुप्रथा को समाप्त करना था. इस कानून में कई प्रावधान किए गए.
इस कानून के तहत किसी जनप्रतिनिधि को अयोग्य घोषित किया जा सकता है अगर:
एक निर्वाचित सदस्य स्वेच्छा से किसी राजनीतिक दल की सदस्यता छोड़ देता है.
कोई निर्दलीय निर्वाचित सदस्य किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है.
किसी सदस्य द्वारा सदन में पार्टी के रुख के विपरीत वोट किया जाता है.
कोई सदस्य स्वयं को वोटिंग से अलग रखता है.
छह महीने की अवधि के बाद कोई मनोनीत सदस्य किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है.
कानून में हैं ये अपवाद
अगर किसी पार्टी के दो तिहाई विधायक या सांसद दूसरी पार्टी के साथ जाना चाहें, तो उनकी सदस्यता ख़त्म नहीं होगी. 2003 में इस कानून में संशोधन भी किया गया. जब ये कानून बना तो प्रावधान ये था कि अगर किसी मूल पार्टी में बंटवारा होता है और एक तिहाई विधायक एक नया ग्रुप बनाते हैं, तो उनकी सदस्यता नहीं जाएगी. लेकिन इसके बाद बड़े पैमाने पर दल-बदल हुए और ऐसा महसूस किया कि पार्टी में टूट के प्रावधान का फ़ायदा उठाया जा रहा है. इसलिए ये प्रावधान खत्म कर दिया गया.
इन परिस्थितियों में नहीं लागू होता दलबदल कानून
जब पूरी की पूरी राजनीतिक पार्टी अन्य राजनीति पार्टी के साथ मिल जाती है.
अगर किसी पार्टी के निर्वाचित सदस्य एक नई पार्टी बना लेते हैं.
अगर किसी पार्टी के सदस्य दो पार्टियों का विलय स्वीकार नहीं करते और विलय के समय अलग ग्रुप में रहना स्वीकार करते है.
जब किसी पार्टी के दो तिहाई सदस्य अलग होकर नई पार्टी में शामिल हो जाते हैं.
No comments:
Post a Comment