“मैला आंचल” आंचलिक उपन्यास
आर.पी. मिश्रा
सन् 1954 में प्रकाशित रेणु का "मैला आंचल” हिंदी साहित्य में आंचलिक उपन्यास की परंपरा को स्थापित करने का प्रथम व सफल प्रयास है। "मैला आंचल” वस्तु और शिल्प दोनो ही स्तरों पर अपने पूर्ववर्ती उपन्यासों से अलग इसलिए है कि उसमें पहले से चली आ रही परंपरा को छोड़ कर एक नए शिल्प में ग्रामीण जीवन को प्रस्तुत किया है। उपन्यासों में नायकत्व की जिस परंपरा को निभाया जा रहा था उसमें बदलाव लाया अर्थात् व्यक्ति के स्थान पर समूचे अंचल विशेष को ही नायकत्व प्रदान किया। इसी के साथ दूसरा महत्वपूर्ण परिवर्तन यह किया कि उस अंचल विशेष की भाषा का अधिक से अधिक प्रयोग किया ताकि उस जन समुदाय की इच्छा-आकांक्षा रीति-रिवाज, पर्व-त्यौहार सोच-विचार को ज्यादा प्रामाणिक रूप में चित्रित किया जा सके। मैला आँचल के पहले संस्करण की भूमिका में स्वयं रेणु ने उसे "आंचलिक उपन्यास" कहा है। जिसकी कथा के केंद्र में है बिहार का पूर्णिया जिला, जो अपने पिछड़ेपन के लिए कुख्यात रहा है। रेणु के शब्दों में, “इसमें फूल भी है शूल भी, धूल भी गुलाल भी- मैं किसी से भी दामन बचाकर निकल नहीं पाया।” यही वह विशिष्ट जीवन संदर्भ है जो रेणु के उपन्यास का यथार्थ है। इन्हीं दो बिंदुओं को चिन्हित करते हुए हम आंचलिक उपन्यास से उन उपन्यासों को अलग करते हैं जो गाँव की पृष्ठभूमि को आधार बनाकर लिखे गए हैं। इस तरह इनको दो श्रेणियों में रखा जा सकता है। पहली श्रेणी में आते हैं प्रेमचंद के "प्रेमाश्रम" "रंगभूमि" और "गोदान" के अतिरिक्त शिवपूजन सहाय का "देहाती दुनिया" शिवप्रसाद रुद्र का "बहती गंगा", भैरवप्रसाद गुप्त का "सती मैया का चौरा" और नागार्जुन का "बलचनमा"। इन सबकी पृष्ठभूमि में गाँव की संवेदना रची बसी है। "गोदान से लेकर आज तक न जाने कितने ही उपन्यास लिखे गए हैं जिनकी पृष्ठभूमि में गाँव का जीवन अपनी अच्छाई-बुराई के साथ निहित है। लेकिन ये उपन्यास किसी अंचल विशेष की समूची तस्वीर पेश नहीं करते बल्कि इनकी रुचि आम भारतीय गाँवों में हो रहे बदलाव को चित्रित करने में ज्यादा है। "मेरीगंज" गाँव का जीवंत चित्र उसमें रह रहे व्यक्तियों की विनोदप्रियता, परस्पर वैमनस्य, प्रेम, घृणा, तिरस्कार, द्वेष, जलन, समर्पण, अमानवीय शोषण, मानवीय संबंध, संवेदना, करूणा आदि मानवीय गुणों-अवगुणों के समस्त उतार-चढ़ावों के साथ रेणु ने उपस्थित किया है। इस उपन्यास में उपस्थित किए गए बाह्य नैतिकता के प्रति तिरस्कार का भाव भी उभरकर आता है तो आंतरिक नैतिकता के लिए छटपटाहट भी दिखाई देती है। परस्पर विरोधी मान्यताओं के बावजूद "मैला आचल” के केंद्र में जीवन के प्रति गहरी आस्था का भाव निहित है। इसमें बैलों के गले में पड़ी घंटियों की रुनझुन एक संगीत का सृजन करती है। एक लय समूचे उपन्यास में व्याप्त है। यही लय जीवन के प्रति आस्था का संचार करती है। मैला आचल जिस प्रकार आंचलिक परिवेश को जीवंत बनाने में सक्षम है उसी प्रकार उसमें अपने समय का बोध भी परिलक्षित होता है। मेरीगंज जैसे पिछड़े ग्रामांचल में मलेरिया केंद्र खुल जाने से जन-जीवन में एक तरह की हलचल पैदा हो जाती है। मार्टिन द्वारा की गई कोशिश लगभग पैंतीस वर्षों के बाद मलेरिया केंद्र के खुलने से साकार होना विज्ञान और आधुनिकता को अपनाने की रफ्तार को खुद ही बयान करती है। भूत-प्रेतो और जीनों डाकिनियों के अस्तित्व में विश्वास करने वाली और उनकी प्रसन्नता अप्रसन्नता की चिंता से निरंतर ग्रस्त रहने वाली जनता के अंधविश्वासी मन की भयानक परिणति गनेश की नानी की हत्या में होती है।
जातिव्यवस्था का कट्टर रूप भी यहाँ दिखाई देता है। गाँव के हर एक व्यक्ति के मन में डॉ. प्रशांत की जाति मालूम करने की प्रबल इच्छा है। ब्राह्मण, क्षत्रिय राजपूत यादव, दलितों के अलग-अलग टोले हैं, दलितों के टोले में सवर्ण लोग तभी प्रवेश करते हैं, जब कोई निहायत ही स्वार्थ हो । राजपूतों को जब मजदूरी के लिए दलितों को बुलाना होता है तभी वे दलितों की बस्ती में जाते हैं, अन्यथा छुआछूत का पूरा माहौल है। मठ के महंत द्वारा पूरे गाँव को दिए गए भंडारे में हर जाति के लोग अलग पंक्ति में बैठकर खाना खाते हैं लेकिन किसी को इसमें आपत्ति महसूस नहीं होती।
रेणु राजनीति को संपूर्ण जीवन का पर्याय तो नहीं मानते और न ही उसे मानव नियति की मात्र नियामक शक्ति, किंतु वे उसे जीवन को गहरे प्रभावित करने वाली शक्ति के रूप में जरुर देखते हैं। इसी राजनीति ने आजादी के बाद गाँव की संरचना में काफी उलट-फेर किया और धर्म, नैतिकता, आदर्श तथा मानवीय संबंधों के अर्थ बदल कर रख दिया। आजादी के बाद पैदा हुई राजनीतिक क्षुद्रताओं को बहुत गहराई से देखा गया है और इस नए वर्ग की अवसरवादिता और स्वार्थी वृत्ति को उजागर किया है। गांधीवाद की खोल ओढ़े भ्रष्ट राजनेताओं ने भ्रष्टाचार को फैलाने में जो साथ दिया उसके परिणाम आज सबके सामने मौजूद है। आजादी की लड़ाई का उद्देश्य और उस संघर्ष में अंतर्भूत चेतना का आज कहीं अता-पता नहीं है। रेणु ने इसे जगह-जगह उभारने की कोशिश की है और उसके भयंकर परिणामों को संकेतों के माध्यम से भविष्य का चित्र प्रस्तुत किया है। आजादी के बाद स्थिति में सुधार आने के स्थान पर वह पहले से बदतर होती गई। नए कांग्रेसियों की वजह से कांग्रेस के दफ्तरों में एक नयी तरह की संस्कृति ने जन्म लिया। गांधीवाद के प्रति अपनी आस्था के बावजूद उसके नाम में रेणु ने कोई संकोच नहीं किया। राजनीति, समाज, धर्म, जाति सभी तरह की विसंगतियों पर रेणु ने "मैला आंचल" के द्वारा प्रहार किया है। सामाजिक बदलाव की गति के मंद होने के लिए धर्म, जाति, बिरादरी जैसी सामाजिक जकड़न का बहुत बड़ा हाथ रहा है। मनुष्य की योग्यता के निर्धारण में जाति की अब भी निर्णायक भूमिका बनी हुई है।
आंचलिक संदर्भ
‘मैला आंचल’ के प्रकाशन से हिंदी में आंचलिक प्रयास की धारा का प्रारंभ माना जाता । अपने प्रकाशन के चार दशक से ज्यादा समय बीत जाने पर भी ‘मैला आंचल’ आज भी हिंदी में आंचलिक उपन्यास के अप्रतिम उदाहरण के रूप में स्थिर है।
‘मैला आंचल’ का महत्व केवल एक आंचलिक उपन्यास होने तक ही सीमित नहीं है, यह हिन्दी का व भारतीय उपन्यास साहित्य का एक अत्यंत श्रेष्ठ उपन्यास भी माना जाता है । इस अर्थ में ‘मैला आंचल’ का दर्जा क्लासिक रचना का है ‘गोदान’ के बाद हिंदी के जो कुछ सर्वश्रेष्ठ उपन्यास माने जाते हैं, ‘मैला आंचल’ उनमें से एक है ।
‘मैला आंचल’ व अपने अन्य उपन्यासों में रेणु ने बिहार के मिथिला अंचल को आधार बनाकर अपने अंचल के दुख सुख वहाँ के सहन सांस्कृतिक लोक जीवन को अत्यंत कुशलता और कलात्मकता से औपन्यासिक स्वरूप प्रदान किया है। अपने अंचल को अपनी रचनाओं के केंद्र में रखकर प्रस्तुत करने के कारण फणीश्वरनाथ रेणु हिंदी में आंचलिक उपन्यास की परंपरा के प्रवर्तक के रूप में प्रतिष्ठित हुए।
‘मैला आंचल’ में रेणु ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण तकनीक का प्रयोग किया है, जिसके द्वारा आंचलिक परिवेश के सौंदर्य उसकी सजीवता और मानवीय संवेदनाओं को उजागर किया है। दृश्यों को चित्रित करने के लिए लेखक ने गीत, लय-ताल वाद्य मनार, खंजड़ी नृत्य, लोकनाटक जैसे उपकरणों का भी बखूबी इस्तेमाल किया है। ध्वनि का जैसा सर्जनात्मक उपयोग ‘मैला आंचल’ में हुआ है, उतना शायद ही हिंदी के किसी अन्य उपन्यास में हुआ हो। ‘ढाक ढिन्ना’, ताक ढिन्ना’ ‘डा डिगा’! रि-रित्ता धिन-ता’ आदि की अनुगूंज सारे उपन्यास में सुनाई देती है। ध्वनियों के द्वारा लेखक ने पूरे परिवेश को वाणी दी है।लोकगीतों की कड़ियां स्थान-स्थान पर लेखक की मनोभावना व विचार को ही अभिव्यक्ति करती है।
मठ के वातावरण को चित्रित करने के लिए प्रातःकाल का कीर्तन बीजक पाठक साहेब बन्दगी’, का अभिवादन और ‘सतगुरु हो! सतगुरु को बार-बार दोहराने का उपयोग सफलता से किया गया है।
राजनीतिक पार्टियों की गतिविधियों की सरगर्मी को दिखाने के लिए तरह-तरह के नारी सहायता ली गई है। कहीं ‘किसान राज कायम हो’। ‘मजदूर राज कायम हो’। ‘गरीबों की पार्टी सोशलिस्ट पार्टी, सोशलिस्ट पार्टी जिंदाबाद की ध्वनि है तो कहीं की ‘जै हो गन्ही महतमा की गूंज सुनाई पड़ती है। जलसे जुलूस और मीटिंगों में भी ध्वनि और भाषणों का योगदान है। नारों को कहीं-कहीं गीतों में डालने का उपक्रम भी है।
‘मैला आंचल’ में आंचलिक पहलू उभारने के लिए लेखक ने अंचल के भौगोलिक परिस्थितियों के चित्रण से लेकर सामाजिक-सांस्कृतिक पर्यावरण के चित्रण तक बढ़ी गहराई लगाव से प्रस्तुत किया है। ‘मैला आंचल’ में मौजूद मेरीगंज गांव भौगोलिक, सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अन्य किसी गांव से भिन्न है। मेरीगंज में मनाए जाने वाले तीज-त्यौहारों गांव में मनाए जाने वाले ऋतपर्वों, लोक-व्यवहार के विविध रूपों व मानवीय संबंधों के विशिष्ट रुपों के वर्णन के माध्यम से रेणु ने "मैला आंचल” में अपने प्रिय अंचल का इतना गहरा व व्यापक चित्र खींचा है कि सचमुच है उपन्यास हिंदी में आंचलिक औपन्यासिक परंपरा की सर्वश्रेष्ठ कृति बन गया है।
सामाजिक और राजनीतिक संदर्भ
राजनीतिक संदर्भ में रेणु ने 1946 में उपनिवेशवादी शासन की छत्रछाया में कांग्रेसी मंत्री मंडलों के कार्यकलापों और 1948 में अंग्रेजों के चले जाने के बाद उसी शासन को बिना किसी परिवर्तन के चलाए जाने को बड़ी गहराई से चित्रित किया है । भारतीय राजनीति के सभी पहलू कांग्रेसी आंदोलन, समाजवादी आंदोलन, क्रांतिकारी आंदोलन, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की हिंदू राज्य की पताका लहराने की कोशिश देश का विभाजन सांप्रदायिक दंगों आदि तो उपन्यास में चित्रित हुए ही हैं, शासन व्यवस्था के औपनिवेशिक स्वरूप को भी लेखक ने उद्घाटित किया है, जो स्वतंत्रता पूर्व व स्वातंत्र्योत्तर काल में बिना किसी परिवर्तन के चलता रहता है। शोषक वर्गों व शोषित वर्गों दोनों की ही स्थिति स्वतंत्रता के पहले और बाद एक ही तरह की बनी रहती है। भारतीय समाज के इस कटु राजनीति के यथार्थ को रेणु ने मैला आंचल में ईमानदारी से अंकित कर दिया है।
उसी प्रकार बिहार के सुदूर क्षेत्र के विशेषत: मिथिला अंचल के सामाजिक मानचित्र को भी रेणु ने मैला आंचल में पूरी विविधता से उकेरा है । गांव का जाति-विभाजन शिक्षा चिकित्सा सुविधाओं का अभाव मानसिक पिछड़ापन गांव में मनाए जाते पर्व-त्यौहार लोकगीत संगीत स्त्री-पुरुष संबंध सामाजिक जीवन के विभिन्न पहलुओं को जिन्होंने बड़ी सजीवता से उपन्यास में अंकित किया है। गांव के जीवन में बलदेव, बावन दास, कालीचरण और डॉक्टर प्रशांत कुमार की मौजूदगी और प्रयत्नों से होने वाले सामाजिक परिवर्तनों का अंकन भी रेणु ने इस परिवर्तन के अंतर्विरोधों के साथ किया है। बिहार के मिथिला अंचल के राजनीतिक, सामाजिक व सांस्कृतिक जीवन का एक प्रामाणिक रूप जानने समझने के लिए ‘मैला आंचल’ एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक कृति का दर्जा रखती है।
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